Hazrat khalid bin walid ka amal हज़रत खालिद बिन वलीद का अमल

hazrat khalid bin walid ka amal
hazrat khalid bin walid ka amal

Hazrat khalid bin walid ka amal हज़रत खालिद बिन वलीद का अमल Hazrat khalid bin walid k wisal ka din29 jamadil ula

Aankho ki bimari ka ilaj आंखों की बीमारी का इलाज अमल इन हिंदी

आंखों में अगर तकलीफ हो या फिर नम्बर हो तो इन दुरूद को पढ़े परहने का तरीका के हर नमाज़ के बाद तीन बार परह कर उंगलियो पर दम कर के आंखों पर मले ज़्यादा मालूमात के लिए वीडियो देख ले.

Quran in hindi surah hoodक़ुरान इन हिन्दि सूरह हुद तफ़्सीर के साथ

kanzul iman in hindi
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Quran in hindi surah hoodक़ुरान इन हिन्दि सूरह हुद तफ़्सीर के साथ

11 सूरए  हूद

सूरए हूद मक्का में उतरी, इसमें 123 आयतें और दस रूकू हैं.

पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान, रहमत वाला(1)

यह एक किताब है जिसकी आयतें हिकमत (बोध) भरी हैं (2)
फिर तफ़सील की गईं(3)
हिकमत वाले ख़बरदार की तरफ़ से {1} कि बन्दगी न करो मगर अल्लाह की, बेशक मैं तुम्हारे लिये उसकी तरफ़ से डर और ख़ुशी सुनाने वाला हूँ {2} और यह कि अपने रब से माफ़ी मांगो फिर उसकी तरफ़ तौबह करो, तुम्हें बहुत अच्छा बरतना देगा(4)
एक ठहराए वादे तक और हर फ़ज़ीलत (प्रतिष्ठा) वाले को(5)
उसका फ़ज़्ल (अनुकम्पा) पहुंचाएगा(6)
और अगर मुंह फेरो तो तुमपर बड़े दिन (7)
के अज़ाब का ख़ौफ़ करता हूँ {3} तुम्हें अल्लाह ही की तरफ़ फिरना है (8)
और वह हर चीज़ पर क़ादिर {शक्तिमान} है(9){4}
सुनो वो अपने सीने दोहरे करते हैं कि अल्लाह से पर्दा करें  (10)
सुनो जिस वक़्त वो अपने कपड़ों से सारा बदन ढांप लेते हैं उस वक़्त भी अल्लाह उनका छुपा और ज़ाहिर सब कुछ जानता है, बेशक वह दिलों की बात जानने वाला है{5}
पारा 12
सूरए हूद पहला रूकू जारी
और ज़मीन पर चलने वाला कोई (11)
ऐसा नहीं जिसका रिज़्क़ (रोज़ी) अल्लाह के करम के ज़िम्मे पर न हो  (12)
और जानता है कि कहाँ ठहरेगा (13)
और कहाँ सुपुर्द होगा(14)
सब कुछ एक साफ़ बयान करने वाली किताब (15)
में है{6} और वही है जिसने आसमानों और ज़मीन को छ दिन में बनाया और उसका अर्श पानी पर था(16)
कि तुम्हें आज़माए(17)
तुम में किस का काम अच्छा है और अगर तुम फ़रमाओ कि बेशक तुम मरने के बाद उठाए जाओगे तो काफ़िर ज़रूर कहेंगे कि यह (18)
तो नहीं मगर खुला जादू(19){7}
और अगर हम उनसे अज़ाब (20)
कुछ गिनती की मुद्दत तक हटा दें तो ज़रूर कहेंगे किस चीज़ ने रोका है (21)
सुन लो जिस दिन उनपर आएगा उनसे फेरा न जाएगा और उन्हें घेरेगा वही अज़ाब जिसकी हंसी उड़ाते थे(8)

तफ़सीर 
सूरए हूद – पहला रूकू

(1) सूरए हूद मक्की है. हसन व अकरमह वग़ैरह मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि आयत “व अक़िमिस्सलाता तरफ़यिन्नहारे” के सिवा बाक़ी सारी सूरत मक्की हैं. मक़ातिल ने कहा कि आयत “फ़लअल्लका तारिकुन” और “उलाइका यूमिनूना बिही” और “इन्नल हसनाते युज़हिब्नस सैय्यिआते” के अलावा सारी सूरत मक्की है. इसमें दस रूकू, 123 आयतें, एक हज़ार छ सौ कलिमे और नौ हज़ार पांच सौ सड़सठ अक्षर हैं. हदीस में है सहाबा ने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, हुज़ूर पर बुढ़ापे के आसार दिखने लगे. फ़रमाया, मुझे सूरए हूद, सूरए वाक़िआ, सूरए अम्मा यतसाअलून और सूरए इज़श -शम्से कुव्विरत ने बूढा कर दिया (तिरमिज़ी). सम्भवत: यह इस वजह से फ़रमाया कि इन सूरतों में क़यामत और मरने के बाद उठाए जाने और हिसाब किताब होने और जन्नत व दोज़ख़ का बयान है.

(2) जैसा कि दूसरी आयत में इरशाद हुआ “तिल्का आयातुल किताबिल हकीम” (यह हिकमत वाली किताब की आयतें हैं- 10:1 ) कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया “उहकिमत” (हिकमत से भरी) के मानी ये हैं कि उनकी नज़्म मोहकम और उस्तुवार की गई. इस सूरत में मानी ये होंगे कि इस में कोई ख़ामी राह पा ही नहीं सकती. वह बिनाए मोहकम है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि कोई किताब इनकी नासिख़ नहीं, जैसा कि ये दूसरी किताबों और शरीअतों की नासिख़ हैं.

(3) और सूरत सूरत और आयत आयत अलग अलग ज़िक्र की गई या अलग अलग उतारी गई या अक़ीदे,अहकाम, नसीहतें, क़िस्से और ग़ैबी ख़बरें इन में तफ़सील और विस्तार से बयान फ़रमाई गई.

(4) लम्बी उम्र और भरपूर राहत वे ऐश और बहुत सा रिज़्क़. इससे मालूम हुआ कि सच्चे दिल से तौबह व इस्तग़फ़ार करना उम्र लम्बी होने और आजिविका में विस्तार होने के लिये बेहतरीन अमल है.

(5) जिसने दुनिया में अच्छे कर्म किये हो उसकी फ़रमाँबरदारियाँ और नेकियाँ ज़्यादा हों.

(6) उसको जन्नत में कर्मों के हिसाब से दर्जे अता फ़रमाएगा. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा आयत के मानी यह हैं कि जिसने अल्लाह के लिये अमल किया, अल्लाह तआला आयन्दा के लिये उसे नेक कर्म और फ़रमाँबरदारी की तौफ़ीक देता है.

(7) यानी क़यामत के दिन.

(8)  आख़िरत में वहाँ नेकियों का इनाम और बुराइयों की सज़ा मिलेगी.

(9) दुनिया में रोज़ी देने पर भी. मौत देने पर भी, मौत के बाद ज़िन्दा करने और सवाब व अज़ाब पर भी.

(10) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया, यह आयत अख़नस बिन शरीक़ के बारे में उतरी. यह बहुत मीठा बोलने वाला व्यक्ति था. रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सामने आता तो बहुत ख़ुशामद की बातें करता और दिल में दुश्मनी छुपाए रखता. इसपर यह आयत उतरी. मानी ये हैं कि वो अपने सीनों में दुश्मनी छुपाए रखते हैं जैसे कपड़े की तह में कोई चीज़ छुपाई जाती है. एक क़ौल यह है कि कुछ दोहरी प्रवृति वालों की आदत थी कि जब रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का सामना होता तो सीना और पीठ झुकाते और सर नीचा करते, चेहरा छुपा लेते ताकि उन्हें हुज़ूर देख न पाएं. इसपर यह आयत उतरी. बुख़ारी ने इन लोगों में एक हदीस रिवायत की कि मुसलमान पेशाब पाख़ाने और हमबिस्तरी के वक़्त अपने बदन खोलने से शरमाते थे. उनके हक़ में यह आयत उतरी कि अल्लाह से बन्दे का कोई हाल छुपा ही नहीं है लिहाज़ा चाहिये कि वह शरीअत की इजाज़तों पर अमल करता रहे.

पारा ग्याराह समाप्त

(11) जानदार हो.

(12) यानी वह अपनी कृपा से हर जानदार की आजीविका की देखभाल करता है.

(13) यानी उसके रहने की जगह को जानता है.

(14) सुपुर्द होने की जगह से, या दफ़्न होने का स्थान मुराद है, या मकान या मौत या क़ब्र.

(15) यानी लौहे महफ़ूज़.

(16) यानी अर्श के नीचे पानी के सिवा और कोई मख़लूक़ न थी. इससे यह भी मालूम हुआ कि अर्श और पानी आसमानों और ज़मीनों की पैदायश से पहले पैदा फ़रमाए गए.

(17) यानी आसमान व ज़मीन और उनके बीच सृष्टि को पैदा किया, जिसमें तुम्हारे फ़ायदे और मसलिहत हैं ताकि तुम्हें आज़माइश में डाले और ज़ाहिर हो कि कौन शुक्र गुज़ार तक़वा वाला फ़रमाग्बरदार है और..

(18) यानी क़ुरआन शरीफ़ जिस में मरने के बाद उठाए जाने का बयान है यह.

(19) यानी झूट और धोख़ा.

(20) जिसका वादा किया है.

सूरए हूद – दूसरा रूकू

सूरए  हूद – दूसरा रूकू


और अगर हम आदमी को अपनी किसी रहमत का मज़ा दें (1)
फिर उसे उससे छीन लें, ज़रूर वह बड़ा ना उम्मीद नाशुक्रा है(2) {9}
और अगर हम उसे नेमत का मज़ा दें उस मुसीबत के बाद जो उसे पहुंची तो ज़रूर कहेगा कि बुराइयाँ मुझसे दूर हुई,बेशक वह ख़ुश होने वाला बड़ाई मारने वाला है(3){10}
मगर जिन्होंने  सब्र किया और अच्छे काम किये(4)
उनके लिये बख़्शिश और बड़ा सवाब है {11} तो क्या जो वही (देववाणी) तुम्हारी तरफ़ होती है उसमें से कुछ तुम छोड़ दोगे और उसपर दिलतंग होगे(5)
इस बिना पर कि वो कहते हैं उनके साथ कोई ख़ज़ाना क्यों नहीं उतरा या उनके साथ कोई फ़रिश्ता आता,तुम तो डर सुनाने वाले हो(6)
और अल्लाह हर चीज़ पर मुहाफ़िज़ (रक्षक) है (7){12}
क्या ये कहते है कि इन्होंने इसे जी से बना लिया, तुम फ़रमाओ कि तुम ऐसी बनाई हुई दस सूरतें ले आओ(8)
और अल्लाह के सिवा जो मिल सके(9)
सबको बुला लो अगर तुम सच्चे हो(10){13}
तो ऐ मुसलमानों और वो तुम्हारी इस बात का जवाब न दे सकें तो समझ लो कि वह अल्लाह के इल्म ही से उतरा है और यह कि उसके सिवा कोई सच्चा मअबूद नहीं,तो क्या अब तुम मानोगे(11){14}
जो दुनिया की ज़िन्दगी और आरायश चाहता हो(12)
हम उसमें उनका पूरा फल दे देंगे(13)
और उसमें कमी न देंगे{15} ये हैं वो जिनके लिये आख़िरत में कुछ नहीं मगर आग और अकारत गया जो कुछ वहां करते थे और नाबूद हुए जो उनके कर्म थे (14){16}
तो क्या वो जो अपने रब की तरफ़ से रौशन दलील पर हो(15)
और उस पर अल्लाह की तरफ़ से गवाह आए(16)
और इस से पहले मूसा की किताब (17)
पेशवा और रहमत, वो उसपर (18)
ईमान लाते हैं और जो उसका इन्कारी हो सारे गिरोहों में (19)
तो आग उसका वादा है, तो ऐ सुनने वाले तुझे कुछ इस में शक न हो, बेशक वह हक़ है तेरे रब की तरफ़ से लेकिन बहुत आदमी ईमान नहीं रखते {17} और उससे बढ़कर ज़ालिम कौन जो अल्लाह पर झूट बांधे(20)
वो अपने रब के हुज़ूर पेश किये जाएंगे(21)
और गवाह कहेंगे ये हैं जिन्होंने अपने रब पर झूट बोला था, अरे ज़ालिमों पर ख़ुदा की लअनत(22){18}
जो अल्लाह की राह से रोकते हैं और उसमें कजी चाहते हैं और वही आख़िरत के इन्कारी हैं {19} वो थकाने वाले नहीं ज़मीन में (23)
और न अल्लाह से अलग उनके कोई हिमायती (24)
उन्हें अज़ाब पर अज़ाब होगा (25)
वो न सुन सकते थे और न देखते (26){20}
वही हैं जिन्होंने अपनी जानें घाटे में डालीं और उनसे खोई उनसे खोई गई जो बातें जोड़ते थे{21}चाहे अनचाहे वही आख़िरत में सबसे ज़्यादा नुकसान में हैं (27){22}
बेशक जो ईमान लाए और अच्छे काम किये और अपने रब की तरफ़ रूजू लाए वो जन्नत वाले हैं वो उसमें हमेशा रहेंगे {23} दोनो फ़रीक (पक्षों) (28)
का हाल ऐसा है जैसे एक अंधा और बहरा और दूसरा देखता और सुनता (29)
क्या उन दोनो का हाल एक सा है (30)
तो क्या तुम ध्यान नहीं करते{24}

तफ़सीर 
सूरए  हूद – दूसरा रूकू

(1) स्वास्थ्य और अम्न का या आजिविका के विस्तार और धन का.

(2) कि दोबारा इस नेअमत के पाने से मायूस हो जाता है और अल्लाह के फ़ज़्ल से अपनी आशा तोड़ लेता है और सब्र व रज़ा पर जमा नहीं रहता और पिछली नेअमत की नाशुक्री करता है.

(3)  शुक्र गुज़ार होने और नेअमत का हक़ अदा करने के बजाय.

(4) मुसीबत पर साबिर और नेअमत पर शाकिर रहे.

(5) तिरमिज़ी ने कहा कि इस्तिफ़हाम नकार के अर्थ में है यानी आपकी तरफ़ जो वही होती है वह सब आप उन्हें पहुंचाएं और दिल तंग न हो. यह तबलीग़ों रिसालत की ताकीद है, हालांकि अल्लाह तआला जानता है कि उसके रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अपनी नबुव्वत का हक़ अदा करने में कमी करने वाले नहीं हैं और उसने उनको इससे मअसूम फ़रमाया है. इस ताकीद में रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली भी है और काफ़िरों की मायूसी भी. उनका हंसी उड़ाना नबुव्वत और तबलीग़ के काम में अड़चन नहीं हो सकता. अब्दुल्लाह बिन उमैय्या मख़ज़ूमी ने रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा था कि अगर आप सच्चे रसूल हैं और आपका ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है तो उसने आप पर ख़ज़ाना क्यों नहीं उतारा या आपके साथ कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं भेजा जो आपकी रिसालत की गवाही देता. इसपर यह आयत उतरी.

(6) तुम्हें क्या परवाह, अगर काफ़िर न मानें और हंसी बनाएं.

(7) मक्के के काफ़िर क़ुरआन शरीफ़ की निस्बत.

(8) क्योंकि इन्सान अगर ऐसा कलाम बना सकता है तो इस जैसा बनाना तुम्हारी क्षमता से बाहर न होगा. तुम अरब हो, अच्छी और साफ़ ज़बान वाले हो, कोशिश करो.

(9) अपनी मदद के लिये.

(10) इसमें कि यह कलाम इन्सान का बनाया हुआ है.

(11) और यक़ीन रखोगे कि यह अल्लाह की तरफ़ से है यानी कु़रआन का चमत्कार और कमाल देख लेने के बाद ईमान और इस्लाम पर जमे रहो.

(12) और अपनी कायरता से आख़िरत पर नज़र न रखता हो.

(13) और जो कर्म उन्होंने दुनिया की चाह के लिये किये हैं उनका बदला सेहत व दौलत, रिज़्क़ में विस्तार और औलाद में बहुतात वग़ैरह से दुनिया ही में पूरा कर देंगे.

(14) ज़िहाक ने कहा कि यह आयत मुश्रिकों के बारे में है कि अगर वो दूसरों के काम आएं या मोहताज़ों को दे या किसी परेशान हाल की मदद करें या इस तरह कि कोई और नेकी करें तो अल्लाह तआला रिज़्क़ में विस्तार वगैरह से उनके कर्मों का बदला दुनिया ही में दे देता है और आख़िरत में उनके लिये कोई हिस्सा नहीं. एक क़ौल यह है कि यह आयत मुनाफ़िक़ों के बारे में उतरी जो आख़िरत के सवाब पर तो विश्वास नहीं रखते थे और जिहादों में ग़नीमत का माल हासिल करने के लिये शामिल होते थे.

(15) वह उसकी मिस्ल हो सकता है जो दुनिया की ज़िन्दगी और उसकी आरायश चाहता हो ऐसा नहीं. इन दोनों में बहुत बड़ा अन्तर है. रौशन दलील से वह अक़्ली दलील मुराद है जो इस्लाम की सच्चाई को प्रमाणित करे और उस व्यक्ति से जो अपने रब की तरफ़ से रौशन दलील पर हो, वो यहूदी मुराद हें जो इस्लाम लाए जैसे कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम.

(16) और उसकी सेहत की गवाही दे. यह गवाह क़ुरआन शरीफ़ है.

(17) यानी तौरात.

(18) यानी क़ुरआन पर.

(19) चाहे कोई भी हों. हदीस शरीफ़ में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, उसकी क़सम जिसके दस्ते क़ुदरत में मुहम्मद की जान है, इस उम्मत में जो कोई भी है यहूदी हो या नसरानी, जिसको भी मेरी ख़बर पहुंचे और वह मेरे दीन पर ईमान लाए बिना मर जाए, वह ज़रूर जहन्नमी है.

(20) और उसके लिये शरीक और औलाद बताए. इस आयत से साबित होता है कि अल्लाह तआला पर झूट बोलना जुल्म है.

(21) क़यामत के दिन, और उनसे कर्म पूछे जाएंगे और नबियों और फ़रिश्तों की उनपर गवाही ली जाएगी.

(22) बुखारी और मुस्लिम की हदीस में है कि क़यामत के दिन काफ़िरों और दोग़ली प्रवृति वालों को सारी सृष्टि के सामने कहा जाएगा कि वो हैं जिन्होंने अपने रब पर झूठ बोला, ज़ालिमों पर ख़ुदा की लअनत. इस तरह वो सारी सृष्टि के सामने रूस्वा किये जाएंगे.

(23) अल्लाह को, अगर वह उनपर अज़ाब करना चाहे, क्योंकि वो उसके क़ब्ज़े और उसकी मिल्क में है, न उससे भाग सकते है न बच सकते हैं.

(24) कि उनकी मदद करें और उन्हें इसके अज़ाब से बचाएं.

(25) क्योंकि उन्होंने लोगों को ख़ुदा की राह से रोका और मरने के बाद उठने का इन्कार किया.

(26) क़तादा ने कहा कि वो सत्य सुनने से बहरे हो गए,तो कोई ख़ैर की बात सुनकर नफ़ा नहीं उड़ाते और न वह क़ुदरत की निशानियाँ देखकर फ़ायदा उठाते हैं.

(27) कि उन्होंने जन्नत की जगह जहन्नम को इख़्तियार किया.

(28) यानी काफ़िर और मूमिन.

(29) काफ़िर उसकी तरह है जो न देखे न सुने,यह दूषित है. और मूमिन उसकी तरह है जो देखता भी है और सुनता है. वह सम्पूर्ण है. सत्य और असत्य की पहचान रखता है.

(30) हरगिज़ नहीं.

सूरए हूद – तीसरा रूकू

सूरए  हूद – तीसरा रूकू

और बेशक हमने नूह को उसकी क़ौम की तरफ़ भेजा(1)
कि मैं तुम्हारे लिये साफ़ डर सुनाने वाला हूँ {25} कि अल्लाह के सिवा किसी को न पूजो बेशक मैं तुमपर एक मुसीबत वाले दिन के अज़ाब से डरता हूँ(2){26}
तो उसकी क़ौम के सरदार जो काफ़िर हुए थे बोले हम तो तुम्हें अपने ही जैसा आदमी देखते हैं (3)
और हम नहीं देखते कि तुम्हारी पैरवी (अनुकरण) किसी ने की हो मगर हमारे कमीनों (4)
सरसरी नज़र से (5)
और हम तुम में अपने ऊपर कोई बड़ाई नहीं पाते(6)
बल्कि हम तुम्हें (7)
झूटा ख़याल करते हैं {27} बोला ऐ मेरी क़ौम भला बताओ तो अगर मैं अपने रब की तरफ़ से दलील पर हूँ (8)
और उसने मुझे अपने पास से रहमत बख़्शी (9)
तो तुम उससे अंधे रहे, क्या हम उसे तुम्हारे गले चपेट दें और तुम बेज़ार हो (10){28}
और ऐ क़ौम मैं तुमसे कुछ इसपर (11)
माल नहीं मांगता (12)
मेरा अज़्र तो अल्लाह ही पर है और मैं मुसलमानों को दूर करने वाला नहीं (13)
बेशक वो अपने रब से मिलने वाले हैं (14)
लेकिन मैं तुमको निरे जाहिल लोग पाता हूँ (15){29}
और ऐ क़ौम मुझे अल्लाह से कौन बचा लेगा अगर मैं उन्हें दूर करूंगा, तो क्या तुम्हें ध्यान नहीं {30} और मैं तुम से नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़जाने हैं और न यह कि मैं ग़ैब (अज्ञात) जान लेता हूँ और न यह कहता हूँ कि मैं फ़रिश्ता हूँ (16)
और मैं उन्हें नहीं कहता जिनको तुम्हारी निगाहें हक़ीर (तुच्छ) समझती हैं कि हरगिज़ उन्हें अल्लाह कोई भलाई न देगा, अल्लाह ख़ूब जानता है जो उनके दिलों में है (17)
ऐसा करूं (18)
तो ज़रूर मैं ज़ालिमों में से हूँ (19){31}
बोले ऐ नूह हम से झगड़े और बहुत ही झगड़े तो लेआओ जिसका (20)
हमें वादा दे रहे हो अगर तुम सच्चे हो {32} बोला वह तो अल्लाह तुमपर लाएगा अगर चाहे और तुम थका न सकोगे (21){33}
और तुम्हें मेरी नसीहत नफ़ा न देगी अगर मैं तुम्हारा भला चाहूँ जबकि अल्लाह तुम्हारी गुमराही चाहे, वह तुम्हारा रब है और उसी की तरफ़ फिरोगे(22){34}
क्या ये कहते हैं कि इन्होंने उसे अपने जी से बना लिया (23)
तुम फ़रमाओ अगर मैं ने बना लिया होगा तो मेरा गुनाह मुझ पर है (24)
और मैं तुम्हारे गुनाह से अलग हूँ {35}

तफ़सीर 
सूरए  हूद – तीसरा रूकू

(1) उन्होंने क़ौम से फ़रमाया.

(2) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम चालीस साल के बाद नबी बनाए गए और नौ सौ पचास साल अपनी क़ौम को दावत फ़रमाते रहे और तूफ़ान के बाद साठ बरस दुनिया में रहे़, तो आपकी उम्र एक हज़ार पचास साल की हुई. इसके अलावा उम्र शरीफ़ के बारे में और भी क़ौल हैं (ख़ाज़िन)

(3) इस गुमराही में बहुत सी उम्मतें पड़ कर. इस्लाम में भी बहुत से बदनसीब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को बशर कहते हैं और हमसरी और बराबरी का फ़ासिद ख़याल रखते हैं. अल्लाह तआला उन्हें गुमराही से बचाए.

(4) कमीनों से मुराद उनकी, वो लोग थे जो उनकी नज़र में छोटे पेशे रखते थे. हक़ीक़त यह है कि उनका यह क़ौल ख़ालिस जिहालत था, क्योंकि इन्सान का मर्तबा दीन के पालन और रसूल की फ़रमाँबरदारी से है. माल, मन्सब और पेशे को इसमें दख़ल नहीं. दीनदार, नेक सीरत, पेशावर को हिक़ारत से देखना और तुच्छ समझना जिहालत का काम है.

(5) यानी बग़ैर ग़ौरों फ़िक्र के.

(6) माल और रियासत में, उनका यह क़ौल भी जिहालत भरा था, क्योंकि अल्लाह के नज़दीक बन्दे के लिये ईमान और फ़रमाँबरदारी बुज़ु्र्गी का कारण है, न कि माल और रियासत.

(7) नबुव्वत के दावे में और तुम्हारे मानने वालों को इसकी तस्दीक़ में.

(8) जो मेरे दावे की सच्चाई पर गवाह हो.

(9) यानी नबुव्वत अता की.

(10)  और हुज्जत या तर्क को नापसन्द रखते हो.

(11) यानी तबलीग़े रिसालत पर.

(12) कि तुमपर इसका अदा करना बोझ हो.

(13) यह हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने उनकी उस बात के जवाब में फ़रमाया था जो लोग कहते थे कि ऐ नूह, नीचे लोगों को अपनी बैठक से निकाल दीजिये, ताकि हमें आपकी मजलिस में बैठने से शर्म न आए.

(14) और उसके क़ुर्ब से फ़ायज़ होंगे तो मैं उन्हें कैसे निकाल दूँ.

(15) ईमानदारों को नीच कहते हो और उनकी क़द्र नहीं करते और नहीं जानते कि तुम से बेहतर है.

(16) हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की क़ौम ने आपकी नबुव्वत में तीन संदेह किये थे. एक शुबह तो यह कि“मा नरा लकुम अलैना मिन फ़दलिन” कि हम तुम में अपने ऊपर कोई बड़ाई नहीं पाते. यानी तुम माल दौलत में हमसे ज़्यादा नहीं हो. इसके जवाब में हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया “ला अक़ूलो लकुम इन्दी ख़ज़ाइनुल्लाह” यानी मैं तुमसे नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं. तो तुम्हारा यह ऐतिराज़ बिल्कुल बे बुनियाद है. मैंने कभी माल की फ़ज़ीलत नहीं जताई और दुनिया की दौलत की तुम को आशा नहीं दिलाई और अपनी दावत को माल के साथ नहीं जोड़ा. फिर तुम यह कैसे कह सकते हो कि हम तुम में कोई माली फ़ज़ीलत नहीं पाते. और तुम्हारा यह ऐतिराज़ बिल्कुल बेहूदा है. दूसरा शुबह क़ौमे नूह ने यह किया था “मा नराकत तबअका इल्लल लज़ीना हुम अराज़िलुना बादियर राये” यानी हम नहीं देखते कि तुम्हारी किसी ने पैरवी की हो मगर हमारे कमीनों ने. सरसरी नज़र से मतलब यह था कि वो भी सिर्फ़ ज़ाहिर में मूमिन हैं, बातिन में नहीं. इसके जवाब में हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने यह फ़रमाया कि मैं नहीं कहता कि मैं ग़ैब जानता हूँ तो मेरे अहकाम ग़ैब पर आधारित हैं ताकि तुम्हें यह ऐतिराज़ करने का मौक़ा होता. जब मैंने यह कहा ही नहीं  तो ऐतिराज़ बे महल है और शरीअत में ज़ाहिर का ऐतिबार है. लिहाज़ा तुम्हारा ऐतिराज़ बिल्कुल बेजा है . साथ ही “ला अअलमुल ग़ैबा” फ़रमाने में क़ौम पर एक लतीफ़ तअरीज़ भी है कि किसी के बातिन पर हुक्म लगाना उसका काम है जो ग़ैब का इल्म रखता हो. मैंने तो इसका दावा नहीं किया, जबकि मैं नबी हूँ. तुम किस तरह कहते हो कि वो दिल से ईमान नहीं लाए. तीसरा संदेह इस क़ौम का यह था कि “मा नराका इल्ला बशरम मिस्लुना” यानी हम तुम्हें अपने ही जैसा आदमी देखते हैं. इसके जवाब में फ़रमाया कि मैं ने अपनी दावत को अपने फ़रिश्ते होने पर आधारित नहीं किया था कि तुम्हें यह ऐतिराज़ का मौक़ा मिलता कि जताते तो थे वह अपने आप को फ़रिश्ता और थे बशर. लिहाज़ा तुम्हारा यह ऐतिराज़ भी झूटा है.

(17) नेकी या बुराई, सच्ची वफ़ादारी या दोहरी प्रवृति.

(18) यानी अगर मैं उनके ज़ाहिरी ईमान को झुटलाकर उनके बातिन पर इल्ज़ाम लगाऊं और उन्हें निकाल दूँ.

(19) और अल्लाह का शुक्र है कि मैं ज़ालिमों में से हरगिज़ नहीं हूँ तो ऐसा कभी न करूंगा.

(20) अज़ाब.

(21) उसको अज़ाब करने से, यानी न उस अज़ाब को रोक सकोगे और न उससे बच सकोगे.

(22) आख़िरत में वही तुम्हारे अअमाल का बदला देगा.

(23) और इस तरह ख़ुदा के कलाम और उसे मानने से बचते हैं और उसके रसूल पर लांछन लगाते हैं और उनकी तरफ़ झूट बांधते हैं जिनकी सच्चाई खुले प्रमाणों और मज़बूत तर्कों से साबित हो चुकी है. लिहाज़ा अब उसने.

(24) ज़रूर इसका वबाल आएगा लेकिन अल्लाह के करम से मैं सच्चा हूँ तो तुम समझ लो कि तुम्हारे झुटलाने और इन्कार का वबाल तुम पर पड़ेगा.

सूरए हूद – चौथा रूकू

और नूह को वही हुई कि तुम्हारी क़ौम से मुसलमान न होंगे मगर जितने ईमान ला चुके तो ग़म न खा उसपर जो वो करते हैं(1){36}
और किश्ती बनाओ हमारे सामने (2)
और हमारे हुक्म से और ज़ालिमों के बारे में मुझसे बात न करना (3)
वो ज़रूर डुबाए जाएंगे(4){37}
और नूह किश्ती बनाता है, और जब उसकी क़ौम के सरदार उसपर गुज़रते उसपर हंसते (5)
बोले अगर तुम हम पर हंसते हो तो एक वक़्त हम तुमपर हंसेगे(6)
जैसा तुम हंसते हो (7){38}
तो अब जान जाओगे किसपर आता है वह अज़ाब कि उसे रुसवा करे (8)
और उतरता है वह अज़ाब जो हमेशा रहे (9){39}
यहाँ तक कि जब हमारा हुक्म आया (10)
और तनूर उबला (11)
हमने फ़रमाया किश्ती में सवार करले हर जिन्स(नस्ल)में से एक जोड़ा नर और मादा और जिनपर बात पड़ चुकी है(12)
उनके सिवा अपने घरवालों और बाक़ी मुसलमानों को और उसके साथ मुसलमान न थे मगर थोड़े(13){40} 
और बोला इसमें सवार हो (14)
अल्लाह के नाम पर इसका चलना और इसका ठहरना (15)
बेशक मेरा रब ज़रूर बख़्शने वाला मेहरबान है {41} और वह उन्हें लिये जा रही है ऐसी मौजों में जैसे पहाड़ (16)
और नूह ने अपने बेटे को पुकारा और वह उससे किनारे था(17)
ऐ मेरे बच्चे हमारे साथ सवार हो जा और काफ़िरों के साथ न हो (18){42}
बोला अब मैं किसी पहाड़ की पनाह लेता हूँ वह मुझे पानी से बचा लेगा, कहा आज अल्लाह के अज़ाब से कोई बचाने वाला नहीं मगर जिसपर वह रहम करे, और उनके बीच में मौज आड़े आई तो वह डूबतों में रह गया(19){43}
और हुक्म फ़रमाया गया कि ऐ ज़मीन अपना पानी निगल ले और आसमान थम जा और पानी ख़ुश्क कर दिया गया और काम तमाम हुआ और किश्ती(20)
जूदी पहाड़ पर ठहरी (21)
और फ़रमाया गया कि दूर हों बे इन्साफ़ लोग {44} और नूह ने अपने रब को पुकारा अर्ज़ की ऐ मेरे रब मेरा बेटा भी तो मेरा घर वाला है (22)
और बेशक तेरा वादा सच्चा है और तू सबसे बढ़कर हुक्म वाला(23){45}
फ़रमाया ऐ नूह वह तेरे घरवालों में नहीं (24)
बेशक उसके काम बड़े नालायक़ हैं तो मुझ से वह बात न मांग जिसका तुझे इल्म नहीं(25)
मैं तुझे नसीहत फ़रमाता हूँ कि नादान न बन {46} अर्ज़ की ऐ मेरे रब मैं तेरी पनाह चाहता हूँ कि तुझसे वह चीज़ मांगू जिसका मुझे इल्म नहीं, और अगर तू मुझे न बख़्शे और रहम न करे तो मैं ज़ियाँकार (नुक़सान वाला) हो जाऊं{47} फ़रमाया गया ऐ नूह किश्ती से उतर हमारी तरफ़ से सलाम और बरकतों के साथ(26)
जो तुझपर है और तेरे साथ के कुछ गिरोहों पर (27)
और कुछ गिरोह हैं जिन्हें हम दुनिया बरतने देंगे(28)
फिर उन्हें हमारी तरफ़ से दर्दनाक अज़ाब पहुंचेगा(29){48}
ये ग़ैब की ख़बरें हम तुम्हारी तरफ़ वही (अल्लाह का कलाम) करते हैं (30)
इन्हें न तुम जानते थे न तुम्हारी क़ौम इस (31)
से पहले तो सब्र करो (32),
बेशक भला अंजाम परहेज़गारों का(33){49}

तफ़सीर 
सूरए हूद – चौथा रूकू

(1) यानी कुफ़्र और आपको झुटलाना और आपको कष्ट देना, क्योंकि अब आपके दुश्मनों से बदला लेने का वक़्त आ गया.

(2)  हमारी हिफ़ाज़त में हमारी तालीम से.

(3)  यानी उनकी शफ़ाअत और अज़ाब दूर होने की दुआ न करना, क्योंकि उनका डूबना लिख दिया गया है.

(4) हदीस शरीफ़ में है कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के हुक्म से साल के दरख़्त बोए. बीस साल में ये दरख़्त तैयार हुए. इस अर्से में कोई बच्चा पैदा न हुआ. इससे पहले जो बच्चे पैदा हो चुके थे वो बालिग़ हो गए और उन्होंने भी हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की दावत क़ुबूल करने से इन्कार कर दिया और हज़रत नूह किश्ती बनाने में मश्गू़ल हुए.

(5) और कहते ऐ नूह क्या कर रहे हो, आप फ़रमाते ऐसा मकान बनाता हूँ जो पानी पर चले. यह सुनकर हंसते, क्योंकि आप किश्ती जंगल में बनाते थे, जहाँ दूर दूर तक पानी न था. वो लोग मज़ाक उड़ाने के अन्दाज़ में यह भी कहते थे कि पहले तो आप नबी थे, अब बढ़ई हो गए.

(6)  तुम्हें हलाक होता देखकर.

(7) किश्ती देखकर. रिवायत है कि यह किश्ती दो साल में तैयार हुई. इसकी लम्बाई तीन सौ ग़ज़, चौड़ाई पचास गज़, ऊंचाई तीस गज़ थी, (इस में और भी कथन हैं) इस किश्ती में तीन दर्ज़े बनाए गए थे. निचले दर्जे में जानवर और दरिन्दे, बीच के तबक़े में चौपाए वग़ैरह, और ऊपर के तबक़े में ख़ुद हज़रत नूह अलैहिस्सलाम और आपके साथी और हज़रत आदम अलैहिस्सलाम का जसदे मुबारक, जो औरतों और मर्दों के बीच हायल था, और ख़ाने का सामान था. पक्षी भी ऊपर के ही तबक़े में थे. (खाज़िन व मदारिक)

(8) दुनिया में और डूबने का अज़ाब है.

(9) यानी आख़िरत का अज़ाब.

(10) अज़ाब व हलाकत का.

(11) और पानी ने इसमें से जोश मारा. तन्दूर से, या ज़मीन का ऊपरी हिस्सा मुराद है, या यही तन्दुर जिसमें रोटी पकाई जाती है. इसमें भी कुछ क़ौल हैं. एक यह है कि वह तन्दूर पत्थर का था, हज़रत हव्वा का, जो आपको तर्के में पहुंचा था, और वह या शाम में था, या हिन्द में. तन्दूर का जोश मारना अज़ाब आने की निशानी थी.

(12) यानी उनके हलाक का हुक्म हो चुका है. और उन से मुराद आपकी बीबी वाइला जो ईमान न लाई थी और आपका बेटा कनआन है. चुनांचे हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने उन सबको सवार किया. जानवर आपके पास आते थे और आपका दायाँ हाथ नर पर और बायां मादा पर पड़ता था और आप सवार करते जाते थे.

(13) मक़ातिल ने कहा कि कुल मर्द औरत बहत्तर थे. इसमें और कथन भी है. सही संख्या अल्लाह जानता है. उनकी तादाद और किसी सही हदीस में नहीं आई है.

(14) यह कहते हुए कि…..

(15) इसमें तालीम है कि बन्दे को चाहिये जब कोई काम करना चाहे तो बिस्मिल्लाह पढ़कर शुरू करे ताकि उस काम में बरकत हो और वह भलाई का कारण बने. ज़िहाक ने कहा कि जब हज़रत नूह अलैहिस्सलाम चाहते थे कि किश्ती चले तो बिस्मिल्लाह फ़रमाते थे. किश्ती चलने लगती थी, और जब चाहते थे कि ठहर जाए, बिस्मिल्लाह फ़रमाते थे, ठहर जाती थी.

(16) चालीस दिन रात आसमान से वर्षा होती रही और ज़मीन से पानी उबलता रहा, यहाँ तक कि सारे पहाड़ डूब गए.

(17) यानी हज़रत नूह अलैहिस्सलाम से अलग था, आपके साथ सवार न हुआ था.

(18) कि हलाक हो जाएगा. यह लड़का दोग़ली प्रवृति का था. अपने बाप पर खुद को मुसलमान ज़ाहिर करता था और अन्दर अन्दर काफ़िरों के साथ मिला हुआ था. (हुसैनी)

(19) जब तुफ़ान अपनी चरम सीमा पर पहुंचा और काफ़िर डूब चुके तो अल्लाह का हुक्म आया.

(20) छ: महीने सारी धरती की परिक्रमा यानी तवाफ़ करके.

(21) जो मूसल या शाम की सीमाओ में स्थित है. हज़रत नूह अलैहिस्सलाम किश्ती में दसवीं रजब को बैठे और दसवीं मुहर्रम को किश्ती जूदी पहाड़ पर ठहरी. तो आपने उसके शुक्र का रोज़ा रखा और अपने साथियों को भी रोज़े का हुक्म फ़रमाया.

(22) और तूने मुझ से मेरे और मेरे घर वालों की निजात का वादा फ़रमाया.

(23) तो इसमें क्या हिकमत है. शैख अबू मन्सूर मातुरीदी रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम का बेटा कनआन मुनाफ़िक़ था और आपके सामने ख़ुद को ईमान वाला ज़ाहिर करता था. अगर वह अपना कुफ़्र ज़ाहिर कर देता तो अल्लाह तआला से उसकी निजात की दुआ न करते. (मदारिक)

(24) इससे साबित हुआ कि नसब के रिश्ते से दीन का रिश्ता ज़्यादा मज़बूत है.

(25) कि वह मांगने के क़ाबिल है या नहीं.

(26) इन बरकतों से आपकी सन्तान और आपके अनुयाइयों की कसरत और बहुतात मुराद है कि बहुत से नबी और दीन के इमाम आपकी पाक नस्ल से हुए. उनकी निस्बत फ़रमाया कि ये बरकतें………

(27) मुहम्मद बिन कअब खुज़ाई ने कहा कि इन गिरोहो में क़यामत तक होने वाला हर मूमिन दाख़िल है.

(28) इससे हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के बाद पैदा होने वाले काफ़िर गिरोह मुराद है जिन्हें अल्लाह तआला उनकी मीआदों तक फ़राख़ी, ऐश और रिज़्क़ में बहुतात अता फ़रमाएगा.

(29) आख़िरत में.

(30) ये सम्बोधन सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को फ़रमाया.

(31) ख़बर देने.

(32) अपनी क़ौम की तकलीफ़ों पर, जैसा कि नूह अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम की तकलीफ़ों पर सब्र किया.

(33) कि दुनिया में कामयाब और विजयी और आख़िरत में इनाम और अच्छा बदला पाए हुए.

सूरए हूद – पाँचवा रूकू

सूरए  हूद – पाँचवा रूकू

और आद की तरफ़ उनके हम क़ौम हूद को(1)
कहा ऐ मेरी क़ौम अल्लाह को पूजो(2)
उसके सिवा तुम्हारा कोई मअबूद नहीं तुम तो निरे मुफ़तरी (झूठे) हो (3){50}
ऐ क़ौम में उसपर तुमसे कुछ उजरत नहीं मांगता,मेरी मज़दूरी तो उसीके ज़िम्मे है जिसने मुझे पैदा किया(4)
तो क्या तुम्हें अक़्ल नहीं(5){51}
और ऐ मेरी क़ौम अपने रब से माफ़ी चाहो(6)
फिर उसकी तरफ़ रूजू लाओ तुमपर ज़ौर का पानी भेजेगा और तुममें जितनी शक्ति है उससे और ज़्यादा देगा(7)
और ज़ुर्म करते हुए रूगदीनी(विरोध) न करो(8){52}
बोले ऐ हूद तुम कोई दलील लेकर हमारे पास न आए(9)
और हम ख़ाली तुम्हारे कहने से अपने ख़ुदाओ को छोड़ने के नहीं न तुम्हारी बात पर यक़ीन लाएं{53} हम तो यही कहते हैं कि हमारे किसी ख़ुदा की तुम्हें बुरी झपट पहुंची(10)
कहा मैं अल्लाह को गवाह करता हूँ और तुम सब गवाह हो जाओ कि मैं बेज़ार हूँ उन सब से जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा उसका शरीक ठहराते हो{54} तुम सब मिलकर मेरा बुरा चाहो (11)
फिर मुझे मुहलत न दो (12){55} 
मैंने अल्लाह पर भरोसा किया जो मेरा रब है और तुम्हारा रब, कोई चलने वाला नहीं(13)
जिसकी चोटी उसकी क़ुदरत के क़ब्ज़े में न हो(14)
बेशक मेरा रब सीधे रास्ते पर मिलता है{56} फिर अगर तुम मुंह फेरो तो मैं तुम्हें पहुंचा चुका जो तुम्हारी तरफ़ लेकर भेजा गया(15)
और मेरा रब तुम्हारी जगह औरों को ले आएगा(16)
और तुम उसका कुछ न बिगाड़ सकोगे(17)
बेशक मेरा रब हर चीज़ पर निगहबान है (18){57}
और जब हमारा हुक्म आया हमने हूद और उसके साथ के मुसलमानों को(19)
अपनी रहमत फ़रमाकर बचा लिया(20)
और उन्हें(21)
सख़्त अज़ाब से निजात दी{58} और ये आद हैं (22)
कि अपने रब की आयतों से इन्कारी हुए और उसके रसूलों की नाफ़रमानी की और हर बड़े सरकश(नाफ़रमान) हटधर्म के कहने पर चले{59} और उनके पीछे लगी इस दुनिया में लअनत  और क़यामत के दिन, सुन लो बेशक आद अपने रब से इन्कारी हुए, अरे दूर हों आद हूद की क़ौम {60}

तफ़सीर 
सूरए हूद – पाँचवा रूकू

(1) नबी बनाकर भेजा. हज़रत हूद अलैहिस्सलाम को “अख़” नसब के ऐतिबार से कहा गया है इसीलिये आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा रहमुतल्लाह अलैह ने इस शब्द का अनुवाद हम क़ौम किया.

(2) उसकी तौहीद को मानते रहो. उसके साथ किसी को शरीक न करो.

(3) जो बुतों को ख़ुदा का शरीक बताते हो.

(4) जितने रसूल तशरीफ़ लाए सबने अपनी क़ौमों से यही फ़रमाया और नसीहत ख़ालिस वही है जो किसी लालच से न हो.

(5) इतना समझ सको कि जो केवल बेग़रज़ नसीहत करता है वह यक़ीनन शुभचिंतक और सच्चा है. बातिल वाला जो किसी को गुमराह करता है, ज़रूर किसी न किसी मतलब और किसी न किसी उद्देश्य से करता है. इससे सच झूठ में आसानी से पहचान की जा सकती है.

(6) ईमान लाकर, जब आद क़ौम ने हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की दावत क़ुबूल न की तो अल्लाह तआला ने उनके कुफ़्र के कारण तीन साल तक बारिश बन्द कर दी और बहुत सख़्त दुष्काल नमूदार हुआ और उनकी औरतों को बांझ कर दिया. जब ये लोग बहुत परेशान हुए तो हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने वादा फ़रमाया कि अगर वो अल्लाह पर ईमान लाएं और उसके रसूल की तस्दीक़ करे और उनके समक्ष तौबह व इस्तग़फ़ार करें तो अल्लाह तआला बारिश भेजेगा और उनकी ज़मीनों को हरा भरा करके ताज़ा ज़िन्दगी अता फ़रमाएगा और क़ुव्वत और औलाद देगा. हज़रत इमाम हसन रदियल्लाहो अन्हो एक बार अमीरे मुआविया के पास तशरीफ़ ले गए तो आप से अमीर मुआविया के एक नौकर ने कहा कि मैं मालदार आदमी हूँ मगर मेरे कोई औलाद नहीं हे मुझे कोई ऐसी चीज़ बताइये जिससे अल्लाह मुझे औलाद दे. आपने फ़रमाया कि रोज़ाना इस्तग़फ़ार पढ़ा करो. उसने इस्तग़फ़ार की यहाँ तक कसरत की कि रोज़ाना सात सौ बार इस्तग़फ़ार पढ़ने लगा. इसकी बरकत से उस शख़्स के दस बेटे हुए. यह ख़बर हज़रत मुआविया को हुई तो उन्होंने उस शख़्स से फ़रमाया कि तूने हज़रत इमाम से यह क्यों न दरियाफ़्त किया कि यह अमल हुज़ूर ने कहाँ से हासिल फ़रमाया. दूसरी बार जब उस शख्स की हाज़िरी इमाम की ख़िदमत में हुई तो उसने यह दरियाफ़्त किया. इमाम ने फ़रमाया कि तू ने हज़रत हूद का क़ौल नहीं सुना जो उन्होंने फ़रमाया “यज़िदकुम क़ुव्वतन इला क़ुव्वतिकुम” और हज़रत नूह अलैहिस्सलाम का यह इरशाद “युमदिदकुम बि अमवालिंव व बनीन”. रिज़्क में कसरत और औलाद पाने के लिये इस्तग़फ़ार का बहुतात के साथ पढ़ना क़ुरआनी अमल है.

(7) माल और औलाद के साथ.

(8) मेरी दावत से.

(9) जो तुम्हारे दावे की सच्चाई का प्रमाण है. और यह बात उन्होंने बिल्कुल ग़लत और झूट कही थी. हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने उन्हें जो चमत्कार दिखाए थे उन सबसे इन्कार कर बैठे.

(10) यानी तुम जो बुत को बुरा कहते हो, इसलिये उन्होंने तुम्हें दीवाना कर दिया. मतलब यह है कि अब जो कुछ कहते हो यह दीवानगी की बातें है.

(11) यानी तुम और वो जिन्हें तुम मअबूद समझते हो, सब मिलकर मुझे नुक़सान पहुंचाने की कोशिश करो.

(12) मुझे तुम्हारी और तुम्हारे मअबूदों की और तुम्हारी मक्कारियों की कुछ परवाह नहीं है और मुझे तुम्हारी शानो शौकत और क़ुव्वत से कुछ डर नहीं. जिन को तुम मअबुद कहते हो, वो पत्थर बेजान हैं, न किसी को नफ़ा पहुंचा सकते हैं न नुक़सान. उनकी क्या हक़ीक़त कि वो मुझे दीवाना बना सकते. यह हज़रत हूद अलैहिस्सलाम का चमत्कार है कि आपने एक जबरदस्त और ताकतवर क़ौम से, जो आपके ख़ून की प्यासी और जान की दुश्मन थी, इस तरह के कलिमात फ़रमाए और कुछ भी ख़ौफ़ न किया और वह क़ौम अत्यन्त दुश्मनी के बावुजूद आपको तकलीफ़ न पहुंचा सकी.

(13) इसी में बनी आदम और हेवान सब आ गए.

(14) यानी वह सबका मालिक है और सब पर ग़ालिब और क़ुदरत वाला और क्षमता वाला है.

(15) और हुज्जत साबित हो चुकी.

(16) यानी अगर तुमने ईमान से मुंह फेरा और जो अहकाम मैं तुम्हारी तरफ़ लाया हूँ उन्हें क़ुबूल न किया तो अल्लाह तुम्हें हलाक कर देगा और तुम्हारे साथ तुम्हारे बजाय एक दूसरी क़ौम को तुम्हारे इलाक़ों और तुम्हारे मालों का मालिक बना देगा, जो उसकी तौहीद में अक़ीदा रखते हों और उसकी इबादत करें.

(17) क्योंकि वह इससे पाक है कि उसे कोई तकलीफ़ पहुंचे लिहाज़ा तुम्हारे मुंह फेरने का जो नुक़सान है वह तुम्हीं को पहुंचेगा. अज़ाब का हुक्म लागू हुआ.

(18) और किसी की कहनी करनी उससे छुपी नहीं. जब क़ौमे हूद ने नसीहत क़ुबूल न की तो अल्लाह तआला की तरफ़ से उनके अज़ाब का हुक्म लागू हुआ.

(19) जिनकी संख्या चार हज़ार थी.

(20) और क़ौमे आद को हवा के अज़ाब से हलाक कर दिया.

(21) यानी जैसे मुसलमानों को दुनिया के अज़ाब से बचाया ऐसे ही आखिरत के.

(22) यह सम्बोधन है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की उम्मत को और “तिल्का” इशारा है क़ौमे आद की क़ब्रों और उनके मकानों वग़ैरह की तरफ़. मक़सद यह है कि ज़मीन में चलो उन्हें देखो और सबक़ पकड़ो.

सूरए हूद – छटा रूकू

सूरए  हूद – छटा रूकू



और समूद की तरफ़ उनके हम क़ौम सालेह को(1)
कहा ऐ मेरी क़ौम अल्लाह को पूजो(2)
उसके सिवा तुम्हारा कोई मअबूद नही(3)
उसने तुम्हें ज़मीन से पैदा किया(4)
और उसमें तुम्हें बसाया(5)
तो उससे माफ़ी चाहो फिर उसकी तरफ़ रूजू लाओ, बेशक मेरा रब क़रीब है दुआ  सुनने वाला {61} बोले ऐ सालेह इससे पहले तो तुम हम में होनहार मालूम होते थे (6)
क्या तुम हमें इससे मना करते हो कि अपने बाप दादा के मअबूदों को पूजें और बेशक जिस बात की तरफ़ हमें बुलाते हो हम उससे एक बड़े धोखा डालने वाले शक में हैं {62} बोला ऐ मेरी क़ौम भला बताओ तो अगर मैं अपने रब की तरफ़ से रौशन दलील पर हूँ और उसने मुझे अपने पास से रहमत बख़्शी (7)
तो मुझे उससे कौन बचाएगा और मैं उसकी नाफ़रमानी करूं(8)
तो तुम मुझे सिवा नुक़सान के कुछ न बढ़ाओगे(9){63}
और मेरी क़ौम यह अल्लाह का नाक़ा{ऊंटनी}है तुम्हारे लिये निशानी तो इसे छोड़ दो कि अल्लाह की ज़मीन में खाए और इसे बुरी तरह हाथ न लगाना कि तुमको नज़दीक अज़ाब पहुंचेगा(10){64}
तो उन्होंने(11)
उसकी कूंचे काटीं तो सालेह ने कहा अपने घरों में तीन दिन और बरत लो(12)
यह वादा है कि झूटा न होगा(13){65}
फिर जब हमारा हुक्म आया हमने सालेह और उसके साथ के मुसलमानों को अपनी रहमत फ़रमाकर (14)
बचा लिया और उस दिन की रूसवाई से, बेशक तुम्हारा रब क़वी {शक्तिशाली} इज़्ज़त वाला है {66}
और ज़ालिमों को चिंघाड़ ने आ लिया(15)
तो सुबह अपने घरों में घुटनों के बल पड़े रह गए {67} मानो कभी यहाँ बसे ही न थे, सुन लो बेशक समूद अपने रब से इन्कारी हुए, अरे लअनत हो समूद पर {68}

तफ़सीर 
सूरए हूद – छटा रूकू

(1) भेजा तो हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम ने उन से.

(2) और उसकी वहदानियत को मानो.

(3) सिर्फ़ वही इबादत के लायक़ है, क्योंकि

(4) तुम्हारे दादा हज़रत  आदम अलैहिस्सलाम को इससे पैदा करके और तुम्हारी नस्ल की अस्ल नुत्फ़ों के माद्दों को इससे बनाकर.

(5) और ज़मीन को तुमसे आबाद किया. ज़िहाक ने “इस्तअमरकुम” के मानी ये बयान किये हैं कि तुम्हें लम्बी उम्रें दीं यहाँ तक कि उनकी उम्रें तीन सौ बरस से लेकर हज़ार बरस तक की हुई.

(6) और हम उम्मीद करते थे कि तुम हमारे सरदार बनोगे क्योंकि आप कमज़ोरों की मदद करते थे. फ़क़ीरों पर सख़ावत फ़रमाते थे. जब आपने तौहीद की दावत दी और बुतों की बुराईयाँ बयान कीं तो क़ौम की उम्मीदें आपसे कट गई और कहने लगे.

(7) हिकमत  और नबुव्वत अता की.

(8) रिसालत की तबलीग़ और बुत परस्ती से रोकने में.

(9) यानी मुझे तुम्हारे घाटे का अनुभव और ज़्यादा होगा.

(10) क़ौमे समूद ने हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम से चमत्कार तलब किया था (जिसका बयान सूरए अअराफ़ में हो चुका है) आपने अल्लाह तआला से दुआ की तो अल्लाह के हुक्म से पत्थर से ऊंटनी पैदा हुई. यह ऊंटनी उनके लिये निशानी और चमत्कार था. इस आयत में उस ऊंटनी के बारे में अहकाम इरशाद फ़रमाए गए कि उसे ज़मीन में चरने दो और कोई तकलीफ़ न पहुंचाओ. वरना दुनिया ही में अज़ाब में जकड़े जाओगे और मोहलत न पाओगे.

(11) अल्लाह के हुक्म का विरोध किया और बुधवार के.

(12) यानी जुमुए तक जो कुछ दुनिया का ऐश करना है कर लो. शनिवार को तुम पर अज़ाब आएगा पहले रोज़ तुम्हारे चेहरे पीले हो जाएंगे, दूसरे रोज़ सुर्ख़ और तीसरे रोज़, यानी जुमुए को कोले, और सनीचर को अज़ाब नाज़िल हो जाएगा.

(13) चुनांचे ऐसा ही हुआ.

(14) इन बलाओ से.

(15) यानी भयानक आवाज़ ने जिसकी हैबत से उनके दिल फट गए और वो सब के सब मर गए.

सूरए हूद – सातवाँ रूकू

सूरए  हूद – सातवाँ रूकू

और बेशक हमारे फ़रिश्ते इब्राहीम के पास (1)
ख़ुशख़बरी लेकर आए, बोले सलाम(2)
कहा सलाम फिर कुछ देर न की कि एक बछड़ा भुना ले आए(3){69}
फिर जब देखा कि उनके हाथ खाने की तरफ़ नहीं पहुंचते उनको ऊपरी समझा और जी ही जी में उनसे डरने लगा, बोले डरिये नहीं हम लूत क़ौम की तरफ़ (4)
भेजे गए हैं {70} और  उसकी बीबी(5)
खड़ी थी वह हंसने लगी तो हमने उसे(6)
इसहाक़ की ख़ुशख़बरी दी और  इसहाक़ के पीछे(7)
यअक़ूब की(8) {71}
बोली हाय ख़राबी क्या मेरे बच्चा होगा और  मैं बूढी हूँ (9)
और ये हैं मेरे शौहर बूढे(10)
बेशक यह तो अचंभे की बात है{72} फ़रिश्ते बोले क्या अल्लाह के काम का अचंभा करती हो अल्लाह की रहमत और  उसकी बरकतें तुमपर इस घर वालो, बेशक(11)
वही है सब ख़ूबियों वाला इज़्ज़त वाला {73} फिर जब इब्राहीम का डर कम हुआ और उसे ख़ुशख़बरी मिली हम से लूत क़ौम के बारे में झगड़ने लगा (12){74}
बेशक इब्राहीम तहम्मुल वाला बहुत आहें करने वाला रूजू लाने वाला है (13){75}
ऐ इब्राहीम इस ख़याल में न पड़ बेशक तेरे रब का हुक्म आ चुका, और  बेशक उनपर अज़ाब आने वाला है कि फेरा न जाएगा {76} और  जब लूत के पास हमारे फ़रिश्ते आए(14)
उसे उनका ग़म हुआ और  उनके कारण दिल तंग हुआ और  बोला यह बड़ी सख़्ती का दिन है (15) {77}
और उसके पास उसकी क़ौम दौड़ती आई और उन्हें आगे ही से बुरे कामों की आदत पड़ी थी (16)
कहा ऐ क़ौम यह मेरी क़ौम की बेटियाँ हैं ये तुम्हारे लिये सुथरी हैं तो अल्लाह से डरो (17)
और मुझे मेरे मेहमानों में रूस्वा न करो, क्या तुम में एक आदमी भी नेक चलन नहीं{78} बोले तुम्हें मालूम है कि तुम्हारी क़ौम की बेटियों में हमारा कोई हक़ नहीं (18)
और  तुम ज़रूर जानते हो जो हमारी ख़्वाहिश है {79} बोले ऐ काश मुझे तुम्हारे मुक़ाबिल ज़ोर होता या किसी मज़बूत पाए की पनाह लेता (19) {80}
फ़रिश्ते बोले ऐ लूत हम तुम्हारे रब के भेजे हुए है (20)
वो तुम तक नहीं पहुंच सकते(21)
तो अपने घरवालों को रातों रात ले जाओ और तुममें कोई पीठ फेर कर न देखे(22)
सिवाए तुम्हारी औरत के उसे भी वही पहुंचना है जो उन्हें पहुंचेगा,(23)
बेशक उनका वादा सुबह के वक़्त है (24)
क्या सुबह क़रीब नहीं{81} फिर जब हमारा हुक्म आया हमने उस बस्ती के ऊपर उसका नीचा कर दिया(25)
और उसपर कंकर के पत्थर लगातार बरसाए{82} जो निशान किये हुए तेरे रब के पास हैं(26)
और वो पत्थर कुछ ज़ालिमों से दूर नहीं (27){83}

तफ़सीर 
सूरए हूद – सातवाँ रूकू

(1) सादा -रूप नौजवानों की सुंदर शक्लों में हज़रत इस्हाक़ और हज़रत यअक़ूब अलैहिस्सलाम की पैदाइश की.

(2) हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने.

(3) मुफ़स्सिरों ने कहा है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम बहुत ही मेहमान नवाज़ थे. बगैर मेहमान के खाना न खाते. उस वक़्त ऐसा इत्तिफ़ाक़ हुआ कि पन्द्रह रोज़ से कोई मेहमान न आया था. आप इस ग़म में थे. इन मेहमानों को देखते ही आपने उनके लिये खाना लाने में जल्दी फ़रमाई. चूंकि आप के यहाँ गायें बहुत थीं इसलिये बछड़े का भुना हुआ गोश्त सामने लाया गया. इससे मालूम हुआ कि गाय का गोश्त हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के दस्तरख़्वान पर ज़्यादा आता था और आप उसको पसन्द फ़रमाते थे. गाय का गोश्त ख़ाने वाले अगर सुन्नते इब्राहीम अलैहिस्सलाम अदा करने की नियत करे तो ज़्यादा सवाब पाएं.

(4) अज़ाब करने के लिये.

(5) हज़रत सारा पर्दे के पीछे.

(6) उसके बेटे.

(7) हज़रत इस्हाक़ के बेटे.

(8) हज़रत सारा को ख़ुशख़बरी देने की वजह यह थी कि औलाद की ख़ुशी औरतों को मर्दों से ज़्यादा होती है.और  यह कारण भी था कि हज़रत सारा के कोई औलाद न थी और इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बेटे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम मौजूद थे. इस ख़ुशख़बरी के साथ साथ एक ख़ुशख़बरी यह भी थी कि हज़रत सारा की उम्र इतनी लम्बी होगी कि वो पोते को भी देखेगी.

(9) मेरी उम्र नब्बे से ऊपर हो चुकी है.

(10) जिनकी उम्र एक सौ बीस साल की हो गई है.

(11) फ़रिश्तों के कलाम के माने ये हैं कि तुम्हारे लिये क्या आश्चर्य की बात है, तुम इस घर से हो जो चमत्कारों और अल्लाह तआला की रहमतों और बरकतों का केन्द्र बना हुआ है. इस आयत से साबित हुआ कि बीबियाँ एहले बैत में शामिल है.

(12) यानी कलाम और सवाल करने लगा और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का मुजादिला यह था कि आप ने फ़रिश्तों से फ़रमाया कि क़ौमे लूत की बस्तियों में अगर पचास ईमानदार हों तो भी उन्हें हलाक करोगे. फ़रिश्तों ने कहा, नहीं. फ़रमाया अगर चालीस हों, उन्होंने कहा जब भी नहीं, आपने फ़रमाया, और तीस हों. उन्होंने कहा, जब भी नहीं. आप इस तरह फ़रमाते रहे. यहाँ तक कि आपने फ़रमाया, अगर एक मुसलमान मर्द मौजूद हो तब हलाक कर दोगे, उन्होंने कहा, नहीं तो आपने फ़रमाया, इस में लूत अलैहिस्सलाम हैं. इसपर फ़रिश्तों ने कहा, हमें मालूम है जो वहाँ हैं. हम हज़रत लूत अलैहिस्सलाम को और उनके घर वालों को बचाएंगे सिवाए उनकी औरत के. हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का मक़सद यह था कि आप अज़ाब में देर चाहते थे ताकि इस बस्ती वालों को कुफ़्र और  गुनाह से बाज़ आने के लिये एक फ़ुर्सत और  मिल जाए. चुनांचे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की विशेषता में इरशाद होता है.

(13) इन विशेषताओ से आपकी रिक़्कतें क़ल्ब और आपकी राफ़त व रहमत मालूम होती है. जो इस बहस का कारण हुई. फ़रिश्तों ने कहा.

(14) हसीन सूरतों में, और  हज़रत लूत अलैहिस्स्लाम ने उनकी हैअत और जमाल को देखा तो क़ौम की ख़बासत और बदअमली का ख़याल करके.

(15) रिवायत है कि फ़रिश्तों को अल्लाह का हुक्म यह था कि वो क़ौमे लूत को उस वक़्त तक हलाक न करें जब तक कि हज़रत लूत अलैहिस्सलाम ख़ुद इस क़ौम की बद अमली पर चार बार गवाही न दें. चुनांचे जब ये फ़रिश्ते हज़रत लूत अलैहिस्सलाम से मिले तो आपने उनसे फ़रमाया क्या तुम्हें इस बस्ती वालों का हाल मालूम न था.फ़रिश्तों ने कहा, इनका क्या हाल है. आपने फ़रमाया मैं गवाही देता हूँ कि अमल के ऐतिबार से धरती के ऊपर यह बदतरीन बस्ती है. यह बात आपने चार बार फ़रमाई. हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की औरत जो काफ़िरा थी, निकली और उसने अपनी क़ौम को जाकर ख़बर कर दी कि हज़रत लूत अलैहिस्सलाम के यहाँ ऐसे ख़ूबसूरत मेहमान आए हैं जिनकी तरह का अब तक कोई शख़्स नज़र नहीं आया.

(16) और कुछ शर्मों-हया बाक़ी न रही थी. हज़रत लूत अलैहिस्सलाम ने.

(17) और अपनी बीबियों से तअल्लुक रखो  कि ये तुम्हारे लिये हलाल है. हज़रत लूत अलैहिस्सलाम ने उनकी औरतों को जो क़ौम की बेटियाँ थीं बुज़र्गाना शफ़क़त से अपनी बेटियाँ फ़रमाया ताकि इस हुस्ने इख़्लाक़ से वो फ़ायदा उठाएं और  हमिय्यत सीखें.

(18) यानी हमें उनकी रग़बत नहीं.

(19) यानी मुझे अगर तुम्हारे मुक़ाबले की ताक़त होती या ऐसा क़बीला रखता जो मेरी मदद करता तो तुम से मुक़ाबला और लड़ाई करता. हज़रत लूत अलैहिस्सलाम ने अपने मकान का द्वार बन्द कर लिया था और  अन्दर से यह बातचीत फ़रमा रहे थे. क़ौम ने चाहा की दीवार तोड़ दे. फरिश्तों ने आपका दुख और बेचैनी देखी तो.

(20)तुम्हारा पाया मज़बूत है. हम इन लोगों को अज़ाब करने के लिये आए हैं. तुम द्वार खोल दो और हमें और उन्हें छोड़ दो.

(21) और तुम्हें कोई तक़लीफ़ या नुक़सान नहीं पहुंचा सकते. हज़रत जिब्रील ने दरवाज़ा खोल दिया. क़ौम के लोग मकान में घुस आए. हज़रत जिब्रील ने अल्लाह के हुक्म से अपना बाज़ू उनके मुंह पर मारा सब अंधे हो गए और हज़रत लूत अलैहिस्सलाम के मकान से निकल भागे उन्हें रास्ता नज़र न आता था यह कहते जाते थे हाय हाय लूत के घर में बड़े जादूगर है उन्होंने हमें जादू कर दिया.फ़रिश्तों ने हज़रत लूत अलैहिस्सलाम से कहा.

(22) इस तरह आपके घर के सारे लोग चले गये.

(23) हज़रत लूत अलैहिस्सलाम ने कहा यह अजाब कब होगा, हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम ने कहा.

(24)हज़रत लूत अलैहिस्सलाम ने कहा, मैं तो इससे जल्दी चाहता हूँ हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम ने कहा.

(25) यानी उलट दिया, इस तरह कि हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम ने ज़मीन के जिस टुकड़े पर क़ौमे लूत के शहर थे, उसके नीचे अपना बाज़ू डाला और उन पाँचों शहरों को, जिनमें सबसे बड़ा सदूम था, और उनमें चार लाख आदमी बस्ते थे, इतना ऊंचा उठाया कि वहाँ के कुत्तों और मुर्गों की आवाज़ें आसमान पर पहुंचने लगीं और इस आहिस्तगी से उठाया कि किसी बर्तन का पानी न गिरा और कोई सोने वाला न जागा. फिर उस बलन्दी से उस ज़मीन के टुकड़े को औंधा करके पलटा.

(26) उन पत्थरों पर ऐसा निशान था जिन से वो दूसरों से मुमताज़ यानी छिके हुए थे. क़तादा ने कहा कि उनपर लाल लकीरें थी. हसन व सदी का क़ौल है कि उनपर मोहरें लगी हुई थीं और एक क़ौल यह है कि जिस पत्थर से जिस शख़्स की हलाकत मंज़ूर थी, उसका नाम उस पत्थर पर लिखा था.

(27) यानी मक्का वालों से.

सूरए हूद – आठवाँ रूकू

सूरए  हूद – आठवाँ रूकू

और  (1)
मदयन की तरफ़ उनके हमक़ौम शुऐब को (2)
कहा ऐ मेरी क़ौम अल्लाह को पूजों उसके सिवा तुम्हारा कोई मअबूद नहीं(3)
और नाप और तौल में कमी न करो बेशक मैं तुम्हें आसूदा हाल (ख़ुशहाल) देखता हूँ (4)
और मुझे तुमपर घेर लेने वाले दिन के अज़ाब का डर है(5){84}
और ऐ मेरी क़ौम नाप और तोल इन्साफ़ के साथ पूरी करो और लोगों को उनकी चीज़ें घटा कर न दो और ज़मीन में फ़साद मचाते न फिरो{85} अल्लाह का दिया जो बच रहे वह तुम्हारे लिये बेहतर है अगर तुम्हें यक़ीन हो(6)
और मैं कुछ तुमपर निगहबान नहीं(7){76}
बोले ऐ शुएब क्या तुम्हारी नमाज़ तुम्हें यह हुक्म देती है कि हम अपने बाप दादा के ख़ुदाओ को छोड़ दें(8)
या अपने माल में जो चाहे न करें(9)
हाँ जी तुम्हीं बड़े अक्लमन्द नेक चलन हो {87}
ऐ मेरी क़ौम भला बताओ तो अगर मैं अपने रब की तरफ़ से एक रौशन दलील पर हूँ (10)
और उसने मुझे अपने पास से अच्छी रोज़ी दी(11)
और में नहीं चाहता हूँ कि जिस बात से तुम्हें मना करता हूँ आप उसके ख़िलाफ़ करने लगूं (12)
मैं जहां तक बने संवारना ही चाहता हूँ, और  मेरी तौफ़ीक़ अल्लाह ही की तरफ़ से है, मैं ने उसी पर भरोसा किया और उसी की तरफ़ रूजू होता हूँ {88} और  ऐ मेरी क़ौम तुम्हें मेरी ज़िद यह न कमवा दे कि तूम पर पड़े जो पड़ा न था नूह की क़ौम या हूद की क़ौम या सालेह की क़ौम पर, और लूत की क़ौम तो कुछ तुम से दूर नहीं(13){89} 
और  अपने रब से माफ़ी चाहो फिर उसकी तरफ़ रूजू लाओ, बेशक मेरा रब मेहरबान महब्बत वाला है(90) बोले ऐ शुएब हमारी समझ में नहीं आतीं तुम्हारी बहुत सी बातें और बेशक हम तुम्हें अपने में कमज़ोर देखते हैं(14)
और अगर तुम्हारा कुम्बा न होता(15)
तो हमने तुम्हें पथराव कर दिया होता और कुछ हमारी निगाह में तुम्हें इज़्ज़त नहीं {91}  कहा, ऐ मेरी क़ौम क्या तुमपर मेरे कुम्बे का दबाव अल्लाह से ज़्यादा है (16)
और उसे तुमने अपनी पीठ के पीछे डाल रखा (17)
बेशक जो कुछ तुम करते हो सब मेरे रब के बस में है{92} और ऐ क़ौम तुम अपनी जगह अपना काम किये जाओ मैं अपना काम करता हूँ, अब जाना चाहते हो किस पर आता है वह अज़ाब कि उसे रूस्वा करेगा और कौन झूटा है (18)
और  इन्तिज़ार करो (19)
मैं भी तुम्हारे साथ इन्तिज़ार में हूँ{93} और  जब (20)
हमारा हुक्म आया हमने शुऐब और उसके साथ के मुसलमानों को अपनी रहमत फ़रमाकर बचा लिया और  ज़ालिमों को चिंघाड़ ने आ लिया (21)
तो सुबह अपने घरों में घुटनों के बल पड़े रहे {94}
गोया कभी वहाँ बसे ही न थे, अरे दूर हों मदयन जैसे दूर हुए समूद (22){95}

तफ़सीर 
सूरए हूद  – आठवाँ रूकू

(1) हमने भेजा मदयन शहर के निवासियों की तरफ़.

(2) आपने अपनी क़ौम से.

(3) पहले तो आपने तौहीद और इबादत की हिदायत फ़रमाई कि वो सारे कामों में सब से अहम है. उसके बाद जिन बुरी आदतों में वो जकड़े हुए थे उनसे मना फ़रमाया और इरशाद किया.

(4) ऐसे हाल में आदमी को चाहिये कि नेअमत की शुक्र गुज़ारी करे और दूसरों को अपने माल से फ़ायदा पहुंचाए,न कि उनके अधिकारों में कमी करें. ऐसी हालत में इस ख़यानत की आदत से डर है कि कहीं इस नेअमत से मेहरूम न कर दिये जाओ.

(5) कि जिससे किसी को रिहाई मयस्सर न हो और सब के सब हलाक हो जाएं. यह भी हो सकता है कि उस दिन के अज़ाब से आख़िरत का अज़ाब मुराद हो.

(6) यानी हराम माल छोड़ने के बाद हलाल जितना भी बचे वही तुम्हारे लिये बेहतर हे. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि पूरा तौलने और नापने के बाद जो बचे वह बेहतर है.

(7) कि तुम्हारे कर्मों पर पकड़ धकड़ करूं. उलमा ने फ़रमाया कि कुछ नबियों को जंग की इजाज़त थी, जेसे हज़रत मूसा, हज़रत दाऊद, हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम. कुछ वो थे जिन्हें लड़ने का हुक्म न था. हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम उन्हीं में से हैं. सारा दिन नसीहत फ़रमाते, उपदेश देते और सारी रात नमाज़ में गुज़ारते. क़ौम आप से कहती कि इस नमाज़ से आप को क्या फ़ायदा. आप फ़रमाते, नमाज़ अच्छाईयों का हुक्म देती है, बुराइयों से रोकती है. तो इसपर वो हंसी में यह कहते जो अगली आयत में आया है.

(8) मूर्ति पूजा न करें.

(9) मतलब यह था कि हम अपने माल के मालिक हैं, चाहे कम नापें चाहे कम तौलें.

(10) सूझबूझ और हिदायत पर.

(11) यानी नबुव्वत और रिसालत या हलाल माल और हिदायत व मअरिफ़त, तो यह कैसे हो सकता है कि मैं तुम्हें बुत परस्ती और गुनाहों से मना न करूं, क्योंकि नबी इसीलिये भेजे जाते हैं.

(12) इमाम फ़ख़रूद्दीन राज़ी अलैहिर्रहमत ने फ़रमाया कि क़ौम ने हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम के हिल्म और हिदायत वाला होने को स्वीकार किया था और उनका यह कलाम हंसी में न था, बल्कि मक़सद यह था कि आप हिल्म और महान बुद्विमत्ता के बावुज़ूद हमको अपने माल का अपनी मर्ज़ी के अनुसार  इस्तेमाल करने से क्यों रोकते हैं. इसका जवाब जो हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया उसका हासिल यह है कि जब तुम मेरी सूझ बूझ को मानते हो तो तुम्हें यह समझ लेना चाहिये कि मैं ने अपने लिये जो बात पसन्द की है वह वही होगी जो सब के लिये बेहतर हो, और वह ख़ुदा की तौहीद को मानना और नाप तौल में ख़यानत से दूर रहना है. मैं इसका पाबन्दी से आमिल हूँ तो तुम्हें समझ लेना चाहिये कि यही तरीक़ा बेहतर है.

(13) उन्हें कुछ ज़्यादा ज़माना नहीं गुज़रा है न कुछ दूर के रहने वाले थे तो उनके हाल से सबक़ पकड़ो.

(14) कि अगर हम आपके साथ कुछ ज़ियादती करें तो आपमें बचाव की ताक़त नहीं.

(15) जो दीन में हमारा साथी है और जिसको हम अज़ीज़ रखते हैं.

(16) कि अल्लाह के लिये  तो तुम मेरे क़त्ल से बाज़ न रहे और मेरे परिवार की वजह से बाज़ रहे और तुमने अल्लाह के नबी का तो ऐहतिराम न  किया और परिवार का सम्मान किया.

(17) और उसके हुक्म की कुछ परवाह न की.

(18) अपने दावों में. यानी तुम्हें जल्द मालूम हो जाएगा कि मैं सच्चाई पर हूँ या तुम, और  अल्लाह के अज़ाब से शक़ी की शक़ावत ज़ाहिर हो जाएगी.

(19)  आक़िबते-अम्र और अन्जामे-कार का.

(20) उनके अज़ाब और हलाक के लिये.

(21) हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम ने भयानक आवाज़ में कहा “मूतू जमीअन” यानी सब मर जाओ. इस आवाज़ की दहशत से उनके दम निकल गए और सब मर गए.

(22) अल्लाह की रहमत से, हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि कभी दो उम्मतें एक ही अज़ाब में नहीं जकड़ी गई. सिवाय हज़रत शुऐब और हज़रत सालेह अलैहुमस्सलाम की उम्मतों के. लेकिन हज़रत सालेह की क़ौम को उनके नीचे से भयानक आवाज़ ने हलाक किया और हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम की क़ौम को ऊपर से.

सूरए हूद – नवाँ रूकू

सूरए  हूद – नवाँ रूकू

बेशक हमने मूसा को अपनी आयतों  (1)
और साफ़ ग़लबे के साथ {96}फ़िरऔन और उसके दरबारियों की तरफ़ भेजा तो वो फ़िरऔन के कहने पर चले (2)
और फ़िरऔन का काम रास्ती का न था(3){97}
अपनी क़ौम के आगे होगा क़यामत के दिन तो उन्हें दोज़ख़ में ला उतारेगा(4)
और वह क्या ही बुरा घाट उतरने का{98} और उनके पीछे पड़ी इस जगत में लअनत और क़यामत के दिन(5)
क्या ही बुरा इनाम जो उन्हें मिला{99} ये बस्तियों (6)
की ख़बरें हें कि हम तुम्हें सुनाते हैं (7)
इनमें कोई खड़ी है (8)
और कोई कट गई (9){100}
और हमने उनपर ज़ुल्म न किया बल्कि ख़ुद उन्होंने (10)
अपना बुरा किया तो उनके मअबूद जिन्हें(11)
अल्लाह के सिवा पूजते थे उनके कुछ काम न आए (12)
जब तुम्हारे रब का हुक्म आया और उनसे (13)
उन्हें हलाक के सिवा कुछ न बढ़ा {101}  और ऐसी ही पकड़ है तेरे रब की जब बस्तियों को पकड़ता है उनके ज़ुल्म  पर बेशक उसकी पकड़ दर्दनाक करीं हैं (14) {102}  
बेशक इसमें निशानी (15)
है उसके लिये जो आख़िरत के अज़ाब से डरे, वह दिन है जिसमें सब लोग (16)
इकट्ठे होंगे और वह दिन हाज़िरी का है (17){103}
और हम उसे (18)
पीछे नहीं हटाते मगर एक गिनी हुई मुद्दत के लिये (19){104}
जब वह दिन आएगा कोई ख़ुदा के हुकुम बिना बात न करेगा(20)
तो उन में कोई बदबख़्त है और कोई ख़ुशनसीब {105} तो वह जो बदबख़्त है वो तो दोज़ख़ में हैं वो उसमें गधे की तरह रेकेंगे{106} वो उसमें रहेंगे जब तक आसमान व ज़मीन रहें मगर जितना तुम्हारे रब ने चाहा (22)
बेशक तुम्हारा रब जो चाहे करे {107} और वह ख़ुशनसीब हुए वो जन्नत में हैं हमेशा उसमें रहेंगे. जब तक आसमान व ज़मीन रहें मगर जितना तुम्हारे रब ने चाहा (23)
यह बख़्शिश है कभी ख़त्म न होगी {108}  तो ऐ सुनने वाले धोखे में न पड़ उससे जिसे ये काफ़िर पूजते है(24)
ये वैसा ही पूजते है जैसा पहले इनके बाप दादा पूजते थे (25)
और बेशक हम उनका हिस्सा उन्हें पूरा फेर देंगे जिसमें कमी न होगी {109}

तफ़सीर 
सूरए हूद – नवा रूकू

(1) और कुफ़्र में जकड़ गए और मूसा अलैहिस्सलाम पर ईमान न लाए.

(2) वह खुली गुमराही में था, क्योंकि बशर होने के बावुज़ूद ख़ुदाई का दावा करता था और खुल्लमखुल्ला ऐसे अत्याचार करता था जिसका शैतानी काम होना ज़ाहिर और यक़ीनी था. वह कहाँ और ख़ुदाई कहाँ. और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के साथ हिदायत और सच्चाई थी. आपकी सच्चाई की दलीलों, खुली आयतों और चमत्कारों को वो लोग देख चुके थे, फिर भी उन्होंने आपके अनुकरण से मुंह फेरा और ऐसे गुमराह का अनुकरण किया. तो जब वह दुनिया में कुफ़्र और गुमराही में अपनी क़ौम का पेशवा था. ऐसे ही जहन्नम में उनका इमाम होगा और.

(4) जैसा कि उन्हें नील नदी में ला डाला था.

(5) यानी दुनिया में भी मलऊन और आख़िरत में भी लअनत में जकड़े.

(6) यानी गुज़री हुई उम्मतें.

(7) कि तुम अपनी उम्मतों को उनकी ,ख़बरें दो ताकि वो सबक़ पकड़े. उन बस्तियों की हालत खेतियों की तरह है कि.

(8) उसके मकानों की दीवारें मौजूद हैं. खंडहर पाए जाते हैं. निशान बाक़ी है जैसे कि आद व समूद के इलाके.

(9) यानी कटी हुई  खेती की तरह बिल्कुल बेनामों निशान हो गई और उसका कोई चिन्ह बाक़ी न रहा जैसे कि नूह अलैहिस्सलाम की क़ौम के इलाक़े.

(10) कुफ़्र और गुमराही से.

(11) जिहालत और गुमराही से.

(12) और एक कण अज़ाब दूर न कर सके.

(13) बुतों और झूटे मअबूदों.

(14) तो हर अत्याचारी को चाहिये कि इन वाक़िआत से सबक़ सीखे और तौबह में जल्दी करें.

(15) सबक़ और नसीहत.

(16) अगले पिछले हिसाब के लिये.

(17) जिसमें आसमान वाले और ज़मीन वाले सब हाज़िर होंगे.

(18) यानी क़यामत के दिन.

(19) यानी जो मुद्दत हमने दुनिया के बाक़ी रहने की निश्चित की है उसके ख़त्म होने तक.

(20) तमाम सृष्टि साकित अर्थात ख़ामोश होगी. क़यामत का दिन बहुत लम्बा होगा. इसमें अहवाल अलग अलग होंगे. कुछ हालतों में हैबत की सख्ती से किसी को अल्लाह की आज्ञा के बिना बात ज़बान पर लाने की क़ुदरत न होगी. और कुछ हालतों में आज्ञा दी जाएगी कि लोग कलाम करेंगे और कुछ हालतों में हौल और दहशत कम होगी. उस वक़्त लोग अपने मामलों में झगड़ेंगे और अपने मुक़दमे पेश करेंगे.

(21) शफ़ीक़ बल्ख़ी रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया, ख़ुशनसीबी या सआदत की पाँच निशानियाँ हैं (1) दिल की नर्मी (2) रोने की कसरत (3)  दुनिया से नफ़रत (4) उम्मीदों का छोटा होना  (5) लज्जा या हया और बदबख़्ती यानी दुर्भाग्य की निशानियाँ भी पाँच है (1) दिल की सख़्ती (2)आंख की खुश्की (3) दुनिया की रग़बत(4) बड़ी बड़ी उम्मीदें (5) बेहयाई

(22) इतना और ज़्यादा रहेंगे, और इस ज़ियादती का कोई अन्त नहीं. तो मानी ये हुए कि हमेशा रहेंगे, कभी इससे रिहाई न पांएगे. (तफ़सीरे जलालैन)

(23) इतना और ज़्यादा रहेंगे और इस ज़ियादती की कोई हद नहीं. इसे हमेशागी मुराद है. चुनांचे इरशाद फ़रमाता है.

(24) बेशक यह उस बुत परस्ती पर अज़ाब दिये जाएंगे जैसे कि पहली उम्मतें अज़ाब में जकड़ी गई.

(25) और तुम्हें मालूम हो चुका कि उनका अंजाम क्या होगा.

सूरए हूद – दसवाँ रूकू

सूरए  हूद – दसवाँ रूकू

और बेशक हमने मूसा को किताब दी(1)
तो उसमें फुट पड़ गई(2)
अगर तुम्हारे रब की एक बात(3)
पहले न हो चुकी होती तो जभी उनका फ़ैसला कर दिया जाता(4)
और बेशक वो उसक तरफ़ से (5)
धोखा डालने वाले शक में हैं(6){110}
और बेशक जितने हैं (7)
एक एक को तुम्हारा रब उसका अमल पूरा भर देगा, उसे उन कामों की ख़बर है(8)(111)
तो क़ायम रहो(9)
जैसा तुम्हें हुक्म है और जो तुम्हारे साथ रूजू लाया है (10)
और ऐ लोगो सरगोशी (कानाफूसी) न करो, बेशक वह तुम्हारे काम देख रहा है {112}  और ज़ालिमों की तरफ़ न झुको कि तुम्हें आग छुएगी(11)
और अल्लाह के सिवा तुम्हारा कोई हिमायती नहीं (12)
फिर मदद न पाओगे {113} और नमाज़ क़ायम रखो दिन के दोनों किनारों(13)
और कुछ रात के हिस्से में (14)
बेशक नेकियाँ बुराइयों को मिटा देती हैं (15)
यह नसीहत है नसीहत मानने वालों को {114} और सब्र करो कि अल्लाह नेकों का नेग नष्ट नहीं करता {115}  तो क्यों न हुए तुम से अगली संगतों में (16)
ऐसे जिन में भलाई का कुछ हिस्सा लगा रहा होता कि ज़मीन में फ़साद से रोकते (17)
हाँ उनमें थोड़े थे वही जिनको हमने निजात दी(18)
और ज़ालिम उसी ऐश के पीछे पड़े रहे जो उन्हें दिया गया (19)
और वो गुनहगार थे {116} और तुम्हारा रब ऐसा नहीं कि बस्तियों को बे वजह हलाक कर दे और उनके लोग अच्छे हों {117}  और अगर तुम्हारा रब चाहता तो सब आदमियों को एक ही उम्मत कर देता (20)
और वो हमेशा इख़्तिलाफ़ में रहेंगे (21){118}
मगर जिन पर तुम्हारे रब ने रहम किया (22)
और लोग उसी लिये बनाए हैं (23)
और तुम्हारे रब की बात पूरी हो चुकी कि बेशक ज़रूर जहन्नम भर दूंगा जिन्नों और आदमियों को मिला कर (24) {119}
और सब कुछ हम तुम्हें रसूलों की ख़बरें सुनाते हैं जिस से तुम्हारा दिल ठहराएं (25)
और उस सूरत में तुम्हारे पास हक़ आया (26)
और मुसलमानों को पन्द (उपदेश) व नसीहत (27) {120}
और काफ़िरों से फ़रमाओ तुम अपनी जगह काम किये जाओ(28)
हम अपना काम करते हैं (29){121}
और राह देखो, हम भी राह देखते हैं (30){122}
और  अल्लाह ही के लिये हैं आसमानों और ज़मीन के ग़ैब (31)
और उसी की तरफ़ सब कामों की रूजू है तो उसकी बन्दगी करो और उसपर भरोसा रखो, और तुम्हारा रब तुम्हारे कामों से गाफ़िल नहीं {123}

तफ़सीर 
सूरए हूद – दसवाँ रूकू

(1) यानी तौरात.

(2) कुछ उसपर ईमान लाए  और कुछ ने कुफ़्र किया.

(3) कि उनके हिसाब में जल्दी न फ़रमाएगा. मख़लूक के हिसाब और बदले का दिन क़यामत का दिन है.

(4) और दुनिया ही में अज़ाब में जकड़े जाते.

(5) यानी आपकी उम्मत के काफ़िर क़ुरआने करीम की तरफ़ से.

(6) जिसने उनकी अक़्लों को हैरान कर दिया.

(7) तमाम ख़ल्क़, तस्दीक़ करने वाले हों या झुटलाने वाले, क़यामत के दिन.

(8) उसपर कुछ छुपा हुआ नहीं. इसमें नेकियों और तस्दीक़ करने वालों के लिये तो ख़ुशख़बरी है कि वो नेक का बदला पाएंगे और काफ़िरों और झुटलाने वालों के लिये फटकार है कि वो अपने कर्मों की सज़ा में गिरफ़्तार होंगे.

(9) अपने रब के हुक्म और उसके दीन की दावत पर.

(10) और उसने तुम्हारा दीन क़ुबूल किया है. वो दीन और फ़रमाँबरदारी पर क़ायम रहे. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है, सुफ़ियान बिन अब्दुल्लाह सक़फ़ी ने रसूले करीम सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अर्ज़ किया कि मुझे दीन में एक ऐसी बात बता दीजिये कि फिर किसी से पूछने की हाजत न रहे. फ़रमाया “आमन्तो बिल्लाह” कह और क़ायम रह.

(11) किसी की तरफ़ झुकना उसके साथ मेल महब्बत रखने को कहते है. अबुल आलिया ने कहा कि मानी ये हैं कि ज़ालिमों के कर्मों से राज़ी न हो. सदी ने कहा उनके साथ उठना बैठना न रखो. क़तादा ने कहा मुश्रिकों से न मिलो. इससे मालूम हुआ कि ख़ुदा के नाफ़रमानों के साथ यानी काफ़िरों, बेदीनों और गुमराहों के साथ मेल जोल रिश्तेदारी सहयोग और महब्बत उनकी हाँ में हाँ मिलाना, उनकी ख़ुशामद में रहना वर्जित है.

(12) कि तुम्हें उसके अज़ाब से बचा सके. यह हाल तो उनका है जो ज़ालिमों से मेल जोल और महब्बत रखें और इसीसे उनके  हाल का अन्दाज़ा लगाया जा सकता है जो ख़ुद ज़ालिम हैं.

(13) दिन के दो किनारों से सुबह शाम मुराद हैं. ज़वाल से पहले का वक़्त सुबह में और बाद का शाम में दाख़िल है. सुब्ह की नमाज़ फ़ज्र और शाम की नमाज़ ज़ौहर और अस्र है.

(14) और रात के हिस्सों की नमाज़ें मग़रिब और इशा है.

(15) नेकियों से मुराद या यही पंजगाना नमाज़ें हैं जो आयत में बयान हुई या मुतलक़ ताअतें या ” सुब्हानल्लाहे वल हम्दु लिल्लाहे वला इलाहा इल्लल्लाहो वल्लाहो अक़बर” पढ़ना. आयत से मालूम हुआ कि नेकियाँ छोटे मोटे गुनाहों के लिये कफ़्फ़ारा होती है चाहे वो नेकियाँ नमाज़ हो या सदक़ा या ज़िक्र या इस्तग़फ़ार या कुछ और. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है कि पाँचों नमाज़ें और जुमुआ दूसरे जुमुए तक और एक रिवायत में है कि एक रमज़ान से दूसरे रमज़ान तक, ये सब क़फ़्फ़ारा हैं उन गुनाहों के लिये जो इनके बीच हों जब कि आदमी बड़े गुनाहों से बचे. एक शख़्स ने किसी औरत को देखा और उससे कोई ख़फ़ीफ़ यानी मामूली सी हरकत बेहिजाबी की सरज़द हुई उसपर वह शर्मिन्दा हुआ और रसूले करीम सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर अपना हाल अर्ज़ किया इसपर यह आयत उतरी. उस शख़्स ने अर्ज़ किया कि छोटे गुनाहों के लिये नेकियों का कफ़्फ़ारा होना क्या ख़ास मेरे लिये है. फ़रमाया, नहीं सब के लिये.

(16) यानी पहली उम्मतों में जो हलाक की गई.

(17) मानी ये है कि उन उम्मतों में ऐसे नेकी वाले नहीं हुए जो लोगों को ज़मीन में फ़साद करने से रोकते और गुनाहों से मना करते, इसीलिये हमने उन्हें हलाक कर दिया.

(18)  वो नबियों पर ईमान लाए और उनके अहकाम पर फ़रमाँबरदार रहे और लागों को फ़साद से रोकते रहे.

(19)  और नेअमतों, लज़ीज़ चीज़ों और ख़्वाहिशात और वासनाओं के आदी हो गए और कुफ़्र व गुमराही में डूबे रहे.

(20) तो सब एक दीन पर होते.

(21)  कोई किसी दीन पर कोई किसी पर.

(22) वो सच्चे दीन पर सहमत रहेंगे और उसमें इख़्तिलाफ़ न करेंगे.

(23) यानी इख़्तिलाफ़ वाले इख़्तिलाफ़ के लिये और रहमत वाले सहमति के लिये.

(24) क्योंकि उसको इल्म है कि बातिल के इख़्तियार करने वाले बहुत होंगे.

(25) और नबियों के हाल और उनकी उम्मतों के सुलूक देखकर आपको अपनी क़ौम की तकलीफ़ का बर्दाश्त करना और उस पर सब्र फ़रमाना आसान हो.

(26) और नबियों और उनकी उम्मतों के तज़किरे वाक़ए के अनुसार बयान हुए जो दूसरी किताबों और दूसरे लोगों को हासिल नहीं यानी जो  वाक़िआत बयान फ़रमाए गए वो हक़ भी है.

(27) ….भी कि गुज़री हुई उम्मतों के हालात और उनके अंजाम से सबक़ पकड़े.

(28) बहुत जल्द उसका नतीज़ा पा जाओगे.

(29) जिसका हमें हमारे रब ने हुक्म दिया.

(30) तुम्हारे अंजामेकार यानी अन्त की.

(31) उससे कुछ छुपा नहीं सकता.

quran in hindi surah yunus tafseer10 सूरए यूनुस in hindi

QURAN IN HINDI
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quran in hindi surah yunus tafseer10 सूरए यूनुस in hindi

सूरए यूनुस मक्का में उतरी इसमें 109 आयतें और ग्यारह रूकू हैं.

अल्लाह के नाम से शूरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)

ये हिकमत (बोध) वाली किताब की आयतें हैं {1} क्या लोगों को इसका अचम्भा हुआ कि हमने उनमें से एक मर्द को वही (देववाणी) भेजी कि लोगों को डर सुनाओ(2)
और ईमान वालों को ख़ुशख़बरी दो कि उनके लिये उनके रब के पास सच का मक़ाम है, काफ़िर बोले बेशक यह तो खुला जादूगर है(3){2}
बेशक तुम्हारा रब अल्लाह है जिसने आसमन और ज़मीन छ दिन में बनाए फिर अर्श पर इस्तवा फ़रमाया जैसा उसकी शान के लायक़ है काम की तदबीर फ़रमाता है(4)
कोई सिफ़ारिशी नहीं मगर उसकी इजाज़त के बाद(5)
यह है अल्लाह तुम्हारा रब (6)
तो उसकी बन्दगी करो, तो क्या तुम ध्यान नहीं करते{3} उसी की तरफ़ तुम सबको फिरना है(7)
अल्लाह का सच्चा वादा, बेशक वह पहली बार बनाता है फिर फ़ना के बाद दोबारा बनाएगा कि उनको जो ईमान लाए और अच्छे काम किये इन्साफ़ का सिला (इनाम) दे(8)
और काफ़िरों के लिये पीने को खौलता पानी और दर्दनाक अज़ाब बदला उनके कुफ़्र का {4} वही है जिसने सूरज को जगमगाता बनाया और चांद चमकता और उसके लिये मंज़िलें ठहराईं(9)
कि तुम बरसों की गिनती और (10)
हिसाब जानो अल्लाह ने उसे न बनाया मगर हक़(11)
निशानियां तफ़सील से बयान फ़रमाता है इल्म वालों के लिये (12){5}
बेशक रात और दिन का बदलता आना और जो कुछ अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन में पैदा किया उनमें निशानियां हैं डर वालों के लिये{6} बेशक वो जो हमारे मिलने की उम्मीद नहीं रखते(13)
और दुनिया की ज़िन्दगी पसन्द कर बैठे और इसपर मुतमईन (संतुष्ट) हो गए (14)
और वो जो हमारी आयतों से ग़फ़लत करते हैं(15){7}
उन लोगों का ठिकाना दोज़ख़ है बदला उनकी कमाई का {8} बेशक जो ईमान लाए और अच्छे काम किये उनका रब उनके ईमान के कारण उन्हें राह देगा(16)
उनके नीचे नेहरें बहती होंगी नेअमत के बाग़ों में {9} उनकी दुआ उसमें यह होगी कि अल्लाह तुझे पाकी है (17)
और उनके मिलते वक़्त ख़ुशी का पहला बोल सलाम है (18)
और उनकी दुआ का ख़ातिमा यह है कि सब ख़ूबियों सराहा अल्लाह जो रब है सारे जगत का(19){10}

तफ़सीर 
सूरए यूनुस – पहला रूकू

(1) सूरए यूनुस मक्की है, सिवाए तीन आयतों के ” फ़इन कुन्ता फ़ी शक्किन ” से. इसमें ग्यारह रूकू, सौ नौ आयतें, एक हज़ार आठ सौ बत्तीस कलिमे और नौ हज़ार निनावे अक्षर हैं.

(2) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया, जब अल्लाह तआला ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को रिसालत अता फ़रमाई और आपने उसका इज़हार किया तो अरब इन्कारी हो गए और उनमें से कुछ ने कहा कि अल्लाह इससे बरतर है कि किसी आदमी को रसूल बनाए. इसपर ये आयतें उतरीं.

(3) काफ़िरों ने पहले तो आदमी का रसूल होना आश्चर्य की बात और न मानने वाली चीज़ क़रार दिया, फिर जब हुज़ूर के चमत्कार देखे और यक़ीन हुआ कि ये आदमी की शक्ति और क्षमता से ऊपर हैं, तो आपको जादूगर बताया. उनका यह दावा तो झूट और ग़लत है, मगर इसमें भी अपनी तुच्छता और हुज़ूर की महानता का ऐतिराफ़ पाया जाता है.

(4) यानी तमाम सृष्टि के कामों का अपनी हिक़मत और मर्ज़ी के अनुसार प्रबन्ध फ़रमाता है.

(5) इसमें बुत परस्तों के इस क़ौल का रद है कि बुत उनकी शफ़ाअत करेंगे. उन्हें बताया गया कि शफ़ाअत उनके सिवा कोई न कर सकेगा जिन्हें अल्लाह इसकी इजाज़त देगा. और शफ़ाअत की इजाज़त पाने वाले ये अल्लाह के मक़बूल बन्दे होंगे.

(6) जो आसमान और ज़मीन का विधाता और सारे कामों का प्रबन्धक है. उसके सिवा कोई मअबूद नहीं, फ़क़त वही पूजे जाने के लायक़ है.

(7) क़यामत के दिन, और यही है.

(8) इस आयत में हश्र नश्र और मआद का बयान और इससे इन्कार करने वालों का रद है. और इसपर निहायत ख़ूबसूरत अन्दाज़ में दलील क़ायम फ़रमाई गई है, कि वह पहली बार बनाता है और विभिन्न अंगों को पैदा करता है और उन्हें जोड़ता है. तो मौत के साथ अलग हो जाने के बाद उनको दोबारा जोड़ना और बने हुए इन्सान को नष्ट  हो जाने के बाद दोबारा बना देना और वही जान जो उस शरीर से जुड़ी थी, उसको इस बदन की दुरूस्ती के बाद फिर उसी शरीर से जोड़  देना, उसकी क़ुदरत और क्षमता से क्या दूर है. और इस दोबारा पैदा करने का उद्देश्य कर्मों का बदल देना यानी फ़रमाँबरदार को इनाम और गुनाहगार को अज़ाब देना है.

(9) अठ्ठाईस मंजिलें जो बारह बुर्जों में बंटी है. हर बुर्ज के लिये ढाई मंज़िलें हैं. चांद हर रात एक मंन्ज़िल में रहता है. और महीना तीस दिन का हो तो दो रात, वरना एक रात छुपता है.

(10) महीनों, दिनों घड़ियों का.

(11) कि उससे उसकी क़ुदरत और उसके एक होने के प्रमाण ज़ाहिर हों.

(12) कि उनमें ग़ौर करके नफ़ा उठाएं.

(13) क़यामत के दिन और सवाब व अज़ाब को नहीं मानते.

(14) और इस नश्वर को हमेशा पर प्राथमकिता दी, और उम्र उसकी तलब में गुज़ारी.

(15) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि यहाँ आयतों से सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ज़ाते पाक और क़ुरआन शरीफ़ मुराद है. और ग़फ़लत करने से मुराद उनसे मुंह फेरना है.

(16) जन्नतों की तरफ़. क़तादा का क़ौल है कि मूमिन जब अपनी क़ब्र से निकलेगा  तो उसका अमल ख़ूबसूरत शक्ल में उसके सामने आएगा. यह शख़्स कहेगा, तू कौन है? वह कहेगा, मैं तेरा अमल हूँ. और उसके लिये नूर होगा और जन्नत तक पहुंचाएगा. काफ़िर का मामला विपरीत होगा. उसका अमल बुरी शक्ल में नमूदार होकर उसे जहन्नम में पहुंचाएगा.

(17) यानी जन्नत वाले अल्लाह तआला की तस्बीह, स्तुति, प्रशंसा में मश्ग़ूल रहेंगे और उसके ज़िक्र से उन्हें फ़रहत यानी ठण्डक और आनन्द और काफ़ी लज़्ज़त हासिल होगी.

(18) यानी जन्नत वाले आपस में एक दूसरे का सत्कार सलाम से करेंगे या फ़रिश्ते उन्हें इज़्ज़त के तौर पर सलाम अर्ज़ करेंगे या फ़रिश्तें रब तआला की तरफ़ से उनके पास सलाम लाएंगे.

(19) उनके कलाम शुरूआत अल्लाह की बड़ाई और प्रशंसा से होगी और कलाम का अन्त अल्लाह की महानता और उसके गुणगान पर होगा.

सूरए यूनुस – दूसरा रूकू

सूरए यूनुस – दूसरा रूकू

और अगर अल्लाह लोगों पर बुराई ऐसी जल्द भेजता जैसी वह भलाई की जल्दी करते हैं तो उनका वादा पूरा हो चुका होता(1)
तो हम छोड़ते उन्हें जो हमसे मिलने की उम्मीद नहीं रखते कि अपनी सरकशी (विद्रोह) में भटका करें(2){11}
और जब आदमी को(3)
तकलीफ़ पहुंचती है हमें पुकारता है लेटे और बैठे और खड़े (4)
फिर जब हम उसकी तकलीफ़ दूर कर देते हैं चल देता है(5)
गोया कभी किसी तकलीफ़ के पहुंचने पर हमें पुकारा ही न था, यूंही भले कर दिखाए है हद से बढ़ने वाले को(6)
उनके काम(7){12}
और बेशक हमने तुमसे पहली संगतें(8)
हलाक फ़रमादीं जब वो हद से बढ़े(9)
और उनके रसूल उनके पास रौशन दलीलें लेकर आए(10)
और वो ऐसे थे ही नहीं कि ईमान लाते, हम यूंही बदला देते हैं मुजरिमों को {13} फिर हमने उनके बाद तुम्हें ज़मीन में जानशीन किया कि देखें तुम कैसे काम करते हो(11){14}
और जब उनपर हमारी रौशन आयतें (12)
पढ़ी जाती हैं तो वो कहने लगते हैं जिन्हें हमसे मिलने की उम्मीद नहीं(13)
कि इसके सिवा और क़ुरआन ले आइये(14)
या इसी को बदल दीजिये (15)
तुम फ़रमाओ मुझे नहीं पहुंचता कि मैं इसे अपनी तरफ़ से बदल दूं, मैं तो उसी का ताबे (अधीन) हूँ जो मेरी तरफ़ वही (देववाणी) होती है (16)
मैं अपने रब की नाफ़रमानी करूं(17)
तो मुझे बड़े दिन के अज़ाब का डर है(18){15}
तुम फ़रमाओ अगर अल्लाह चाहता तो मैं इसे तुमपर न पढ़ता न वह तुमको उससे ख़बरदार करता(19)
तो मैं इससे पहले तुम में अपनी एक उम्र गुज़ार चुका हुँ (20)
तो क्या तुम्हें अक़ल नहीं (21){16}
तो उससे बढ़कर ज़ालिम कौन जो अल्लाह पर झूट बांधे(22)
या उसकी आयतें झुटलाए, बेशक मुजरिमों का भला न होगा {17}और अल्लाह के सिवा ऐसी चीज़ (23)
को पूजते हैं जो उनका कुछ भला न करे और कहते हैं कि यह अल्लाह के यहाँ हमारे सिफ़ारिशी हैं(24)
तुम फ़रमाओ क्या अल्लाह को वह बात बताते हो जो उसके इल्म में न आसमानों में है न ज़मीन में(25)
उसे पाकी और बरतरी है उनके शिर्क से {18} और लोग एक ही उम्मत थे (26)
फिर मुख़्तलिफ़ हुए और अगर तेरे रब की तरफ़ से एक बात पहले न हो चुकी होती (27)
तो यहीं उनके इख़्तिलाफ़ों का उनपर फ़ैसला हो गया होता(28){19}
और कहते हैं उनपर उनके रब की तरफ़ से कोई निशानी क्यों नहीं उतरी(29)
तुम फ़रमाओ ग़ैब तो अल्लाह के लिये है अब रास्ता देखों, मैं भी तुम्हारे साथ राह देख रहा हूँ{20}

तफ़सीर
सूरए यूनुस – दूसरा रूकू    

(1) यानी अगर अल्लाह तआला लोगों की बद . दुआएं, जैसे कि वो ग़ज़ब के वक़्त अपने लिये अपने बाल बच्चों और माल के लिये करते हैं, और कहते हैं हम हलाक हो जाएं, ख़ुदा हमें ग़ारत करे, बर्बाद करें और ऐसे ही कलिमें अपनी औलाद और रिश्तेदारों के लिये कह गुज़रते हैं, जिसे हिन्दी में कोसना कहते हैं, अगर वह दुआ ऐसी जल्दी क़ुबूल करली जाती जैसी जल्दी वो अच्छाई की दुआओ के क़ुबूल होने में चाहते हैं, तो उन लोगों का अन्त हो चुका होता और वो कब के हलाक हो गए होते, लेकिन अल्लाह तआला अपने करम से भलाई की दुआ क़ुबूल फ़रमाने में जल्दी करता है, बद-दुआ के क़ुबूल में नहीं, नज़र बिन हारिस ने कहा था या रब, यह दीने इस्लाम अगर तेरे नज़दीक सच्चा है तो हमारे ऊपर आसमान से पत्थर बरसा. इसपर यह आयत उतरी और बताया गया कि अगर अल्लाह तआला काफ़िरों के अज़ाब में जल्दी फ़रमाता, जैसा कि उनके लिये माल और औलाद वग़ैरह दुनिया की भलाई देने में जल्दी फ़रमाई, तो वो सब हलाक हो चुके होते.

(2) और हम उन्हें मोहलत देते हैं और उनके अज़ाब में जल्दी नहीं करते.

(3) यहाँ आदमी से काफ़िर मुराद हैं.

(4) हर हाल में, और जब तक उसकी तकलीफ़ दूर न हो, दुआ में मश़्गूल रहता है.

(5) अपने पहले तरीक़े पर, और वही कुफ़्र की राह अपनाता है और तकलीफ़ के वक़्त को भूल जाता है.

(6) यानी काफ़िरों को.

(7) मक़सद यह है कि इन्सान बला के वक़्त बहुत ही बेसब्रा है और राहत के वक़्त बहुत नाशुक्रा. जब तकलीफ़ पहुंचती है तो ख़ड़े लेटे बैठे हर हाल में दुआ करता है. जब अल्लाह तकलीफ़ दूर कर देता है तो शुक्र नहीं अदा करता और अपनी पहली हालत की तरफ़ लौट जाता है. यह हाल ग़ाफ़िल का है. अक़्ल वाले मूमिन का हाल इसके विपरीत है. वह मुसीबत और बला पर सब्र करता है, राहत और आसायश में शुक्र करता है. तकलीफ़ और राहत की सारी हालतों में अल्लाह के समक्ष गिड़गिड़ाता और दुआ करता है. एक मक़ाम इससे भी ऊंचा है, जो ईमान वालों में भी ख़ास बन्दों को हासिल है कि जब कोई मुसीबत और बला आती है, उस पर सब्र करते हैं. अल्लाह की मर्ज़ी पर दिल से राज़ी रहते हैं और हर हाल में शुक्र करते हैं.

(8) यानी उम्मतें हैं.

(9) और कुफ़्र में जकड़े गए.

(10) जो उनकी सच्चाई की बहुत साफ़ दलीलें थीं, उन्होंने न माना और नबियों की तसदीक़ न की.

(11) ताकि तुम्हारे साथ तुम्हारे कर्मों के हिसाब से मामला फ़रमाएं.

(12) जिनमें हमारी तौहीद और बुत परस्ती की बुराई और बुत परस्तों की सज़ा का बयान है.

(13)और आख़िरत पर ईमान नहीं रखते.

(14) जिसमें बुतों की बुराई न हो.

(15) काफ़िरों की एक जमाअत ने नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर कहा कि अगर आप चाहते हैं कि हम आप पर ईमान ले आएं तो आप इस क़ुरआन के सिवा दूसरा क़ुरआन लाइये जिसमें लात, उज़्ज़ा और मनात वग़ैरह देवी देवताओ की बुराई और उनकी पूजा छोड़ने का हुक्म न हो और अगर अल्लाह ऐसा क़ुरआन न उतारे तो आप अपनी तरफ़ से बना लीजिये या उसी क़ुरआन को बदल कर हमारी मर्ज़ी के मुताबिक़ कर दीजिये तो हम आप पर ईमान ले आएंगे, उनका यह कलाम या तो मज़ाक उड़ाने के तौर पर था या उन्होंने तजुर्बें और इम्तिहान के लिये ऐसा कहा था कि अगर यह दूसरा क़ुरआन बना लाएं या इसको बदल दें तो साबित हो जाएगा कि क़ुरआन अल्लाह की तरफ़ से नहीं है. अल्लाह तआला ने अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को हुक्म दिया कि इसका यह जवाब दें जो आयत में बयान होता है.

(16) मैं इसमें कोई परिवर्तन, फेर बदल, कमी बेशी नहीं कर सकता. ये मेरा कलाम नहीं, अल्लाह का कलाम है.

(17) या उसकी किताब के आदेशों को बदलूं.

(18) और दूसरा क़ुरआन बनाना इन्सान की क्षमता ही से बाहर है और सृष्टि का इससे मजबूर होना ख़ूब ज़ाहिर हो चुका है.

(19) यानी इसकी तिलावत और पाठ केवल अल्लाह की मर्ज़ी से है.

(20) और चालीस साल तुम में रहा हूँ इस ज़माने में मैं तुम्हारे पास कुछ नहीं लाया और मैं ने तुम्हें कुछ नहीं सुनाया. तुमने मेरे हालात को ख़ूब देखा परखा है. मैं ने किसी से एक अक्षर नहीं, पढ़ा किसी किताब का अध्ययन नहीं किया. इसके बाद यह महान किताब लाया जिसके सामने हर एक कलाम तुच्छ और निरर्थक हो गया. इस किताब में नफ़ीस उलूम हैं, उसूल और अक़ीदे हैं, आदेश और संस्कार हैं, और सदव्यवहार की तालीम है, ग़ैबी ख़बरें हैं. इसकी फ़साहत व बलाग़त ने प्रदेश भर के बोलने वालों और भाषा शाख़ियों को गूंगा बहरा बना दिया है. हर समझ वाले के लिये यह बात सूरज से ज़्यादा रौशन हो गई है कि यह अल्लाह की तरफ़ से भेजी गई वही के बिना सम्भव ही नहीं,.

(21) कि इतना समझ सको कि यह क़ुरआन अल्लाह की तरफ़ से है, बन्दों की क़ुदरत नहीं कि इस जैसा बना सकें.

(22) उसके लिये शरीक बताए.

(23) बुत.

(24) यानी दुनिया के कामों में, क्योंकि आख़िरत और मरने के बाद उठने का तो वो अक़ीदा ही नहीं रखते.

(25) यानी उसका वुजूद ही नहीं, क्योंकि जो चीज़ मौजूद है, वह ज़रूर अल्लाह के इल्म में है.

(26) एक  दीने इस्लाम पर, जैसा कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के ज़माने में क़ाबील के हाबील को क़त्ल करने के वक़्त आदम अलैहिस्सलाम और उनकी सन्तान एक ही दीन पर थे. इसके बाद उनमें मतभेद हुआ. एक क़ौल यह है कि नूह अलैहिस्सलाम तक एक दीन पर रहे फिर मतभेद हुआ तो नूह अलैहिस्सलाम भेजे गए. एक क़ौल यह है कि नूह अलैहिस्सलाम के किश्ती से उतरते वक़्त सब लोग एक ही दीन पर थे. एक क़ौल यह है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के एहद से सब लोग एक दीन पर थे यहाँ तक कि अम्र बिन लहयी ने दीन बदला. इस सूरत में “अन्नास” से मुराद ख़ास अरब होंगे. एक क़ौल यह है कि लोग एक दीन पर थे यानी कुफ़्र पर. अल्लाह तआला ने नबियों को भेजा, तो कुछ उनमें से ईमान लाए. कुछ उलमा ने कहा कि मानी ये हैं कि लोग अपनी पैदायश में नेक प्रकृति पर थे फिर उन में मतभेद हुआ. हदीस शरीफ़ में है, हर बच्चा फ़ितरत पर पैदा होता है, फिर उसके माँ बाप उसको यहूदी बनाते हैं या ईसाई बनाते है या मजूसी बनाते हैं. हदीस में फ़ितरत से फ़ितरते इस्लाम मुराद है.

(27) और हर उम्मत के लिये एक मीआद निश्चित न कर दी गई होती या आमाल का बदला क़यामत तक उठाकर न रखा गया होता.

(28) अज़ाब उतरने से.

(29) एहले बातिल का तरीक़ा है कि जब उनके ख़िलाफ़ मज़बूत दलील क़ायम होती है और वो जवाब से लाचार हो जाते हैं, तो उस दलील का ज़िक्र इस तरह छोड़ देते हैं जैसे कि वह पेश ही नहीं हुई और यह कहा करते हैं कि दलील लाओ ताकि सुनने वाले इस भ्रम में पड़ जाएं कि उनके मुक़ाबले में अब तक कोई दलील ही क़ायम नहीं की गई है. इस तरह काफ़िरों ने हुज़ूर के चमत्कार विशेषत: क़ुरआन शरीफ़ जो सबसे बड़ा चमत्कार है, उसकी तरफ़ से आँखें बन्द करके यह कहना शुरू किया कि कोई निशानी क्यों नहीं उतरी.मानो कि चमत्कार उन्होंने देखे ही नहीं और क़ुरआने पाक को वो निशानी समझते ही नहीं. अल्लाह तआला ने अपने रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से फ़रमाया कि आप फ़रमा दीजिये कि ग़ैब तो अल्लाह के लिये है, अब रास्ता देखो, मैं भी तुम्हारे साथ राह देख रहा हूँ. तक़रीर का जवाब यह है कि खुली दलील इस पर क़ायम है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर क़ुरआने पाक का ज़ाहिर होना बहुत ही अज़ीमुश-शान चमत्कार है क्योंकि हुज़ूर उनमें पैदा हुए, उनके बीच पले बढ़े. तमाम ज़माने हुज़ूर के उनकी आँखों के सामने गुज़रे. वो ख़ूब जानते हैं कि आप ने न किसी किताब का अध्ययन किया न किसी उस्ताद की शागिर्दी की. यकबारगी क़ुरआन आप पर ज़ाहिर हुआ और ऐसी बेमिसाल आलातरीन किताब का ऐसी शान के साथ उतरना वही के बग़ैर सम्भव ही नहीं. यह क़ुरआन के खुले चमत्कार होने की दलील है. और जब ऐसी मज़बूत दलील क़ायम है तो नबुव्वत का इक़रार करने के लिये किसी दूसरी निशानी का तलब करना बिल्कुल ग़ैर ज़रूरी है. ऐसी हालत में  इस निशानी का उतारना या न उतारना अल्लाह तआला की मर्ज़ी पर है, चाहे करे चाहे न करे. तो यह काम ग़ैब हुआ और इसके लिये इन्तिज़ार लाज़िम आया कि अल्लाह क्या करता है. लेकिन वह ग़ैर ज़रूरी निशानी जो काफ़िरों ने तलब की है, उतारे या न उतारे. नबुव्वत साबित हो चुकी और रिसालत का सुबूत चमत्कारों से कमाल को पहुंच चुका.

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सूरए यूनुस – तीसरा रूकू

सूरए यूनुस – तीसरा रूकू

और जब कि हम आदमियों को रहमत का मज़ा देते हैं किसी तकलीफ़ के बाद जो उन्हें पहुंची थी जभी वो हमारी आयतों के साथ दाव चलते हैं (1)
तुम फ़रमा दो अल्लाह की ख़ुफ़िया तदबीर सबसे जल्द हो जाती है(2)
बेशक हमारे फ़रिश्ते तुम्हारे मक्र (कपट) लिख रहे हैं(3){21}
वही है कि तुम्हें ख़ुश्की और तरी में चलाता है(4)
यहां तक कि जब
तुम किश्ती में हो और वो अच्छी हवा से उन्हें लेकर चलें और उसपर ख़ुश हुए (6)
उनपर आंधी का झौंका आया और हर तरफ़ लहरों ने उन्हें आ लिया और समझ लिये कि हम घिर गए उस वक़्त अल्लाह को पुकारते हैं निरे उसके बन्दे होकर कि अगर तू इससे हमें बचा लेगा तो हम ज़रूर शुक्र अदा करने वालों में होंगे (7){22}
फिर अल्लाह जब उन्हें बचा लेता है जभी वो ज़मीन में नाहक़ ज़ियादती करने लगते हैं (8)
ऐ लोगो तुम्हारी ज़ियादती तुम्हारी ही जानों का वबाल हैं दुनिया के जीते जी बरत लो फिर तुम्हें हमारी तरफ़ फिरना है उस वक़्त हम तुम्हें जता देंगे जो तुम्हारे कौतुक थे (9){23}
दुनिया की ज़िन्दगी की कहावत तो ऐसी ही है जैसे वह पानी कि हमने आसमान से उतारा तो उसके कारण ज़मीन से उगने वाली चीज़ें सब घनी होकर निकालीं जो कुछ आदमी और चौपाए खाते हैं(10)
यहाँ तक कि जब ज़मीन ने अपना सिंगार ले लिया (11)
और ख़ूब सज गई और उसके मालिक समझे कि यह हमारे बस में आ गई (12)
हमारा हुक्म उसपर आया रात में या दिन में (13)
तो हमने उसे कर दिया काटी हुई मानो कल थी ही नहीं (14)
हम यूंही आयतें तफ़सील (विस्तार) से बयान करते हैं ग़ौर करने वालों के लिये (15){24}
और अल्लाह सलामती के घर की तरफ़ पुकारता है (16)
और जिसे चाहे सीधी राह चलाता है(17){25}
भलाई वालों के लिये भलाई है और इस से भी अधिक (18)
और उनके मुंह पर न चढ़ेगी सियाही और ख़्वारी (19)
वही जन्नत वाले हैं, वो उसमें हमेशा रहेंगे {26} और जिन्होंने बुराइयाँ कमाई (20)
तो बुराई का बदला उसी जैसा (21)
और उनपर ज़िल्लत चढ़ेगी, उन्हें अल्लाह से बचाने वाला कोई न होगा, मानो उनके चेहरों पर अंधेरी रात के टुकड़े चढ़ा दिये हैं (22)
वही दोज़ख़ वाले हैं वो उसमें हमेशा रहेंगे{27} और जिस दिन हम उन सब को उठाएंगे (23)
फिर मुश्रिकों से फ़रमाएंगे अपनी जगह रहो तुम और तुम्हारे शरीक (24)
तो हम उन्हें मुसलमानों से जुदा कर देंगे और उनके शरीक उनसे कहेंगे तुम हमें कब पूजते थे(25){28}
तो अल्लाह गवाह काफ़ी है हम में और तुम में कि हमें तुम्हारे पूजने की ख़बर भी न थी{29} यहाँ पर हर जान जांच लेगी जो आगे भेजा(26)
और अल्लाह की तरफ़ फेरे जाएंगे जो उनका सच्चा मौला है और उनकी सारी बनावटें (27)
उनसे गुम हो जाएंगी.(28){30}

तफ़सीर
सूरए यूनुस – तीसरा रूकू

(1) मक्का वालों पर अल्लाह तआला ने दुष्काल डाल दिया जिसकी मुसीबत में वो सात बरस गिरफ़्तार रहे यहाँ तक कि हलाकत के क़रीब पहुंचे. फिर उसने रहम फ़रमाया, बारिश हुई, ज़मीनों पर हिरयाली छाई. तो अगरचे इस तकलीफ़ और राहत दोनों में क़ुदरत की निशानियाँ थीं और तकलीफ़ के बाद राहत बड़ी महान नेअमत थी, इसपर शुक्र लाज़िम था, मगर बजाय इसके उन्होंने नसीहत न मानी और फ़साद व कुफ़्र की तरफ़ पलटें.

(2) और उसका अज़ाब देर नहीं करता.

(3) और तुम्हारी छुपवाँ तदबीरें कर्मों का लेखा जोखा रखने वाले फ़रिश्तों पर भी छुपी हुई नहीं हैं तों जानने वाले ख़बर रखने वाले अल्लाह से कैसे छुप सकती हैं.

(4) और तुम्हें दूरियाँ तय करने की क़ुदरत देता है. ख़ुश्की में तुम पैदल और सवार मंज़िलें तय करते हो और नदियों में, किश्तियों और जहाजों से सफ़र करते हो. वह तुम्हें ख़ुश्की और तरी दोनों में घूमने फिरने के साधन अता फ़रमाता है.

(5) यानी किश्तियाँ.

(6) कि हवा अनुकूल है, अचानक.

(7) तेरी नेअमतों के, तुझपर ईमान लाकर और ख़ास तेरी इबादत करके.

(8) और वादे के ख़िलाफ़ करके कुफ़्र और गुनाहों में जकड़े जाते हैं.

(9) और उनका तुम्हें बदला देंगे.

(10) ग़ल्ले और फल और हरियाली.

(11) ख़ूब फूली, हरी भरी और तरो ताज़ा हुई.

(12) कि खेतियाँ तैयार हो गई, फल पक गए, ऐसे वक़्त.

(13) यानी अचानक हमारा अज़ाब आया, चाहे बिजली गिरने की शक्ल में या ओले बरसने या आंधी चलने की सूरत में.

(14) यह उन लोगों के हाल की एक मिसाल है जो दुनिया के चाहने वाले हैं और आख़िरत की उन्हें कुछ परवाह नहीं. इसमें बहुत अच्छे तरीक़े पर समझाया गया है कि दुनियावी ज़िन्दगानी उम्मीदों का हरा बाग़ है, इसमें उम्र खोकर जब आदमी उस हद पर पहुंचता है जहाँ उसको मुराद मिलने का इत्मीनान हो और वह कामयाबी के नशे में मस्त हो, अचानक उसको मौत पहुंचती है और वह सारी लज़्ज़तों और नेअमतों से मेहरूम हो जाता है. क़तादा  ने कहा कि दुनिया का तलबगार जब बिल्कुल बेफ़िक्र होता है, उस वक़्त उसपर अल्लाह का अज़ाब आता है और उसका सारा सामान जिससे उसकी उम्मीदें जुड़ी थीं, नष्ट हो जाता है.

(15) ताकि वो नफ़ा हासिल करें और शक तथा वहम के अंधेरों से छुटकारा पाएं और नश्वर दुनिया की नापायदारी से बाख़बर हों.

(16) दुनिया की नापायदारी बयान फ़रमाने के बाद हमेशगी की दुनिया की तरफ़ दावत दी. क़तादा ने कहा कि दारे. सलाम जन्नत है. यह अल्लाह की भरपूर रहमत और मेहरबानी है कि अपने बन्दों को जन्नत की दावत दी.

(17) सीधी राह दीने इस्लाम है. बुख़ारी की हदीस में है, नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में फ़रिश्ते हाज़िर हुए, आप ख़्वाब में थे. उनमें से कुछ ने कहा कि आप ख़्वाब में है और कुछ ने कहा कि आँखें ख़्वाब में है, दिल बेदार है. कुछ कहने लगे कि इनकी कोई मिसाल तो बयान करो, तो उन्होंने कहा, जिस तरह किसी शख़्स ने एक मकान बनाया और उसमें तरह तरह की नेअमतें उपलब्ध कीं और एक बुलाने वाले को भेजा कि लोगों को बुलाए. जिसने उस बुलाने वाले की फ़रमाँबरदारी की, उस मकान में दाख़िल हुआ और उन नेअमतों को खाया पिया और जिसने बुलाने वाले की आवाज़ न मानी, वह मकान में दाख़िल न हो सका न कुछ खा सका. फिर वो कहने लगे कि इस मिसाल पर गहराई से ग़ौर करो कि समझ में आए. मकान जन्नत है, बुलाने वाले मुहम्मद हैं, जिसने उनकी फ़रमाँबरदारी की, उसने अल्लाह की फ़रमाँबरदारी की.

(18) भलाई वालों से अल्लाह के फ़रमाँबरदार बन्दे, ईमान वाले मुराद हैं. और यह जो फ़रमाया कि उनके लिये भलाई है, इस भलाई से जन्नत मुराद है. और “इससे भी ज़्यादा”का मतलब है, अल्लाह का दीदार, मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है कि जन्नतियों के जन्नत में दाख़िल होने के बाद अल्लाह तआला फ़रमाएगा, क्या तुम चाहते हो कि तुमपर और ज़्यादा इनायत करूं. वो अर्ज़ करेंगे या रब, क्या तुने हमारे चेहरे सफ़ेद नहीं किये, क्या तूने हमें जन्नत में दाख़िल नहीं फ़रमाया़ क्या तूने हमें दोज़ख़ से निजात नहीं दी. हुज़ूर ने फ़रमाया, फिर पर्दा उठा दिया जाएगा तो अल्लाह का दीदार उन्हें हर नेअमत से ज़्यादा प्यारा होगा. सही हदीस की किताबों में बहुत सी रिवायतें यह साबित करती हैं कि आयत में “इससे भी ज़्यादा” से अल्लाह का दीदार मुराद है.

(19) कि यह बात जहन्नम वालों के लिये है.

(20) यानी कुफ़्र और गुनाह में जकड़ गए.

(21) ऐसा नहीं कि जैसे नेकियों का सवाब दस गुना और सात सौ गुना किया जाता है ऐसे ही बदियों का अज़ाब भी बढ़ा दिया जाए, बल्कि जितनी बदी होगी उतना ही अज़ाब किया जाएगा.

(22) यह हाल होगा उनकी रूसियाही का, ख़ुदा की पनाह.

(23) और तमाम सृष्टि को हिसाब के मैदान में जमा करेंगे,

(24) यानी वो बुत जिन्हें तुम पूजते थे.

(25) क़यामत के दिन एक घड़ी ऐसी सख़्ती की होगी कि बुत अपने पुजारियों की पूजा का इनकार कर देंगे और अल्लाह की क़सम खाकर कहेंगे कि हम न सुनते थे, न देखते थे, न जानते थे, न समझते थे कि तुम हमें पूजते हो. इसपर बुत परस्त कहेंगे कि अल्लाह की क़सम हम तुम्हीं को पूजते थे तो बुत कहेंगे.

(26) यानी उस मैदान में सब को मालूम हो जाएगा कि उन्होंने पहले जो कर्म किये थे वो कैसे थे. अच्छे या बुरे, नफ़ा वाले या घाटे वाले.

(27) बुतों को ख़ुदा का शरीक बताना और मअबूद ठहराना.

(28) और झूठी और बेहक़ीक़त साबित होंगी.

सूरए यूनुस – चौथा रूकू

सूरए यूनुस – चौथा रूकू

तुम फ़रमाओ तुम्हें कौन रोज़ी देता है आसमान और ज़मीन से(1)
या कौन मालिक है कान और आँखों का (2)
और कौन निकालता है ज़िन्दा को मुर्दे से और निकालता है मुर्दा को ज़िन्दा से(3)
और कौन तमाम कामों की तदबीर (युक्ति) करता है तो अब कहेंगे कि अल्लाह (4)
तो तुम फ़रमाओ तो क्यों नहीं डरते(5){31}
तो यह अल्लाह है तुम्हारा सच्चा रब (6)
फिर हक़ के बाद क्या है मगर गुमराही (7)
फिर कहाँ फिरे जाते हो {32} यूंही साबित हो चुकी है तेरे रब की बात फ़ासिक़ों (दुराचारियों) (8)
पर तो वो ईमान नहीं लाएंगे{33} तुम फ़रमाओ तुम्हारे शरीकों में (9)
कोई ऐसा है कि पहले बनाए फिर फ़ना (विनाश) के बाद दोबारा बनाए (10)
तुम फ़रमाओ अल्लाह पहले बनाता है फिर फ़ना के बाद दोबारा बनाएगा तो कहाँ औंधे जाते हो(11{34}
तुम फ़रमाओ तुम्हारे शरीकों में कोई ऐसा है कि हक़ की राह दिखाए (12)
तुम फ़रमाओ कि अल्लाह हक़ की राह दिखाता है, तो क्या जो हक़ की राह दिखाए उसके हुक्म पर चलना चाहिये या उसके जो ख़ुद ही राह न पाए जब तक राह न दिखाया जाए (13)
तो तुम्हें क्या हुआ कैसा हुक्म लगाते हो {35} और(14)
उनमें अक्सर तो नहीं चलते मगर गुमान पर (15)
बेशक गुमान हक़ का कुछ काम नहीं देता, बेशक अल्लाह उनके कामों को जानता है {36} और क़ुरआन की यह शान नहीं कि कोई अपनी तरफ़ से बनाले बे अल्लाह के उतारे(16)
हाँ वह अगली किताबों की तस्दीक़ {पुष्टि} है (17)
और लौह में जो कुछ लिखा है सबकी तफ़सील है इसमें कुछ शक नहीं है जगत के रब की तरफ़ से है{37} क्या ये कहते हैं (18)
कि उन्होंने इसे बना लिया है, तुम फ़रमाओ (19)
तो इस जैसी कोई एक सूरत ले आओ और अल्लाह को छोड़कर जो मिल सकें सबको बुला लाओ(20)
अगर तुम सच्चे हो {38} बल्कि उसे झुटलाया जिसके इल्म पर क़ाबू न पाया(21)
और अभी उन्होंने इसका अंजाम नहीं देखा, (22)
ऐसे ही उनसे अगलों ने झुटलाया था (23)
तो देखो ज़ालिमों का कैसा अंजाम हुआ(24){39}
और उनमें (25)
कोई इस (26)
पर ईमान लाता है और उनमें कोई इस पर ईमान नहीं लाता है, और तुम्हारा रब फ़सादियों को ख़ूब जानता है(27){40}

तफ़सीर
सूरए यूनुस – चौथा रूकू

(1) आसमान से मेंह बरसाकर और ज़मीन में हरियाली उगाकर.

(2) और ये हवास या इन्द्रियाँ तुम्हे किसने दिये है, किसने ये चमत्कार तुम्हें प्रदान किये हैं, कौन इन्हें मुद्दतों सुरक्षित रखता है.

(3) इन्सान को वीर्य से और वीर्य को इन्सान से, चिड़िया को अन्डे से और अन्डे को चिड़िया से. मूमिन को काफ़िर से और  काफ़िर को मूमिन से. आलिम को जाहिल से और जाहिल को आलिम से.

(4) और उसकी सम्पूर्ण क़ुदरत का ऐतिराफ़ करेंगे और इसके सिवा कुछ चारा न होगा.

(5) उसके अज़ाब से, और क्यों बुतों को पूजते और उनको मअबूद बनाते हो जबकि वो कुछ क़ुदरत नहीं रखते.

(6) जिसकी ऐसी भरपूर क़ुदरत है.

(7) यानी जब ऐसी खुली दलीलें और साफ़ प्रमाणों से साबित हो गया कि इबादत के लायक़ सिर्फ़ अल्लाह है, तो उसके अलावा सब बातिल और गुमराही, और जब तुमने उसकी क़ुदरत को पहचान लिया और उसकी क्षमता का ऐतिराफ़ कर लिया तो.

(8) जो कुफ़्र में पक्के हो गए. रब की बात से मुराद है अल्लाह की तरफ़ से जो लिख दिया गया. या अल्लाह तआला का इरशाद “लअम लअन्ना जहन्नमा.”… (मैं तुम सबसे जहन्नम भर दूंगा – सूरए अअराफ़, आयत 18)

(9) जिन्हें ऐ मुश्रिकों, तुम मअबूद ठहराते हो.

(10) इसका जवाब ज़ाहिर है कि कोई ऐसा नहीं क्यों कि मुश्रिक भी यह जानते हैं कि पैदा करने वाला अल्लाह ही है, लिहाज़ा ऐ मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम.

(11) और ऐसी रौशन दलीलें क़ायम होने के बाद सीधे रास्तें से मुंह फेरते हो.

(12) तर्क और दलीलें क़ायम करके, रसूल भेजकर, किताबें उतारकर,  समझ वालों को अक़्ल और नज़र अता फ़रमा कर. इसका खुला जवाब यह है कि कोई नहीं, तो ऐ हबीब.

(13) जैसे कि तुम्हारे बुत हैं किसी जगह जा नहीं सकते जब तक कि कोई उठा ले जाने वाला उन्हें उठाकर न ले जाए. और न किसी चीज़ की हक़ीक़त को समझें और न सच्चाई की राह को पहचानें, बग़ैर इसके कि अल्लाह तआला उन्हें ज़िन्दगी, अक़्ल और नज़र दे. तो जब उनकी मजबूरी का यह आलम है तो वो दूसरों को क्या राह बता सकेंगे. ऐसों को मअबूद बनाना, फ़रमाँबरदारी करना कितना ग़लत और बेहूदा है.

(14) मुश्रिक लोग.

(15) जिसकी उनके पास कोई दलील नहीं, न उसके ठीक होने का इरादा और यक़ीन. शक में पड़े हुए हैं और यह ख़याल करते हैं कि पहले लोग भी बुत पूजते थे, उन्होंने कुछ तो समझा होगा.

(16) मक्का के काफ़िरों ने यह वहम किया था कि क़ुरआन शरीफ़ सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ख़ुद बना लिया है. इस आयत में उनका यह वहम दूर फ़रमाया गया कि क़ुरआने करीम ऐसी किताब ही नहीं जिसकी निस्बत शक हो सके. इसकी मिसाल बनाने से सारी सृष्टि लाचार है तो यक़ीनन वह अल्लाह की उतारी हुई किताब है.

(17) तौरात और इंजील वग़ैरह की.

(18) काफ़िर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की निस्बत.

(19)अगर तुम्हारा यह ख़याल है तो तुम भी अरब हो, ज़बान और अदब, फ़साहत और बलाग़त के दावेदार हो, दुनिया में कोई इन्सान ऐसा नहीं हैं जिसके कलाम के मुक़ाबिल कलाम बनाने को तुम असम्भव समझते हो. अगर तुम्हारे ख़याल में यह इन्सान का कलाम है.

(20 )और उनसे मदद लो और सब मिलकर क़ुरआन जेसी एक सूरत तो बनाओ.

(21) यानी क़ुरआन शरीफ़ को समझने और जानने के बग़ैर उन्होंने इसे झुटलाया और यह निरी जिहालत है कि किसी चीज़ को जाने बग़ैर उसका इन्कार किया जाए. क़ुरआन शरीफ़ में ऐसे उलूम शामिल होना, जिसे इल्म और अक़्ल वाले न छू सकें, इस किताब की महानता और बुज़ुर्गी ज़ाहिर करता है. तो ऐसी उत्तम उलूम वाली किताब को मानना चाहिये था न कि इसका इन्कार करना.

(22) यानी उस अज़ाब को जिसकी क़ुरआन शरीफ़ में चुनौतियाँ हैं.

(23)दुश्मन से अपने रसूलों को, बग़ैर इसके कि उनके चमत्कार और निशानियाँ देखकर सोच समझ से काम लेते.

(24) और पहली उम्मतें अपने नबियों को झुटलाकर कैसे कैसे अज़ाबों में जकड़ी गई तो ऐ हबीब सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, आप को झुटलाने वालों को डरना चाहिये.

(25)मक्का वाले.

(26) नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम या क़ुरआन शरीफ़

(27) जो दुश्मनी से ईमान नहीं लाते और कुफ़्र पर अड़े रहते हैं.

सूरए यूनुस – पाँचवां रूकू

सूरए यूनुस – पाँचवां रूकू

और अगर वो तुम्हें झुटलाएं (1)
तो फ़रमा दो कि मेरे लिये मेरी करनी और तुम्हारे लिये तुम्हारी करनी (2)
तुम्हें मेरे काम से इलाक़ा नहीं और मुझे तुम्हारे काम से तअल्लुक़ नहीं (3){41}
और उनमें कोई वो हैं जो तुम्हारी तरफ़ कान लगाते हैं(4)
तो क्या तुम बहरों को सुना दोगे अगरचे उन्हें अक़ल न हो (5){42}
और उनमें कोई तुम्हारी तरफ़ तकता है(6)
क्या तुम अंधों को राह दिखा दोगे अगरचे वो न सूझें{43} बेशक अल्लाह लोगों पर कुछ ज़ुल्म नहीं करता(7)
हाँ लोग ही अपनी जानों पर ज़ुल्म करते हैं (8){44}
और जिस दिन उन्हें उठाएगा(9)
मानों दुनिया में न रहे थे मगर उस दिन की एक घड़ी (10)
आपस में पहचान करेंगे(11)
कि पूरे घाटे में रहे वो जिन्होंने अल्लाह से मिलने को झूटलाया और हिदायत पर न थे(12){45}
और अगर हम तुम्हें दिखा दें कुछ (13)
उसमें से जो उन्हें वादा दे रहे हैं (14)
या तुम्हें पहले ही अपने पास बुला ले(15)
हर हाल में उन्हें हमारी तरफ़ पलट कर आना है फिर अल्लाह गवाह है (16)
उनके कामों पर {46} और हर उम्मत में एक रसूल हुआ (17)
जब उसका रसूल उनके पास आता(18)
उनपर इन्साफ़ का फ़ैसला कर दिया जाता (19)
और उनपर ज़ुल्म न होता {47} और कहते हैं यह वादा कब आएगा अगर तुम सच्चे हो (20){48}
तुम फ़रमाओ मैं अपनी जान के बुरे भले का (ज़ाती) इख़्तियार नहीं रखता मगर जो अल्लाह चाहे(21)
हर गिरोह का एक वादा है(22)
जब उनका वादा आएगा तो एक घड़ी न पीछे हटे न आगे बढ़े {49} तुम फरमाओ भला बताओ तो अगर उसका अज़ाब और(23)
तुमपर रात को आए (24)
या दिन को (25)
तो उसमें वह कौन सी चीज़ है कि मुजरिमों को जिसकी जल्दी है {50} तो क्या जब(26)
हो पड़ेगा उस वक़्त उसका यक़ीन करेंगे(27)
क्यों अब मानते हो पहले तो (28)
इसकी जल्दी मचा रहे थे {51} फिर ज़ालिमों से कहा जाएगा हमेशा का अज़ाब चखो तुम्हें कुछ और बदला न मिलेगा मगर वही जो कमाते थे (29){52}
और तुमसे पूछते हैं क्या वह (30) हक़ है, तुम फ़रमाओ, हाँ मेरे रब की क़सम बेशक वह ज़रूर हक़ है और तुम कुछ थका न सकोगे(31){53}

तफ़सीर
सूरए यूनुस – पाँचवां रूकू

(1) ऐ मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, और उनकी राह पर आने और सच्चाई और हिदायत क़ुबूल करने की उम्मीद टूट जाए.

(2) हर एक अपने अमल का बदला पाएगा.

(3) किसी के अमल पर दूसरे की पकड़ न होगी. जो पकड़ा जाएगा अपने कर्मों पर पकड़ा जाएगा. यह फ़रमान चेतावनी के तौर पर है कि तुम नसीहत नहीं मानते और हिदायत क़ुबूल नहीं करते तो इसका वबाल ख़ुद तुमपर होगा, किसी दूसरे को इससे नुक़सान नहीं.

(4) और आपसे क़ुरआन शरीफ़ और दीन के अहकाम सुनते हैं और दुश्मनी की वजह से दिल में जगह नहीं देते और क़ुबूल नहीं करते, तो यह सुनना बेकार है, वो हिदायत से नफ़ा न पाने में बेहरों की तरह हैं.

(5) और वो न हवास से काम लें न अक़्ल से.

(6) और सच्चाई की दलीलों और नबुव्वत की निशानियों को देखता है, लेकिन तस्दीक़ नहीं करता और इस देखने से नतीजा नहीं निकलता, फ़ायदा नहीं उठाता, दिल की नज़र से मेहरूम और बातिन यानी अन्दर का अन्धा है.

(7) बल्कि उन्हें हिदायत और राह पाने के सारे सामान अता फ़रमाता है और रौशन दलीलें क़ायम फ़रमाता है.

(8) कि इन दलीलों में ग़ौर नहीं करते और सच्चाई साफ़ स्पष्ट हो जाने के बावुजूद ख़ुद गुमराही में गिरफ़्तार होते हैं.

(9) क़ब्रों से, हिसाब के मैदान में हाज़िर करने के लिये, तो उस दिन की हैबत और वहशत से यह हाल होगा कि वो दुनिया में रहने की मुद्दत को बहुत थोड़ा समझेंगे और यह ख़याल करेंगे कि….

(10) और इसकी वजह यह है कि चूंकि काफ़िरों ने दुनिया की चाह में उम्रें नष्ट कर दीं और अल्लाह की फ़रमाँबरदारी, जो आज काम आती, बजा न लाए तो उनकी ज़िन्दगी का वक़्त उनके काम न आया. इसलिये वो उसे बहुत ही कम समझेंगे.

(11) क़ब्रों से निकलते वक़्त तो एक दूसरे को पहचानेंगे जैसा दुनिया में पहचानते थे, फिर क़यामत के दिन की हौल और दहशतनाक मन्ज़र देखकर यह पहचान बाक़ी न रहेगी. एक क़ौल यह है कि क़यामत के दिन पल पल हाल बदलेंगे. कभी ऐसा हाल होगा कि एक दूसरे को पहचानेंगे, कभी ऐसा कि न पहचानेंगे और जब पहचानेंगे तो कहेंगे.

(12) जो उन्हें घाटे से बचाती.

(13)अज़ाब.

(14) दुनिया ही में आपके ज़मानए हयात में, तो वह मुलाहिज़ा कीजिये.

(15) तो आख़िरत में आपको उनका अज़ाब दिखाएंगे.  इस आयत से साबित हुआ कि अल्लाह तआला अपने रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को काफ़िरों के बहुत से अज़ाब और उनकी ज़िल्लत और रूसवाइयाँ आपकी दुनियावी ज़िन्दगी ही में दिखाएगा. चुनांचे बद्र वग़ैरह में दिखाई गई और जो अज़ाब काफ़िरों के लिये कुफ़्र और झुटलाने के कारण आख़िरत में मुक़र्रर फ़रमाता है वह आख़िरत में दिखाएगा.

(16) ख़बर वाला है, अज़ाब देने वाला है.

(17) जो उन्हें सच्चाई की तरफ़ बुलाता और फ़रमाबँरदारी और ईमान का हुक्म करता.

(18) और अल्लाह के आदेशों की तबलीग़ या प्रचार करता, तो कुछ लोग ईमान लाते और कुछ झुटलाते और कुछ इन्कारी हो जाते हो.

(19) कि रसूल को और उनपर ईमान लाने वाले को निजात दी जाती और झुटलाने वालों को अज़ाब से हलाक कर दिया जाता. आयत की तफ़सीर में दूसरा क़ौल यह है कि इस में आख़िरत का बयान है और मानी ये हैं कि क़यामत के दिन हर उम्मत के लिये एक रसूल होगा जिसकी तरफ़ वह मन्सूब होगी. जब वह रसूल हिसाब के मैदान में आएगा और मूमिन व काफ़िर पर शहदात देगा तब उनमें फ़ैसला किया जायगा कि ईमान वालों को निजात होगी और काफ़िर अज़ाब में जकड़े जायेंगे.

(20) जब आयत “इम्मा नूरियन्नका” में अज़ाब की चेतावनी दी गई तो काफ़िरों ने सरकशी से यह कहा कि ऐ मुहम्मद, जिस अज़ाब का आप वादा देते हैं वह कब आएगा. उसमें क्या देर है. उस अज़ाब को जल्द लाइये. इसपर यह आयत उतरी.

(21) यानी दुश्मनों पर अज़ाब उतरना और दोस्तों की मदद करना और उन्हें ग़ल्बा देना, यह सब अल्लाह की मर्ज़ी है और अल्लाह की मर्ज़ी में.

(22) उसके हलाक और अज़ाब का एक समय निर्धारित है, लौहे मेहफ़ूज़ में लिखा हुआ है.

(23) जिसकी तुम जल्दी करते हो.

(24) जब तुम ग़ाफ़िल पड़े सोते हो.

(25) जब तुम रोज़ी रोटी के कामों में मश्ग़ूल हो.

(26) वह अज़ाब तुम पर नाज़िल.

(27) उस वक़्त का यक़ीन कुछ फ़ायदा न देगा और कहा जाएगा.

(28) झुटलाने और मज़ाक़ उड़ाने के तौर पर.

(29) यानी दुनिया में जो अमल करते थे और नबियों को झुटलाने और कुफ़्र में लगे रहते थे उसी का बदला.

(30) उठाए जाने और अज़ाब, जिसके नाज़िल होने की आपने हमें ख़बर दी.

(31) यानी वह अज़ाब तुम्हें ज़रूर पहुंचेगा.

सूरए यूनुस – छटा रूकू

सूरए यूनुस – छटा रूकू

और अगर हर ज़ालिम जान ज़मीन में जो कुछ है(1)
सब की मालिक होती ज़रूर अपनी जान छूड़ाने में देती(2)
और दिल में चुपके चुपके पशेमान हुए जब अज़ाब देखा और उनमें इन्साफ़ से फ़ैसला कर दिया गया और उनपर ज़ुल्म न होगा{54} सुन लो बेशक अल्लाह ही का है जो कुछ आसमानों में है और ज़मीन में (3)
सुन लो बेशक अल्लाह का वादा सच्चा है मगर उनमें अक्सर को ख़बर नहीं {55} वह जिलाता और मारता है और उसी की तरफ़ फिरोगे{56} ऐ लोगो तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से नसीहत आई (4)
और दिलों की सेहत और हिदायत और रहमत ईमान वालों के लिये {57} तुम फ़रमाओ अल्लाह ही के फ़ज़्ल (अनुकम्पा) और उसी की रहमत और उसी पर चाहिये कि ख़ुशी करें(5)
वह उनके सब धन दौलत से बेहतर है {58} तुम फ़रमाओ भला बताओ तो वह जो अल्लाह ने तुम्हारे लिये रिज़्क़ (जीविका) उतारा उसमें तुम ने अपनी तरफ़ से हराम व हलाल ठहरा लिया (6)
तुम फ़रमाओ क्या अल्लाह ने इसकी तुम्हें इजाज़त दी या अल्लाह पर झूट बांधते हो (7){59}
और क्या गुमान है उनका जो अल्लाह पर झूट बांधते हैं कि क़यामत में उनका क्या हाल होगा, बेशक अल्लाह लोगों पर फ़ज़्ल करता है (8)
मगर अक्सर लोग शुक्र नहीं करते{60}

तफ़सीर 
सूरए यूनुस – छटा रूकू

(1) माल मत्ता, ख़ज़ाना और दफ़ीना.

(2) और क़यामत के दिन उसको रिहाई के लिये फ़िदिया कर डालती. मगर यह फ़िदिया क़ुबूल नहीं और तमाम दुनिया की दौलत ख़र्च करके भी रिहाई सम्भव नहीं. जब क़यामत में यह मंज़र पेश आया और क़ाफ़िरों की उम्मीदें टूटीं.

(3) तो काफ़िर किसी चीज़ का मालिक ही नहीं बल्कि वह ख़ुद भी अल्लाह का ममलूक है, उसका फ़िदिया देना सम्भव ही नहीं,

(4) इस आयत मे क़ुरआन शरीफ़ के आने और इसमें मौज़ूद नसीहतों, शिफ़ा, हिदायत और रहमत का बयान है कि यह किताब इन बड़े फ़ायदों से ओतप्रोत है. नसीहत के मानी है वह चीज़ जो इन्सान को उसकी पसन्द की चीज़ की तरफ़ बुलाए और ख़तरे से बचाए. ख़लील ने कहा कि यह नेकी की नसीहत करना है जिससे दिल में नर्मी पैदा हो. शिफ़ा से मुराद यह है कि क़ुरआन शरीफ़ दिल के अन्दर की बीमारियों को दूर करता है. दिल की ये बीमारियाँ दुराचार, ग़लत अक़ीदे और मौत की तरफ़ ले जाने वाली जिहालत हैं. क़ुरआने पाक इन तमाम रोगों को दूर करता है. क़ुरआने करीम की विशेषता में हिदायत भी फ़रमाया, क्योंकि वह गुमराही से बचाता और सच्चाई की राह दिखाता है और ईमान वालों के लिये रहमत, इसलिये फ़रमाया कि वह इससे फ़ायदा उठाते हैं.

(5) किसी प्यारी और मेहबूब चीज़ के पाने से दिल को जो लज़्ज़त हासिल होती है उसको फ़रह कहते हैं. मानी ये हैं कि ईमान वालों को अल्लाह के फ़ज़्ल और रहमत पर ख़ुश होना चाहिये कि उसने उन्हें नसीहतों, और दिलों की अच्छाई और ईमान के साथ दिल की राहत और सुकून अता फ़रमाए. हज़रत इब्ने अब्बास व हसन व क़तादा ने कहा कि अल्लाह के फ़ज़्ल से इस्लाम और उसकी रहमत से क़ुरआन मुराद है. एक क़ौल यह है कि फ़ज़्लुल्लाह से क़ुरआन और रहमत से हदीसें मुराद हैं.

(6) इस आयत से साबित हुआ कि किसी चीज़ को अपनी तरफ़ से हलाल या हराम करना मना और ख़ुदा पर झूट जोड़ना है. आजकल बहुत लोग इसमें जकड़े हुए हैं. ममनूआत यानी वर्जित चीज़ों को हलाल कहते हैं और जिन चीज़ों के इस्तमाल की अल्लाह व रसूल न इजाज़त दी है, उसको हराम. कुछ सूद को हलाल करने पर अड़े हैं, कुछ तस्वीरों को, कुछ खेल तमाशों को, कुछ औरतों की बेक़ैदियों और बेपर्दगीयों को, कुछ भूख हड़ताल को, जो आत्म हत्या है, हलाल समझते हैं. और कुछ लोग हलाल चीज़ों को हराम ठहराने पर तुले हुए हैं, जैसे मीलाद की महफ़िल को, फ़ातिहा को, ग्यारहवीं को और ईसाले सवाब के दूसरे तरीक़ों को, कुछ मीलाद शरीफ़ और फ़ातिहा व तोशा की शीरीनी और तबर्रूक को, जो सब हलाल और पाक चीज़ें हैं, नाजायज़ और वर्जित बताते हैं.

(8) कि रसूल भेजता है, किताबें नाज़िल फ़रमाता है, और हलाल व हराम से बाख़बर फ़रमाता है.

सूरए यूनुस – सातवाँ रूकू



और तुम किसी काम में हो(1)
और उसकी तरफ़ से कुछ क़ुरआन पढ़ो और तुम लोग(2)
कोई काम करो हम तुमपर गवाह होते हैं जब तुम उसको शुरू करते हो, और तुम्हारे रब से ज़र्रा भर कोई चीज़ ग़ायब नहीं ज़मीन में न आसमान में और न उससे छोटी और न उससे बड़ी कोई नहीं जो एक रौशन किताब में न हो (3){61}
सुन लो बेशक अल्लाह के वलियों पर न कुछ डर है न कुछ ग़म (4){62}
उन्हें ख़ुशख़बरी है दुनिया की ज़िन्दगी में (5)
और आख़िरत में, अल्लाह की बातें बदल नहीं सकती(6)
यही बड़ी कामयाबी है {64} और तुम उनकी बातों का ग़म न करो(7)
बेशक इज़्ज़त सारी अल्लाह ही के लिये है(8)
वही सुनता जानता है {65} सुन लो बेशक अल्लाह ही के मुल्क हैं जितने आसमानों में हैं और जितने ज़मीनों में (9)
और काहे के पीछे जा रहे हैं (10)
वो जो अल्लाह के सिवा शरीक पुकार रहे हैं, वो तो पीछे नहीं जाते मगर गुमान के और वो तो नहीं मगर अटकलें दौड़ाते(11){66}
वही है जिसने तुम्हारे लिये रात बनाई कि उसमें चैन पाओ और दिन बनाया तुम्हारी आँखें खोलता (13)
बेशक उसमें निशानियां हैं सुनने वालों के लिये (14){67}
बोले अल्लाह ने अपने लिये औलाद बनाई (15)
पाकी उसको, वही बेनियाज़ है, उसी का है जो कुछ आसमानों में और जो कुछ ज़मीन में(16)
तुम्हारे पास इसकी कोई भी सनद नहीं, क्या अल्लाह पर वह बात बताते हो जिसका तुम्हें इल्म नहीं {68} तुम फ़रमाओ वो जो अल्लाह पर झूट बांधते हैं उनका भला न होगा {69} दुनिया में कुछ बरत लेना है फिर उन्हें हमारी तरफ़ वापस आना फिर हम उन्हें सख़्त अज़ाब चखाएंगे बदला उनके कुफ़्र का{70}

सूरए यूनुस – सातवाँ रूकू

(1) ऐ हबीबे अकरम सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम.

(2) ऐ मुसलमानों.

(3) “किताबे मुबीन” यानी रौशन किताब से लोहे मेहफ़ूज़ मुराद है.

(4) “वली” की अस्ल विला से है जो क़ुर्ब और नुसरत के मानी में हैं. अल्लाह का वली वह है जो फ़र्ज़ों से अल्लाह का क़ुर्ब हासिल करें और अल्लाह की फ़रमाँबरदारी में लगा रहे और उसका दिल अल्लाह के जलाल के नूर को पहचानने में डूबा हो जब देखे, अल्लाह की क़ुदरत की दलीलों को देखे और जब सुने अल्लाह की आयतें ही सुने, और जब बोले तो अपने रब की प्रशंसा और तअरीफ़ ही के साथ बोले, और जब हरकत करे अल्लाह की आज्ञा के पालन में ही हरकत करे, और जब कोशिश करे उसी काम में कोशिश करे जो अल्लाह के क़रीब पहुंचने का ज़रिया हो. अल्लाह के ज़िक्र से न थके और दिल की आँख से ख़ुदा के सिवा ग़ैर को न देखे. यह विशेषता वलियों की है. बन्दा जब इस हाल पर पहुंचता है तो अल्लाह उसका वली और सहायक और मददगार होता है. मुतकल्लिमीन कहते हैं, वली वह है जो प्रमाण पर आधारित सही अक़ीदे रखता हो और शरीअत के मुताबिक़ नेक कर्म करता हो. कुछ आरिफ़ीन ने फ़रमाया कि विलायत नाम है अल्लाह के क़ुर्ब और अल्लाह के साथ मश्ग़ूल रहने का. जब बन्दा इस मक़ाम पर पहुंचता है तो उसको किसी चीज़ का डर नहीं रहता और न किसी चीज़ से मेहरूम होने का ग़म होता है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि वली वह है जिसे देखने से अल्लाह याद आए. सही तबरी की हदीस में भी है. इब्ने ज़ैद ने कहा कि वली वही है जिसमें वह सिफ़त और गुण हो जो इस आयत में बयान किया गया है. “अल्लज़ीना आमनू वकानू यत्तक़ून” यानी ईमान और तक़वा दोनो का संगम हो. कुछ उलमा ने फ़रमाया, वली वो है जो ख़ालिस अल्लाह के लिये महब्बत करें. वलियों की यह विशेषता कई हदीसों में आई है. कुछ बुज़ुर्गों ने फ़रमाया, वली वो हैं जो फ़रमाँबरदारी से अल्लाह के क़ुर्ब की तलब करते हैं और अल्लाह तआला करामत और बुज़ुर्गी से उनके काम बनाता है, या वो जिन की हिदायत के प्रमाण के साथ अल्लाह कफ़ील हो और वो उसकी बन्दगी का हक़ अदा करने और उसकी सृष्टि पर रहम करने के लिये वक़्फ हो गए. ये अर्थ और इबारतें अगरचे विभिन्न हैं लेकिन उनमें विरोधाभास कुछ भी नहीं है क्योंकि हर एक इबारत में वली की एक एक विशेषता बयान कर दी गई है जिसे अल्लाह का क़ुर्ब हासिल होता है. ये तमाम विशेषताएं और गुण उसमें होते हैं. विलायत के दर्जों और मरतबों में हर एक अपने दर्जें के हिसाब से बुज़ुर्गी और महानता रखता है.

(5) इस ख़ुशख़बरी से या तो वह मुराद है जो परहेज़गार ईमानदारों को क़ुरआन शरीफ़ में जा बजा दी गई है या बेहतरीन ख़्वाब मुराद हैं जो मूमिन देखता है या उसके लिये देखा जाता है जैसा कि बहुत सी हदीसों में आया है और इसका कारण यह है कि वली का दिल और उसकी आत्मा दोनों अल्लाह के ज़िक्र में डूबे रहते हैं. तो ख़्वाब के वक़्त अल्लाह के ज़िक्र के सिवा उसके दिल में कुछ नहीं होता. इसलिये वली जब ख़्वाब देखता है तो उसका ख़्वाब सच्चा और अल्लाह तआला की तरफ़ से उसके हक़ में ख़ुशख़बरी होती है. कुछ मुफ़स्सिरों ने इस ख़ुशख़बरी से दुनिया की नेकनामी भी मुराद ली है. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अर्ज़ किया गया, उस शख़्स के लिये क्या इरशाद फ़रमाते हैं जो नेक कर्म करता है और लोग उसकी तारीफ़ करते हैं. फ़रमाया यह मूमिन के लिये ख़ुशख़बरी है. उलमा फ़रमाते हैं कि यह ख़ुशख़बरी अल्लाह की रज़ा और  अल्लाह के महब्बत फ़रमाने और सृष्टि के दिल में महब्बत डाल देने की दलील है, जैसा कि हदीस में आया है कि उसको ज़मीन में मक़बूल कर दिया जाता है. क़तादा ने कहा कि फ़रिश्ते मौत के समय अल्लाह तआला की तरफ़ से ख़ुशख़बरी देते हैं. अता का क़ौल है कि दुनिया की ख़ुशख़बरी तो वह है जो फ़रिश्ते मौत के समय सुनाते हैं और आख़िरत की ख़ुशख़बरी वह है जो मूमिन को जान निकलने के बाद सुनाई जाती है कि उससे अल्लाह राज़ी है.

(6) उसके वादे ख़िलाफ़ नहीं हो सकते जो उसने अपनी किताब में और अपने रसूलों की ज़बान से अपने वलियों और अपने फ़रमाँबरदार बन्दों से फ़रमाए.

(7) इसमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली फ़रमाई गई कि काफ़िर बदनसीब, जो आपको झुटलाते है और आपके ख़िलाफ़ बुरे बुरे मशवरे करते हैं, उसका कुछ ग़म न फ़रमाएं.

(8) वह जिसे चाहे इज़्ज़त दे और जिसे चाहे ज़लील करे. ऐ सैयदुल अम्बिया, वह आपका नासिर और मददगार है. उसने आपको और आपके सदक़े मे आपके फ़रमाँबरदारों को इज़्ज़त दी, जैसा कि दूसरी आयत में फ़रमाया कि अल्लाह के लिये इज़्ज़त है और उसके रसूल के लिये और ईमान वालों के लिये.

(9) सब उसके ममलूक अर्थात ग़ुलाम हैं. उसके तहत क़ुदरत और अधिकार, और जो ग़ुलाम है वह रब नहीं हो सकता. इसलिये अल्लाह के सिवा हर एक को पूजना ग़लत है. यह तौहीद की एक ऊमदा दलील है.

(10) यानी किस दलील का अनुकरण करते हैं. मुराद यह है कि उनके पास कोई दलील नहीं.

(11) और बेदलील केवल ग़लत गुमान से अपने बातिल और झूठे मअबूदों को ख़ुदा का शरीक ठहराते हैं, इसके बाद अल्लाह तआला अपनी क़ुदरत और नेअमत का इज़हार फ़रमाता है.

(12) और आराम करके दिन की थकन दूर करो.

(13) रौशन, ताकि तुम अपनी ज़रूरतों और रोज़ी रोटी के सामान पूरे कर सको.

(14) जो सुनें और समझें कि जिसने इन चीज़ों को पैदा किया, वही मअबूद है. उसका कोई शरीक नहीं. इसके बाद मुश्रिकों का एक कथन ज़िक्र फ़रमाता है.

(15) काफ़िरों का यह कलिमा अत्यन्त बुरा और इन्तिहा दर्जे की आज्ञानता का है. अल्लाह तआला इसका रद फ़रमाता है.

(16) यहाँ मुश्रिकों के इस कथन के तीन रद फ़रमाए, पहला रद तो कलिमए सुब्हानहू में है जिसमें बताया गया कि उसकी ज़ात बेटे या औलाद से पाक है कि वाहिदे हक़ीक़ी है, दूसरा रद हुवल ग़निय्यों फ़रमाने में है कि वह तमाम सृष्टि से बेनियाज़ है, तो औलाद उसके लिये कैसे हो सकती है. औलाद तो या कमज़ोर चाहते है जो उससे क़ुव्वत हासिल करें या फ़क़ीर चाहता है जो उससे मदद ले या ज़लील चाहता है जो उसके ज़रीये इज़्ज़त हासिल करे. ग़रज़ जो चाहता है वह हाजत रखता है. तो जो ग़नी हो या ग़ैर मोहताज़ हो उसके लिये औलाद किस तरह हो सकती है. इसके अलावा बेटा वालिद का एक हिस्सा होता है, तो वालिद होना, मिश्रित होना ज़रूरी, और मिश्रित होना संभव होने को, और हर संभव ग़ैर का मोहताज़ है, तो हादिस हुआ, लिहाज़ा मुहाल हुआ कि ग़नी क़दीम के बेटा हो, तीसरा रद लूह मा फ़िस्समावाते वमा फ़िल अर्दे मे है कि सारी सृष्टि उसकी ममलूक है और ममलूक होना बेटा होने के साथ नहीं जमा होता, लिहाज़ा उनमें से कोई उसकी औलाद नहीं हो सकती.

सूरए यूनुस -आठवाँ रूकू

सूरए यूनुस -आठवाँ रूकू

और उन्हें नूह की ख़बर पढ़कर सुनाओ बस उसने अपनी क़ौम से कहा ऐ मेंरी क़ौम अगर तुमपर शाक़ (भारी) गुज़रा है मेरा खड़ा होना (1)
और अल्लाह की निशानियाँ याद दिलाना (2)
तो मैं ने अल्लाह ही पर भरोसा किया (3)
तो मिलकर काम करो और अपने झूटे मअबूदों समेत अपना काम पक्का कर लो तुम्हारे काम में तुमपर कुछ गुंजलक न रहे फिर जो हो सके मेरा कर लो और मुझे मुहलत न दो (4){71}
फिर अगर तुम मुंह फेरो(5)
तो मैं तुम से कुछ उजरत नहीं मांगता (6)
मेरा अज्र (फल, बदला) तो नहीं मगर अल्लाह पर और (7)
और मुझे हुक्म है कि मैं मुसलमानों से हूँ {72} तो उन्होंने उसे(8)
झूटलाया तो हमने उसे और जो उसके साथ किश्ती में थे उसको निजात दी और उन्हें हमने नायब (प्रतिनिधि) किया (9)
और जिन्होंने हमारी आयतें झुटलाई उनको हमने डुबो दिया तो देखो डराए हुओ का अंजाम कैसा हुआ{73} फिर उसके बाद और रसूल (10)
हमने उनकी क़ौम की तरफ़ भेजे तो वो उनके पास रौशन दलीलें लाए तो वो ऐसे न थे कि ईमान लाते उसपर जिसे पहले झुटला चुके थे, हम यूंही मुहर लगा देते हैं सरकशों के दिलों पर {74} फिर उनके बाद हमने मूसा और हारून को फ़िरऔन और उसके दरबारियों की तरफ़ अपनी निशानियाँ लेकर भेजा तो उन्होंने घमण्ड किया और वो मुजरिम लोग थे{75} तो जब उनके पास हमारी तरफ़ से हक़ आया (11)
बोले यह तो ज़रूर खुला जादू है {76} मूसा ने कहा क्या हक़ की निस्बत ऐसा कहते हो जब वह तुम्हारे पास आया क्या यह जादू है  (12)
और जादूगर मुराद को नही पहुंचते (13){77}
बोले क्या तुम हमारे पास इसलिये आए हो कि हमें उससे (14)
फेर दो जिसपर हमने अपने बाप दादा को पाया और ज़मीन में तुम्हारी दोनों की बड़ाई रहे और हम तुमपर ईमान लाने के नहीं{78} और फ़िरऔन (15)
बोला हर जादूगर इल्म वाले को मेरे पास ले आओ {79} फिर जब जादूगर आए उनसे मूसा ने कहा डालो जो तुम्हें डालना है (16){80}
फिर जब उन्होंने डाला मूसा ने कहा यह जो तुम लाए यह जादू है (17)
अब अल्लाह इसे बातिल कर देगा, अल्लाह फ़साद वालों का काम नहीं बनाता {81} और अल्लाह अपनी बातों से (18)
हक़ को हक़ कर दिखाता है पड़े बुरा माने मुजरिम {82}

सूरए यूनुस -आठवाँ रूकू

(1) और लम्बी मुद्दत तक तुममें ठहरना.

(2) और इसपर तुमने मेरे क़त्ल करने और निकाल देने का इरादा किया है.

(3) और अपना मामला उस एक अल्लाह के सुपुर्द किया जिसका कोई शरीक नहीं.

(4) मुझे कुछ परवाह नहीं हैं. हज़रत नूह अलैहिस्सलाम का यह कलाम विनम्रता के तौर पर है. मतलब यह है कि मुझे अपने क़ुदरत वाले, क़ुव्वत वाले परवर्दिगार पर पूरा पूरा भरोसा है, तुम और तुम्हारे बे इख़्तियार मअबूद मुझे कुछ नुक़सान नहीं पहुंचा सकते.

(5) मेरी नसीहत से.

(6) जिसके फ़ौत होने का मुझे अफ़सोस है.

(7) वही मुझे बदला देगा. मतलब यह है कि मेरा उपदेश और नसीहत ख़ास अल्लाह के लिये है किसी दुनिया की ग़रज़ से नहीं.

(8) यानी हज़रत नूह अलैहिस्सलाम को.

(9) और हलाक होने वालों के बाद ज़मीन में ठहराया.

(10) हूद, सालेह, इब्राहीम, लूत, शुऐब वग़ैरहुम, अलैहिस्सलाम.

(11) हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के वास्ते से, और फ़िरऔनियों ने पहचान कर, कि ये सत्य है, अल्लाह की तरफ़ से है, तो नफ़्सानियत और हठधर्मी से.

(12) हरगिज़ नहीं.

(13) फ़िरऔनी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से.

(14) दीन व मिल्लत और बुत परस्ती व फ़िरऔन परस्ती.

(15) सरकश और घमण्डी ने चाहा कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के चमत्कार का मुक़ाबला बातिल से करे और दुनिया को इस भ्रम में डाले कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के चमत्कार जादू की क़िस्म से हैं इसलिये वह.

(16) रस्से शहतीर वग़ैरह और जो तुम्हें जादू करना है करो. यह आपने इसलिये फ़रमाया कि हक़ और बातिल, सच और झूठ ज़ाहिर हो जाए और जादू के कमाल, जो वो करने वाले हैं, उनका फ़साद साफ़ खुल कर सामने आ जाए.

(17) न कि वो आयतें और अल्लाह की निशानियाँ, जिनको फ़िरऔन ने अपनी बे ईमानी से जादू बताया.

(18) यानी अपने हुक्म, अपनी क्षमता और क़ुदरत और अपने इस वादे से कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को जादूगरों पर ग़ालिब करेगा.

सूरए यूनुस -नवाँ रूकू

सूरए यूनुस -नवाँ रूकू

तो मूसा पर ईमान न लाए मगर उसकी क़ौम की औलाद से कुछ लोग (1)
फ़िरऔन और उसके दरबारियों से डरते हुए कि कहीं उन्हें (2)
हटने पर मजबूर न कर दें और बेशक फ़िरऔन ज़मीन पर सर उठाने वाला था, और बेशक वह हद से गुज़र गया  (3){83}
और मूसा न कहा ऐ मेरी क़ौम अगर तुम अल्लाह पर ईमान लाए तो उसी पर भरोसा करो(4)
अगर तुम इस्लाम रखते हो{84} बोले हमने अल्लाह ही पर भरोसा किया, इलाही हमको ज़ालिम लोगों के लिये आज़माइश न बना(5){85}
और अपनी रहमत फ़रमाकर हमें काफ़िरों से निजात दे(6){86}
और हमने मूसा और उसके भाई को वही भेजी कि मिस्र में अपनी क़ौम के लिये मकानात बनाओ और अपने घरों को नमाज़ की जगह करो(7)
और नमाज़ क़ायम रखो और मुसलमानों को ख़ुशख़बरी सुनाओ (8){87}
और मूसा ने अर्ज़ की ऐ रब हमारे तूने फ़िरऔन और उसके सरदारों को आरायश(अलंकार) (9)
और माल दुनिया की ज़िन्दगी में दिये ऐ रब हमारे इसलिये कि तेरी राह से बहकावें, ऐ रब हमारे उनके माल बर्बाद कर दे(10)
और उनके दिल सख़्त करदे कि ईमान न लाएं जब तक दर्दनाक अज़ाब न देख लें (11){88}
फ़रमाया तुम दोनों की दुआ क़ुबूल हुई (12)
तुम साबित क़दम रहो नादानों की राह न चलो{89} और हम बनी इस्राईल को दरिया पार ले गए तो फ़िरऔन और उसके लश्करों ने उनका पीछा किया सरकशी और ज़ुल्म से यहां तक कि जब उसे डूबने ने आ लिया(15)
बोला में ईमान लाया कि कोई सच्चा मअबूद नहीं सिवा उसके जिसपर बनी इस्राईल ईमान लाए और मैं मुसलमान हूँ (16){90}
क्या अब (17)
और पहले से नाफ़रमान रहा और तू फ़सादी था (18){91}
आज हम तेरी लाश को उतरा देंगे(बाक़ी रखेंगे) कि तू अपने पिछलों के लिये निशानी हो (19)
और बेशक लोग हमारी आयतों से ग़ाफ़िल हैं{92}

तफ़सीर
सूरए यूनुस -नवाँ रूकू

(1) इसमें नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली है कि आप अपनी उम्मत के ईमान लाने का बहुत एहतिमाम फ़रमाते थे, और उनके मुंह फेर लेने से दुखी हो जाते थे, आपकी तसल्ली फ़रमाई गई कि हालांकि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने इतना बड़ा चमत्कार दिखाया, फिर भी थोड़े लोगो ने ईमान क़ुबूल किया. ऐसी हालतें नबियों को पेश आती रही हैं. आप अपनी उम्मत के मुंह फेर लेने से रंजीदा न हों. मिन क़ौमिही में जो ज़मीर है, वह या तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की तरफ़ पलटता है, उस सूरत में क़ौम की सन्तान से बनी इस्राईल मुराद होंगे जिनकी औलाद मिस्र में आपके साथ थी. एक क़ौल यह है कि इससे वो लोग मुराद हैं जो फ़िरऔन के क़त्ल से बच रहे थे क्योंकि जब बनी इस्राईल के लड़के फ़िरऔन के हुक्म पर क़त्ल किये जाते थे तो बनी इस्राइल की कुछ औरतें जो फ़िरऔन की औरतों से कुछ मेल जोल रखती थीं, वो जब बच्चा जनती थीं तो उसकी जान के डर से वह बच्चा फ़िरऔनी क़ौम की औरतों को दे डालतीं. ऐसे बच्चे जो फ़िरऔनियों के घरों में पले थे, उस रोज़ हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर ईमान ले आए जिस दिन अल्लाह तआला ने आपको जादूगरों पर विजय अता की थी. एक क़ौल यह है कि यह ज़मीर फ़िरऔन की तरफ़ पलटती है, और फ़िरऔनी क़ौम की सन्तान मुराद है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि वह फिरऔनी क़ौम के थोड़े लोग थे जो ईमान लाए.

(2) दीन से.

(3) कि बन्दा होकर ख़ुदाई का दावेदार हुआ.

(4) वह अपने फ़रमाँबरदारों की मदद और दुश्मनों को हलाक फ़रमाता है. इस आयत से साबित हुआ कि अल्लाह पर भरोसा करना ईमान के कमाल का तक़ाज़ा है.

(5) यानी उन्हें हमपर ग़ालिब न कर, ताकि वो ये गुमान न करें कि वो हक़ पर हैं.

(6) और उनके ज़ुल्म और सितम से बचा.

(7) कि क़िबले की तरफ़ मुँह करो. हज़रत मूसा और हज़रत हारून अलैहिस्सलाम का क़िबला काबा शरीफ़ था और शुरू में बनी इस्राईल को यही हुक्म था कि वो घरों में छुप कर नमाज़ पढ़ें ताकि फ़िरऔनियों की शरारत और तक़लीफ़ से सुरक्षित रहे.

(8) अल्लाह की मदद की और जन्नत की.

(9) उमदा लिबास, नफ़ीस फ़र्श, कीमती ज़ेवर, तरह तरह के सामान.

(10) कि वो तेरी नेअमतों पर शुक्र के बजाय दिलेर और जरी होकर गुनाह करते हैं. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की यह दुआ क़ुबूल हुई और फ़िरऔनियों के दिरहम व दीनार वग़ैरह पत्थर होकर रह गए. यहाँ तक कि फल और खाने की चीज़ें भी और ये उन निशानियों में से एक है जो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को दी गई थीं.

(11) जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम उन लोगों के ईमान लाने से निराश हो गए तब आपने उनके लिये यह दुआ की. और ऐसा ही हुआ कि वो डूबने के वक़्त तक ईमान न लाए. इससे मालूम हुआ कि किसी शख़्स के लिये कुफ़्र पर मरने की दुआ करना कुफ़्र नहीं है.(मदारिक)

(12) दुआ की निस्बत हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम व हज़रत हारून अलैहिस्सलाम दोनों की तरफ़ की गई हालांकि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम दुआ करते थे और हज़रत हारून अलैहिस्सलाम आमीन कहते थे. इससे मालूम हुआ कि आमीन कहने वाला भी दुआ करने वालों में गिना जाता है. यह भी साबित हुआ कि क़ुबूल होने के बीच चालीस बरस का फ़ासला हुआ.

(13) दावत और तबलीग़ पर.

(14) जो दुआ के क़ुबूल होने में देर होने की हिकमत नहीं जानते.

(15) तब फ़िरऔन.

(16) फ़िरऔन ने क़ुबूल होने की तमन्ना के साथ ईमान का मज़मून तीन बार दोहरा कर अदा किया लेकिन यह ईमान क़ुबूल न हुआ क्योंकि फ़रिश्तों और अज़ाब के देखने के बाद ईमान मक़बूल नहीं. अगर इख़्तियार की हालत में वह एक बार भी यह कलिमा कहता तो उसका ईमान क़ुबूल कर लिया जाता. लेकिन उसने वक़्त खो दिया. इसलिये उससे यह कहा गया जो आयत में आगे बयान किया गया है.

(17) बेचैनी की हालत में, जबकि ग़र्क़ में जकड़ा गया है और ज़िन्दगी की उम्मीद बाक़ी नहीं रही, उस वक़्त ईमान लाता है.

(18) ख़ुद गुमराह था, दूसरों को गुमराह करता था. रिवायत है कि एक बार हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम फ़िरऔन के पास एक सवाल लाए जिसका मज़मून यह था कि बादशाह का क्या हुक्म है ऐसे ग़ुलाम के बारे में जिसने एक शख़्स के माल व नेअमत में परवरिश पाई फिर उसकी नाशुक्री की और उसके हक़ का इन्कारी हो गया और अपने आप मौला होने का दावेदार बन गया. इसपर फ़िरऔन ने यह जवाब लिखा कि जो ग़ुलाम अपने आक़ा की नेअमतों का इन्कार करे और उसके मुक़ाबले में आए उसकी सज़ा यह है कि उसको दरिया में डुबो दिया जाए. जब फ़िरऔन डूबने लगा तो हज़रत जिब्रील ने वही फ़तवा उसके सामने कर दिया और उसने उसको पहचान लिया.

(19) तफ़सीर के उलमा कहते हैं कि जब अल्लाह तआला ने फ़िरऔन और उसकी क़ौम को डुबाया और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम को उनकी हलाकत की ख़बर दी तो कुछ बनी इस्राईल को शुबह रहा और फ़िरऔन की महानता और हैबत जो उनके दिलों में थी उसके कारण उन्हें उसकी हलाकत का यक़ीन न आया. अल्लाह के हुक्म से दरिया ने फ़िरऔन की लाश किनारे पर फैंक दी. बनी इस्राईल ने उसको देखकर पहचाना.

सूरए यूनुस -दसवाँ रूकू

सूरए यूनुस -दसवाँ रूकू

और बेशक हमने बनी इस्राईल को इज़्ज़त की जगह दी(1)
और उन्हें सुथरी रोज़ी अता की तो इख़्तिलाफ़ में न पड़े(2)
मगर इल्म आने के बाद (3)
बेशक तुम्हारा रब क़यामत के दिन उनमें फैसला कर देगा जिस बात में झगड़ते थे(4){93}
और ऐ सुनने वाले अगर तुझे कुछ शुबह हो उसमें जो हमने तेरी तरफ़ उतारा(5)
तो उनसे पूछ देख जो तुम से पहले किताब पढ़ने वाले हैं(6)
बेशक तेरे पास तेरे रब की तरफ़ से हक़ आया(7)
तो तू हरगिज़ शक वालों में न हो{94} और हरगिज़ उनमें न होना जिन्होंने अल्लाह की आयतें झुटलाईं कि तू ख़सारे (घाटे) वालों में हो जाएगा {95} बेशक वो जिनपर तेरे रब की बात ठीक पड़ चुकी है(8)
ईमान न लाएंगे {96} अगरचे सब निशानियाँ उनके पास आईं जब तक दर्दनाक अज़ाब न देख लें(9){97}
तो हुई होती न कोई बस्ती (10)
कि ईमान लाती (11)
तो उसका ईमान काम आता हाँ यूनुस की क़ौम जब ईमान लाए हमने उनसे रूसवाई का अज़ाब दुनिया की ज़िन्दगी में हटा दिया और एक वक़्त तक उन्हें बरतने दिया(12){98}
और अगर तुम्हारा रब चाहता ज़मीन में जितने हैं सबके सब ईमान ले आते(13)
तो क्या तुम लोगों को ज़बरदस्ती करोगे यहाँ तक कि मुसलमान हो जाएं(14){99}
और किसी जान की क़ुदरत नहीं कि ईमान ले आए मगर अल्लाह के हुक्म से(15)
और अज़ाब उनपर डालता है जिन्हें अक़्ल नहीं{100} तुम फ़रमाओ देखो(16)
आसमानों और ज़मीन में क्या है(17)
और आयतें और रसूल उन्हें कुछ नहीं देते जिनके नसीब में ईमान नहीं {101} तो उन्हें काहे का इन्तिज़ार है मगर उन्हीं लोगों के से दिनों का जो उनसे पहले हो गुज़रे(18)
तुम फ़रमाओ तो इन्तिज़ार करो मैं भी तुम्हारे साथ इन्तिज़ार में हूँ (19){102}
फिर हम अपने रसूलों और ईमान वालों को निजात देंगे, बात यही है हमारे करम के ज़िम्मे पर हक़ है मुसलमानों को निजात देना{103}

तफ़सीर
सूरए यूनुस -दसवाँ रूकू

(1) इज़्ज़त की जगह से या तो मिस्र देश और फ़िरऔनियों की सम्पत्तियाँ मुराद है या शाम प्रदेश और क़ुदस व उर्दुन जो अत्यन्त हरे भरे और उपजाऊ इलाक़े हैं.

(2) बनी इस्राईल, जिनके साथ ये घटनाएं हो चुकीं.

(3) इल्म से मुराद यहाँ या तो तौरात है जिसके मानी में यहूदी आपस में मतभेद रखते थे, या सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तशरीफ़ आवरी है कि इससे पहले तो यहूदी आपके मानने वाले और आपकी नबुव्वत पर सहमत थे और तौरात में जो आपकी विशेषताएं दर्ज थीं उनको मानते थे. लेकिन तशरीफ़ लाने के बाद विरोध करने लगे, कुछ ईमान लाए और कुछ लोगों ने हसद और दुश्मनी से कुफ़्र किया. एक क़ौल यह है कि इल्म से क़ुरआन मुराद है.

(4) इस तरह कि ऐ नबियों के सरदार, आप पर ईमान लाने वालों को जन्नत में दाख़िल फ़रमाएगा और आपका इन्कार करने वालों को जहन्नम में अज़ाब देगा.

(5) अपने रसूल मुहम्मदे मुस्तफ़ा सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के वास्ते से.

(6) यानी किताब वालों के उलमा जैसे हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम और उनके साथी, ताकि वो तुझको सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत का इत्मीनान दिलाएं और आपकी नात और तारीफ़, जो तौरात में लिखी है, वह सुनाकर शक दूर करें. शक इन्सान के नज़दीक किसी बात में दोनों तरफ़ों का बराबर होना है, चाहे वह इस तरह हो कि दोनों तरफ़ बराबर क़रीने पाएं जाएं. चाहे इस तरह कि किसी तरफ़ भी कोई क़रीना न हो तहक़ीक़ करने वालों के नज़दीक शक जिहालत की क़िस्मों से है और जिहालत और शक में आम व ख़ास मुतलक़ की निस्बत है कि हर एक शक जिहालत है और जिहालत शक नहीं.

(7) जो साफ़ प्रमाणों और रौशन निशानियों से इतना रौशन है कि उसमें शक की मजाल नहीं.

(8) यानी वह क़ौल उनपर साबित हो चुका जो लौहे मेहफ़ूज़ में लिख दिया गया है और जिसकी फ़रिश्तों ने ख़बर दी है कि ये लोग काफ़िर मरेंगे, वो.

(9) और उस वक़्त का ईमान लाभदायक नहीं.

(10) उन बस्तियों में से जिनको हमने हलाक़ किया.

(11) क़ौमे यूनुस का हाल यह है कि नैनवा प्रदेश मूसल में ये लोग रहते थे और क़ुफ़्र व शिर्क में जकड़े हुए थे. अल्लाह तआला ने हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम को उनकी तरफ़ भेजा. आपने उनको बुत परस्ती छोड़ने और ईमान लाने का हुक्म दिया. उन लोगों ने इन्कार किया. हज़रत युनूस अलैहिस्सलाम को झुटलाया. आपने उन्हें अल्लाह के हुक्म से अज़ाब उतरने की ख़बर दी. उन लोगों ने आपस में कहा कि हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम ने कभी कोई बात ग़लत नहीं कही है देखो अगर वह रात को यहाँ रहे जब तो कोई अन्देशा नहीं और अगर उन्होंने रात यहाँ न गुज़ारी तो समझ लेना चाहिये कि अज़ाब आएगा. रात में हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम वहाँ से तशरीफ़ ले गए. सुबह को अज़ाब के चिन्ह ज़ाहिर हो गए. आसमान पर काला डरावना बादल आया और बहुत सा धुंआ जमा हुआ. सारे शहर पर छा गया. यह देखकर उन्हें यक़ीन हो गया कि अज़ाब आने वाला है. उन्होंने हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम की तलाश की और आपको न पाया. अब उन्हें और ज़्यादा डर हुआ तो वो अपने बच्चों औरतों और जानवरों के साथ जंगल को निकल गए. मोटे कपड़े पहने और तौबह व इस्लाम का इज़हार किया. शौहर से बीबी और माँ से बच्चे अलग हो गए और सब ने अल्लाह की बारगाह में रोना और गिड़गिड़ाना शुरू किया और कहा, जो यूनुस अलैहिस्सलाम लाए, हम उस पर ईमान लाए और सच्ची तौबह की. जो अत्याचार उनसे हुए थे उनको दूर किया. पराए माल वापस किये, यहाँ तक कि अगर एक पत्थर दूसरे का किसी की बुनियाद में लग गया था तो बुनियाद उखाड़ कर पत्थर निकाल दिया और वापस कर दिया. और अल्लाह तआला से सच्चे दिल से मग़फ़िरत की दुआएं की. अल्लाह तआला ने उनपर रहम किया. दुआ क़ुबूल फ़रमाई, अज़ाब उठा दिया गया. यहाँ यह सवाल पैदा होता है कि जब अज़ाब उतरने के बाद फ़िरऔन का ईमान और उसकी तौबह क़ुबूल न हुई, क़ौमे यूनुस की तौबह क़ुबूल फ़रमाने और अज़ाब उठा देने में क्या हिकमत है. उलमा ने इसके कई जवाब दिये हैं. एक तो यह कि यह ख़ास करम था, हज़रत यूनुस की क़ौम के साथ. दूसरा जवाब अज़ाब यह है कि फ़िरऔन अज़ाब में जकड़े जाने के बाद ईमान लाया, जब ज़िन्दगी की उम्मीद ही बाक़ी न रही और क़ौमे यूनुस से जब अज़ाब क़रीब हुआ तो वो उसमें मुबतिला होने से पहले ईमान ले आए और अल्लाह दिलों का हाल जानने वाला है. सच्चे दिल वालों की सच्चाई और आचार का उसको इल्म है.

(13) यानी ईमान लाना पहले से लिखी ख़ुशनसीबी पर निर्भर है. ईमान वही लाएंगे जिनको अल्लाह तआला इसकी तौफ़ीक़ अता फ़रमाएगा. इसमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो वसल्लम की तसल्ली है कि आप चाहते है कि सब ईमान ले आएं और सीधी राह इख़्तियार करें. फिर जो ईमान से मेहरूम रह जाते हैं उनका आपको ग़म होता है. इसका आपको ग़म न होना चाहिये, क्योंकि जो पहले से बुरे दिल वाला लिखा हुआ है, वह ईमान न लाएगा.

(14) और ईमान में ज़बरदस्ती नहीं हो सकती क्योंकि ईमान होता है तस्दीक़ और इक़रार से, और ज़बरदस्ती या दबावसे दिल की तस्दीक़ हासिल नहीं होती.

(15) उसकी मर्जी़ से.

(16) दिल की आँखो से और ग़ौर करो कि.

(17) जो अल्लाह तआला के एक होने का प्रमाण देता है.

(18) नूह, आद व समूद वग़ैरह की तरह.

(19) कि तुम्हारी हलाकत और अज़ाब के. रबीअ बिन अनस ने कहा कि अज़ाब का डर दिलाने के बाद अगली आयत में यह बयान फ़रमाया कि जब अज़ाब होता है तो अल्लाह तआला रसूल को और उनके साथ ईमान लाने वालों को निजात अता फ़रमाता है.

सूरए यूनुस- ग्यारहवाँ रूकू

सूरए यूनुस- ग्यारहवाँ रूकू

तुम फ़रमाओ ऐ लोगो अगर तुम मेरे दीन की तरफ़ से किसी शुबह में हो तो मैं तो उसे न पूजूंगा जिसे तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो (1)
हाँ उस अल्लाह को पूजता हूँ जो तुम्हारी जान निकालेगा(2)
और मुझे हुक्म है कि ईमान वालों में हूँ{104} और यह कि अपना मुंह दीन के लिये सीधा रख सबसे अलग होकर (3)
और हरगिज़ शिर्क वालों में न होना {105} और अल्लाह के सिवा उसकी बन्दगी न कर जो न तेरा भला कर सके न बुरा, फिर अगर ऐसा करे तो उस वक़्त तू ज़ालिमों में होगा{106} और अगर तुझे अल्लाह कोई तकलीफ़ पहुंचाए तो उसका कोई टालने वाला नहीं उसके सिवा, और अगर तेरा भला चाहे तो उसके फ़ज़्ल (कृपा) का रद करने वाला कोई नहीं (4)
उसे पहुंचता है अपने बन्दों में जिसे चाहे, और वही बख़्शने वाला मेहरबान है {107} तुम फ़रमाओ ऐ लोगो तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से हक़ आया (5)
तो जो राह पर आया वह अपने भले को राह पर आया(6)
और जो बहका वह अपने बुरे को बहका,(7)
और कुछ में करोड़ा नहीं(8){108}
और उस पर चलो जो तुमपर वही होती है और सब्र करो (9)
यहाँ तक कि अल्लाह हुक्म फ़रमाए (10)
और वह सबसे बेहतर हुक्म फ़रमाने वाला है (11){109}

तफ़सीर सूरए यूनुस- ग्यारहवाँ रूकू

(1) क्योंकि वह मख़लूक़ है, इबादत के लायक़ नहीं.

(2) क्योंकि वह क़ादिर, मुख़्तार, सच्चा मअबूद, इबादत के लायक़ है.

(3) यानी सच्चे दिल से मूमिन रहो.

(4) वही नफ़ा नुक़सान का मालिक है. सारी सृष्टि उसी की मोहताज़ है. वही हर चीज़ पर क़ादिर और मेहरबानी व रहमत वाला है. बन्दों को उसकी तरफ़ रग़बत और उसका ख़ौफ़ और उसी पर भरोसा और उसी पर विश्वास चाहिये और नफ़ा नुक़सान जो कुछ भी है वही.

(5)हक़ से यहाँ क़ुरआन मुराद है या इस्लाम या सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

(6) क्योंकि इसका लाभ उसी को पहुंचेगा.

(7) क्योंकि उसका वबाल उसी पर है.

(8) कि तुमपर ज़बरदस्ती करूं.

(9)काफ़िरों के झुटलाने और उनके तकलीफ़ पहुंचाने पर.

(10) मुश्रिकों से जंग करने और किताबियों से जिज़िया लेने का.

(11) कि उसके हुक्म में ग़लती और ख़ता की गुंजायश नहीं और वह बन्दों के खुले छुपे हालात सबका जानने वाला है. उसका फ़ैसला दलील और गवाह का मोहताज नहीं.

Surah Yunus in hindi translation

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Surah Yunus in hindi translation सूरए यूनुस मक्का में उतरी इसमें 109 आयतें और ग्यारह रूकू हैं. अल्लाके नाम से शूरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1) ये हिकमत (बोध) वाली किताब

सूरए यूनुस – पहला रूकू

की आयतें हैं {1} क्या लोगों को इसका अचम्भा हुआ कि हमने उनमें से एक मर्द को वही (देववाणी) भेजी कि लोगों को डर सुनाओ(2)
और ईमान वालों को ख़ुशख़बरी दो कि उनके लिये उनके रब के पास सच का मक़ाम है, काफ़िर बोले बेशक यह तो खुला जादूगर है(3){2}
बेशक तुम्हारा रब अल्लाह है जिसने आसमन और ज़मीन छ दिन में बनाए फिर अर्श पर इस्तवा फ़रमाया जैसा उसकी शान के लायक़ है काम की तदबीर फ़रमाता है(4)
कोई सिफ़ारिशी नहीं मगर उसकी इजाज़त के बाद(5)
यह है अल्लाह तुम्हारा रब (6)
तो उसकी बन्दगी करो, तो क्या तुम ध्यान नहीं करते{3} उसी की तरफ़ तुम सबको फिरना है(7)
अल्लाह का सच्चा वादा, बेशक वह पहली बार बनाता है फिर फ़ना के बाद दोबारा बनाएगा कि उनको जो ईमान लाए और अच्छे काम किये इन्साफ़ का सिला (इनाम) दे(8)
और काफ़िरों के लिये पीने को खौलता पानी और दर्दनाक अज़ाब बदला उनके कुफ़्र का {4} वही है जिसने सूरज को जगमगाता बनाया और चांद चमकता और उसके लिये मंज़िलें ठहराईं(9)
कि तुम बरसों की गिनती और (10)
हिसाब जानो अल्लाह ने उसे न बनाया मगर हक़(11)
निशानियां तफ़सील से बयान फ़रमाता है इल्म वालों के लिये (12){5}
बेशक रात और दिन का बदलता आना और जो कुछ अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन में पैदा किया उनमें निशानियां हैं डर वालों के लिये{6} बेशक वो जो हमारे मिलने की उम्मीद नहीं रखते(13)
और दुनिया की ज़िन्दगी पसन्द कर बैठे और इसपर मुतमईन (संतुष्ट) हो गए (14)
और वो जो हमारी आयतों से ग़फ़लत करते हैं(15){7}
उन लोगों का ठिकाना दोज़ख़ है बदला उनकी कमाई का {8} बेशक जो ईमान लाए और अच्छे काम किये उनका रब उनके ईमान के कारण उन्हें राह देगा(16)
उनके नीचे नेहरें बहती होंगी नेअमत के बाग़ों में {9} उनकी दुआ उसमें यह होगी कि अल्लाह तुझे पाकी है (17)
और उनके मिलते वक़्त ख़ुशी का पहला बोल सलाम है (18)
और उनकी दुआ का ख़ातिमा यह है कि सब ख़ूबियों सराहा अल्लाह जो रब है सारे जगत का(19){10}

सूरए यूनुस – पहला रूकू तफ़सीर

(1) सूरए यूनुस मक्की है, सिवाए तीन आयतों के ” फ़इन कुन्ता फ़ी शक्किन ” से. इसमें ग्यारह रूकू, सौ नौ आयतें, एक हज़ार आठ सौ बत्तीस कलिमे और नौ हज़ार निनावे अक्षर हैं.

(2) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया, जब अल्लाह तआला ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को रिसालत अता फ़रमाई और आपने उसका इज़हार किया तो अरब इन्कारी हो गए और उनमें से कुछ ने कहा कि अल्लाह इससे बरतर है कि किसी आदमी को रसूल बनाए. इसपर ये आयतें उतरीं.

(3) काफ़िरों ने पहले तो आदमी का रसूल होना आश्चर्य की बात और न मानने वाली चीज़ क़रार दिया, फिर जब हुज़ूर के चमत्कार देखे और यक़ीन हुआ कि ये आदमी की शक्ति और क्षमता से ऊपर हैं, तो आपको जादूगर बताया. उनका यह दावा तो झूट और ग़लत है, मगर इसमें भी अपनी तुच्छता और हुज़ूर की महानता का ऐतिराफ़ पाया जाता है.

(4) यानी तमाम सृष्टि के कामों का अपनी हिक़मत और मर्ज़ी के अनुसार प्रबन्ध फ़रमाता है.

(5) इसमें बुत परस्तों के इस क़ौल का रद है कि बुत उनकी शफ़ाअत करेंगे. उन्हें बताया गया कि शफ़ाअत उनके सिवा कोई न कर सकेगा जिन्हें अल्लाह इसकी इजाज़त देगा. और शफ़ाअत की इजाज़त पाने वाले ये अल्लाह के मक़बूल बन्दे होंगे.

(6) जो आसमान और ज़मीन का विधाता और सारे कामों का प्रबन्धक है. उसके सिवा कोई मअबूद नहीं, फ़क़त वही पूजे जाने के लायक़ है.

(7) क़यामत के दिन, और यही है.

(8) इस आयत में हश्र नश्र और मआद का बयान और इससे इन्कार करने वालों का रद है. और इसपर निहायत ख़ूबसूरत अन्दाज़ में दलील क़ायम फ़रमाई गई है, कि वह पहली बार बनाता है और विभिन्न अंगों को पैदा करता है और उन्हें जोड़ता है. तो मौत के साथ अलग हो जाने के बाद उनको दोबारा जोड़ना और बने हुए इन्सान को नष्ट  हो जाने के बाद दोबारा बना देना और वही जान जो उस शरीर से जुड़ी थी, उसको इस बदन की दुरूस्ती के बाद फिर उसी शरीर से जोड़  देना, उसकी क़ुदरत और क्षमता से क्या दूर है. और इस दोबारा पैदा करने का उद्देश्य कर्मों का बदल देना यानी फ़रमाँबरदार को इनाम और गुनाहगार को अज़ाब देना है.

(9) अठ्ठाईस मंजिलें जो बारह बुर्जों में बंटी है. हर बुर्ज के लिये ढाई मंज़िलें हैं. चांद हर रात एक मंन्ज़िल में रहता है. और महीना तीस दिन का हो तो दो रात, वरना एक रात छुपता है.

(10) महीनों, दिनों घड़ियों का.

(11) कि उससे उसकी क़ुदरत और उसके एक होने के प्रमाण ज़ाहिर हों.

(12) कि उनमें ग़ौर करके नफ़ा उठाएं.

(13) क़यामत के दिन और सवाब व अज़ाब को नहीं मानते.

(14) और इस नश्वर को हमेशा पर प्राथमकिता दी, और उम्र उसकी तलब में गुज़ारी.

(15) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि यहाँ आयतों से सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ज़ाते पाक और क़ुरआन शरीफ़ मुराद है. और ग़फ़लत करने से मुराद उनसे मुंह फेरना है.

(16) जन्नतों की तरफ़. क़तादा का क़ौल है कि मूमिन जब अपनी क़ब्र से निकलेगा  तो उसका अमल ख़ूबसूरत शक्ल में उसके सामने आएगा. यह शख़्स कहेगा, तू कौन है? वह कहेगा, मैं तेरा अमल हूँ. और उसके लिये नूर होगा और जन्नत तक पहुंचाएगा. काफ़िर का मामला विपरीत होगा. उसका अमल बुरी शक्ल में नमूदार होकर उसे जहन्नम में पहुंचाएगा.

(17) यानी जन्नत वाले अल्लाह तआला की तस्बीह, स्तुति, प्रशंसा में मश्ग़ूल रहेंगे और उसके ज़िक्र से उन्हें फ़रहत यानी ठण्डक और आनन्द और काफ़ी लज़्ज़त हासिल होगी.

(18) यानी जन्नत वाले आपस में एक दूसरे का सत्कार सलाम से करेंगे या फ़रिश्ते उन्हें इज़्ज़त के तौर पर सलाम अर्ज़ करेंगे या फ़रिश्तें रब तआला की तरफ़ से उनके पास सलाम लाएंगे.

(19) उनके कलाम शुरूआत अल्लाह की बड़ाई और प्रशंसा से होगी और कलाम का अन्त अल्लाह की महानता और उसके गुणगान पर होगा.

सूरए यूनुस – दूसरा रूकू

सूरए यूनुस – दूसरा रूकू

और अगर अल्लाह लोगों पर बुराई ऐसी जल्द भेजता जैसी वह भलाई की जल्दी करते हैं तो उनका वादा पूरा हो चुका होता(1)
तो हम छोड़ते उन्हें जो हमसे मिलने की उम्मीद नहीं रखते कि अपनी सरकशी (विद्रोह) में भटका करें(2){11}
और जब आदमी को(3)
तकलीफ़ पहुंचती है हमें पुकारता है लेटे और बैठे और खड़े (4)
फिर जब हम उसकी तकलीफ़ दूर कर देते हैं चल देता है(5)
गोया कभी किसी तकलीफ़ के पहुंचने पर हमें पुकारा ही न था, यूंही भले कर दिखाए है हद से बढ़ने वाले को(6)
उनके काम(7){12}
और बेशक हमने तुमसे पहली संगतें(8)
हलाक फ़रमादीं जब वो हद से बढ़े(9)
और उनके रसूल उनके पास रौशन दलीलें लेकर आए(10)
और वो ऐसे थे ही नहीं कि ईमान लाते, हम यूंही बदला देते हैं मुजरिमों को {13} फिर हमने उनके बाद तुम्हें ज़मीन में जानशीन किया कि देखें तुम कैसे काम करते हो(11){14}
और जब उनपर हमारी रौशन आयतें (12)
पढ़ी जाती हैं तो वो कहने लगते हैं जिन्हें हमसे मिलने की उम्मीद नहीं(13)
कि इसके सिवा और क़ुरआन ले आइये(14)
या इसी को बदल दीजिये (15)
तुम फ़रमाओ मुझे नहीं पहुंचता कि मैं इसे अपनी तरफ़ से बदल दूं, मैं तो उसी का ताबे (अधीन) हूँ जो मेरी तरफ़ वही (देववाणी) होती है (16)
मैं अपने रब की नाफ़रमानी करूं(17)
तो मुझे बड़े दिन के अज़ाब का डर है(18){15}
तुम फ़रमाओ अगर अल्लाह चाहता तो मैं इसे तुमपर न पढ़ता न वह तुमको उससे ख़बरदार करता(19)
तो मैं इससे पहले तुम में अपनी एक उम्र गुज़ार चुका हुँ (20)
तो क्या तुम्हें अक़ल नहीं (21){16}
तो उससे बढ़कर ज़ालिम कौन जो अल्लाह पर झूट बांधे(22)
या उसकी आयतें झुटलाए, बेशक मुजरिमों का भला न होगा {17}और अल्लाह के सिवा ऐसी चीज़ (23)
को पूजते हैं जो उनका कुछ भला न करे और कहते हैं कि यह अल्लाह के यहाँ हमारे सिफ़ारिशी हैं(24)
तुम फ़रमाओ क्या अल्लाह को वह बात बताते हो जो उसके इल्म में न आसमानों में है न ज़मीन में(25)
उसे पाकी और बरतरी है उनके शिर्क से {18} और लोग एक ही उम्मत थे (26)
फिर मुख़्तलिफ़ हुए और अगर तेरे रब की तरफ़ से एक बात पहले न हो चुकी होती (27)
तो यहीं उनके इख़्तिलाफ़ों का उनपर फ़ैसला हो गया होता(28){19}
और कहते हैं उनपर उनके रब की तरफ़ से कोई निशानी क्यों नहीं उतरी(29)
तुम फ़रमाओ ग़ैब तो अल्लाह के लिये है अब रास्ता देखों, मैं भी तुम्हारे साथ राह देख रहा हूँ{20}

सूरए यूनुस – दूसरा रूकू   तफ़सीर
 

(1) यानी अगर अल्लाह तआला लोगों की बद . दुआएं, जैसे कि वो ग़ज़ब के वक़्त अपने लिये अपने बाल बच्चों और माल के लिये करते हैं, और कहते हैं हम हलाक हो जाएं, ख़ुदा हमें ग़ारत करे, बर्बाद करें और ऐसे ही कलिमें अपनी औलाद और रिश्तेदारों के लिये कह गुज़रते हैं, जिसे हिन्दी में कोसना कहते हैं, अगर वह दुआ ऐसी जल्दी क़ुबूल करली जाती जैसी जल्दी वो अच्छाई की दुआओ के क़ुबूल होने में चाहते हैं, तो उन लोगों का अन्त हो चुका होता और वो कब के हलाक हो गए होते, लेकिन अल्लाह तआला अपने करम से भलाई की दुआ क़ुबूल फ़रमाने में जल्दी करता है, बद-दुआ के क़ुबूल में नहीं, नज़र बिन हारिस ने कहा था या रब, यह दीने इस्लाम अगर तेरे नज़दीक सच्चा है तो हमारे ऊपर आसमान से पत्थर बरसा. इसपर यह आयत उतरी और बताया गया कि अगर अल्लाह तआला काफ़िरों के अज़ाब में जल्दी फ़रमाता, जैसा कि उनके लिये माल और औलाद वग़ैरह दुनिया की भलाई देने में जल्दी फ़रमाई, तो वो सब हलाक हो चुके होते.

(2) और हम उन्हें मोहलत देते हैं और उनके अज़ाब में जल्दी नहीं करते.

(3) यहाँ आदमी से काफ़िर मुराद हैं.

(4) हर हाल में, और जब तक उसकी तकलीफ़ दूर न हो, दुआ में मश़्गूल रहता है.

(5) अपने पहले तरीक़े पर, और वही कुफ़्र की राह अपनाता है और तकलीफ़ के वक़्त को भूल जाता है.

(6) यानी काफ़िरों को.

(7) मक़सद यह है कि इन्सान बला के वक़्त बहुत ही बेसब्रा है और राहत के वक़्त बहुत नाशुक्रा. जब तकलीफ़ पहुंचती है तो ख़ड़े लेटे बैठे हर हाल में दुआ करता है. जब अल्लाह तकलीफ़ दूर कर देता है तो शुक्र नहीं अदा करता और अपनी पहली हालत की तरफ़ लौट जाता है. यह हाल ग़ाफ़िल का है. अक़्ल वाले मूमिन का हाल इसके विपरीत है. वह मुसीबत और बला पर सब्र करता है, राहत और आसायश में शुक्र करता है. तकलीफ़ और राहत की सारी हालतों में अल्लाह के समक्ष गिड़गिड़ाता और दुआ करता है. एक मक़ाम इससे भी ऊंचा है, जो ईमान वालों में भी ख़ास बन्दों को हासिल है कि जब कोई मुसीबत और बला आती है, उस पर सब्र करते हैं. अल्लाह की मर्ज़ी पर दिल से राज़ी रहते हैं और हर हाल में शुक्र करते हैं.

(8) यानी उम्मतें हैं.

(9) और कुफ़्र में जकड़े गए.

(10) जो उनकी सच्चाई की बहुत साफ़ दलीलें थीं, उन्होंने न माना और नबियों की तसदीक़ न की.

(11) ताकि तुम्हारे साथ तुम्हारे कर्मों के हिसाब से मामला फ़रमाएं.

(12) जिनमें हमारी तौहीद और बुत परस्ती की बुराई और बुत परस्तों की सज़ा का बयान है.

(13)और आख़िरत पर ईमान नहीं रखते.

(14) जिसमें बुतों की बुराई न हो.

(15) काफ़िरों की एक जमाअत ने नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर कहा कि अगर आप चाहते हैं कि हम आप पर ईमान ले आएं तो आप इस क़ुरआन के सिवा दूसरा क़ुरआन लाइये जिसमें लात, उज़्ज़ा और मनात वग़ैरह देवी देवताओ की बुराई और उनकी पूजा छोड़ने का हुक्म न हो और अगर अल्लाह ऐसा क़ुरआन न उतारे तो आप अपनी तरफ़ से बना लीजिये या उसी क़ुरआन को बदल कर हमारी मर्ज़ी के मुताबिक़ कर दीजिये तो हम आप पर ईमान ले आएंगे, उनका यह कलाम या तो मज़ाक उड़ाने के तौर पर था या उन्होंने तजुर्बें और इम्तिहान के लिये ऐसा कहा था कि अगर यह दूसरा क़ुरआन बना लाएं या इसको बदल दें तो साबित हो जाएगा कि क़ुरआन अल्लाह की तरफ़ से नहीं है. अल्लाह तआला ने अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को हुक्म दिया कि इसका यह जवाब दें जो आयत में बयान होता है.

(16) मैं इसमें कोई परिवर्तन, फेर बदल, कमी बेशी नहीं कर सकता. ये मेरा कलाम नहीं, अल्लाह का कलाम है.

(17) या उसकी किताब के आदेशों को बदलूं.

(18) और दूसरा क़ुरआन बनाना इन्सान की क्षमता ही से बाहर है और सृष्टि का इससे मजबूर होना ख़ूब ज़ाहिर हो चुका है.

(19) यानी इसकी तिलावत और पाठ केवल अल्लाह की मर्ज़ी से है.

(20) और चालीस साल तुम में रहा हूँ इस ज़माने में मैं तुम्हारे पास कुछ नहीं लाया और मैं ने तुम्हें कुछ नहीं सुनाया. तुमने मेरे हालात को ख़ूब देखा परखा है. मैं ने किसी से एक अक्षर नहीं, पढ़ा किसी किताब का अध्ययन नहीं किया. इसके बाद यह महान किताब लाया जिसके सामने हर एक कलाम तुच्छ और निरर्थक हो गया. इस किताब में नफ़ीस उलूम हैं, उसूल और अक़ीदे हैं, आदेश और संस्कार हैं, और सदव्यवहार की तालीम है, ग़ैबी ख़बरें हैं. इसकी फ़साहत व बलाग़त ने प्रदेश भर के बोलने वालों और भाषा शाख़ियों को गूंगा बहरा बना दिया है. हर समझ वाले के लिये यह बात सूरज से ज़्यादा रौशन हो गई है कि यह अल्लाह की तरफ़ से भेजी गई वही के बिना सम्भव ही नहीं,.

(21) कि इतना समझ सको कि यह क़ुरआन अल्लाह की तरफ़ से है, बन्दों की क़ुदरत नहीं कि इस जैसा बना सकें.

(22) उसके लिये शरीक बताए.

(23) बुत.

(24) यानी दुनिया के कामों में, क्योंकि आख़िरत और मरने के बाद उठने का तो वो अक़ीदा ही नहीं रखते.

(25) यानी उसका वुजूद ही नहीं, क्योंकि जो चीज़ मौजूद है, वह ज़रूर अल्लाह के इल्म में है.

(26) एक  दीने इस्लाम पर, जैसा कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के ज़माने में क़ाबील के हाबील को क़त्ल करने के वक़्त आदम अलैहिस्सलाम और उनकी सन्तान एक ही दीन पर थे. इसके बाद उनमें मतभेद हुआ. एक क़ौल यह है कि नूह अलैहिस्सलाम तक एक दीन पर रहे फिर मतभेद हुआ तो नूह अलैहिस्सलाम भेजे गए. एक क़ौल यह है कि नूह अलैहिस्सलाम के किश्ती से उतरते वक़्त सब लोग एक ही दीन पर थे. एक क़ौल यह है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के एहद से सब लोग एक दीन पर थे यहाँ तक कि अम्र बिन लहयी ने दीन बदला. इस सूरत में “अन्नास” से मुराद ख़ास अरब होंगे. एक क़ौल यह है कि लोग एक दीन पर थे यानी कुफ़्र पर. अल्लाह तआला ने नबियों को भेजा, तो कुछ उनमें से ईमान लाए. कुछ उलमा ने कहा कि मानी ये हैं कि लोग अपनी पैदायश में नेक प्रकृति पर थे फिर उन में मतभेद हुआ. हदीस शरीफ़ में है, हर बच्चा फ़ितरत पर पैदा होता है, फिर उसके माँ बाप उसको यहूदी बनाते हैं या ईसाई बनाते है या मजूसी बनाते हैं. हदीस में फ़ितरत से फ़ितरते इस्लाम मुराद है.

(27) और हर उम्मत के लिये एक मीआद निश्चित न कर दी गई होती या आमाल का बदला क़यामत तक उठाकर न रखा गया होता.

(28) अज़ाब उतरने से.

(29) एहले बातिल का तरीक़ा है कि जब उनके ख़िलाफ़ मज़बूत दलील क़ायम होती है और वो जवाब से लाचार हो जाते हैं, तो उस दलील का ज़िक्र इस तरह छोड़ देते हैं जैसे कि वह पेश ही नहीं हुई और यह कहा करते हैं कि दलील लाओ ताकि सुनने वाले इस भ्रम में पड़ जाएं कि उनके मुक़ाबले में अब तक कोई दलील ही क़ायम नहीं की गई है. इस तरह काफ़िरों ने हुज़ूर के चमत्कार विशेषत: क़ुरआन शरीफ़ जो सबसे बड़ा चमत्कार है, उसकी तरफ़ से आँखें बन्द करके यह कहना शुरू किया कि कोई निशानी क्यों नहीं उतरी.मानो कि चमत्कार उन्होंने देखे ही नहीं और क़ुरआने पाक को वो निशानी समझते ही नहीं. अल्लाह तआला ने अपने रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से फ़रमाया कि आप फ़रमा दीजिये कि ग़ैब तो अल्लाह के लिये है, अब रास्ता देखो, मैं भी तुम्हारे साथ राह देख रहा हूँ. तक़रीर का जवाब यह है कि खुली दलील इस पर क़ायम है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर क़ुरआने पाक का ज़ाहिर होना बहुत ही अज़ीमुश-शान चमत्कार है क्योंकि हुज़ूर उनमें पैदा हुए, उनके बीच पले बढ़े. तमाम ज़माने हुज़ूर के उनकी आँखों के सामने गुज़रे. वो ख़ूब जानते हैं कि आप ने न किसी किताब का अध्ययन किया न किसी उस्ताद की शागिर्दी की. यकबारगी क़ुरआन आप पर ज़ाहिर हुआ और ऐसी बेमिसाल आलातरीन किताब का ऐसी शान के साथ उतरना वही के बग़ैर सम्भव ही नहीं. यह क़ुरआन के खुले चमत्कार होने की दलील है. और जब ऐसी मज़बूत दलील क़ायम है तो नबुव्वत का इक़रार करने के लिये किसी दूसरी निशानी का तलब करना बिल्कुल ग़ैर ज़रूरी है. ऐसी हालत में  इस निशानी का उतारना या न उतारना अल्लाह तआला की मर्ज़ी पर है, चाहे करे चाहे न करे. तो यह काम ग़ैब हुआ और इसके लिये इन्तिज़ार लाज़िम आया कि अल्लाह क्या करता है. लेकिन वह ग़ैर ज़रूरी निशानी जो काफ़िरों ने तलब की है, उतारे या न उतारे. नबुव्वत साबित हो चुकी और रिसालत का सुबूत चमत्कारों से कमाल को पहुंच चुका.

सूरए यूनुस – तीसरा रूकू

सूरए यूनुस – तीसरा रूकू

और जब कि हम आदमियों को रहमत का मज़ा देते हैं किसी तकलीफ़ के बाद जो उन्हें पहुंची थी जभी वो हमारी आयतों के साथ दाव चलते हैं (1)
तुम फ़रमा दो अल्लाह की ख़ुफ़िया तदबीर सबसे जल्द हो जाती है(2)
बेशक हमारे फ़रिश्ते तुम्हारे मक्र (कपट) लिख रहे हैं(3){21}
वही है कि तुम्हें ख़ुश्की और तरी में चलाता है(4)
यहां तक कि जब
तुम किश्ती में हो और वो अच्छी हवा से उन्हें लेकर चलें और उसपर ख़ुश हुए (6)
उनपर आंधी का झौंका आया और हर तरफ़ लहरों ने उन्हें आ लिया और समझ लिये कि हम घिर गए उस वक़्त अल्लाह को पुकारते हैं निरे उसके बन्दे होकर कि अगर तू इससे हमें बचा लेगा तो हम ज़रूर शुक्र अदा करने वालों में होंगे (7){22}
फिर अल्लाह जब उन्हें बचा लेता है जभी वो ज़मीन में नाहक़ ज़ियादती करने लगते हैं (8)
ऐ लोगो तुम्हारी ज़ियादती तुम्हारी ही जानों का वबाल हैं दुनिया के जीते जी बरत लो फिर तुम्हें हमारी तरफ़ फिरना है उस वक़्त हम तुम्हें जता देंगे जो तुम्हारे कौतुक थे (9){23}
दुनिया की ज़िन्दगी की कहावत तो ऐसी ही है जैसे वह पानी कि हमने आसमान से उतारा तो उसके कारण ज़मीन से उगने वाली चीज़ें सब घनी होकर निकालीं जो कुछ आदमी और चौपाए खाते हैं(10)
यहाँ तक कि जब ज़मीन ने अपना सिंगार ले लिया (11)
और ख़ूब सज गई और उसके मालिक समझे कि यह हमारे बस में आ गई (12)
हमारा हुक्म उसपर आया रात में या दिन में (13)
तो हमने उसे कर दिया काटी हुई मानो कल थी ही नहीं (14)
हम यूंही आयतें तफ़सील (विस्तार) से बयान करते हैं ग़ौर करने वालों के लिये (15){24}
और अल्लाह सलामती के घर की तरफ़ पुकारता है (16)
और जिसे चाहे सीधी राह चलाता है(17){25}
भलाई वालों के लिये भलाई है और इस से भी अधिक (18)
और उनके मुंह पर न चढ़ेगी सियाही और ख़्वारी (19)
वही जन्नत वाले हैं, वो उसमें हमेशा रहेंगे {26} और जिन्होंने बुराइयाँ कमाई (20)
तो बुराई का बदला उसी जैसा (21)
और उनपर ज़िल्लत चढ़ेगी, उन्हें अल्लाह से बचाने वाला कोई न होगा, मानो उनके चेहरों पर अंधेरी रात के टुकड़े चढ़ा दिये हैं (22)
वही दोज़ख़ वाले हैं वो उसमें हमेशा रहेंगे{27} और जिस दिन हम उन सब को उठाएंगे (23)
फिर मुश्रिकों से फ़रमाएंगे अपनी जगह रहो तुम और तुम्हारे शरीक (24)
तो हम उन्हें मुसलमानों से जुदा कर देंगे और उनके शरीक उनसे कहेंगे तुम हमें कब पूजते थे(25){28}
तो अल्लाह गवाह काफ़ी है हम में और तुम में कि हमें तुम्हारे पूजने की ख़बर भी न थी{29} यहाँ पर हर जान जांच लेगी जो आगे भेजा(26)
और अल्लाह की तरफ़ फेरे जाएंगे जो उनका सच्चा मौला है और उनकी सारी बनावटें (27)
उनसे गुम हो जाएंगी.(28){30}


सूरए यूनुस – तीसरा रूकू तफ़सीर

(1) मक्का वालों पर अल्लाह तआला ने दुष्काल डाल दिया जिसकी मुसीबत में वो सात बरस गिरफ़्तार रहे यहाँ तक कि हलाकत के क़रीब पहुंचे. फिर उसने रहम फ़रमाया, बारिश हुई, ज़मीनों पर हिरयाली छाई. तो अगरचे इस तकलीफ़ और राहत दोनों में क़ुदरत की निशानियाँ थीं और तकलीफ़ के बाद राहत बड़ी महान नेअमत थी, इसपर शुक्र लाज़िम था, मगर बजाय इसके उन्होंने नसीहत न मानी और फ़साद व कुफ़्र की तरफ़ पलटें.

(2) और उसका अज़ाब देर नहीं करता.

(3) और तुम्हारी छुपवाँ तदबीरें कर्मों का लेखा जोखा रखने वाले फ़रिश्तों पर भी छुपी हुई नहीं हैं तों जानने वाले ख़बर रखने वाले अल्लाह से कैसे छुप सकती हैं.

(4) और तुम्हें दूरियाँ तय करने की क़ुदरत देता है. ख़ुश्की में तुम पैदल और सवार मंज़िलें तय करते हो और नदियों में, किश्तियों और जहाजों से सफ़र करते हो. वह तुम्हें ख़ुश्की और तरी दोनों में घूमने फिरने के साधन अता फ़रमाता है.

(5) यानी किश्तियाँ.

(6) कि हवा अनुकूल है, अचानक.

(7) तेरी नेअमतों के, तुझपर ईमान लाकर और ख़ास तेरी इबादत करके.

(8) और वादे के ख़िलाफ़ करके कुफ़्र और गुनाहों में जकड़े जाते हैं.

(9) और उनका तुम्हें बदला देंगे.

(10) ग़ल्ले और फल और हरियाली.

(11) ख़ूब फूली, हरी भरी और तरो ताज़ा हुई.

(12) कि खेतियाँ तैयार हो गई, फल पक गए, ऐसे वक़्त.

(13) यानी अचानक हमारा अज़ाब आया, चाहे बिजली गिरने की शक्ल में या ओले बरसने या आंधी चलने की सूरत में.

(14) यह उन लोगों के हाल की एक मिसाल है जो दुनिया के चाहने वाले हैं और आख़िरत की उन्हें कुछ परवाह नहीं. इसमें बहुत अच्छे तरीक़े पर समझाया गया है कि दुनियावी ज़िन्दगानी उम्मीदों का हरा बाग़ है, इसमें उम्र खोकर जब आदमी उस हद पर पहुंचता है जहाँ उसको मुराद मिलने का इत्मीनान हो और वह कामयाबी के नशे में मस्त हो, अचानक उसको मौत पहुंचती है और वह सारी लज़्ज़तों और नेअमतों से मेहरूम हो जाता है. क़तादा  ने कहा कि दुनिया का तलबगार जब बिल्कुल बेफ़िक्र होता है, उस वक़्त उसपर अल्लाह का अज़ाब आता है और उसका सारा सामान जिससे उसकी उम्मीदें जुड़ी थीं, नष्ट हो जाता है.

(15) ताकि वो नफ़ा हासिल करें और शक तथा वहम के अंधेरों से छुटकारा पाएं और नश्वर दुनिया की नापायदारी से बाख़बर हों.

(16) दुनिया की नापायदारी बयान फ़रमाने के बाद हमेशगी की दुनिया की तरफ़ दावत दी. क़तादा ने कहा कि दारे. सलाम जन्नत है. यह अल्लाह की भरपूर रहमत और मेहरबानी है कि अपने बन्दों को जन्नत की दावत दी.

(17) सीधी राह दीने इस्लाम है. बुख़ारी की हदीस में है, नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में फ़रिश्ते हाज़िर हुए, आप ख़्वाब में थे. उनमें से कुछ ने कहा कि आप ख़्वाब में है और कुछ ने कहा कि आँखें ख़्वाब में है, दिल बेदार है. कुछ कहने लगे कि इनकी कोई मिसाल तो बयान करो, तो उन्होंने कहा, जिस तरह किसी शख़्स ने एक मकान बनाया और उसमें तरह तरह की नेअमतें उपलब्ध कीं और एक बुलाने वाले को भेजा कि लोगों को बुलाए. जिसने उस बुलाने वाले की फ़रमाँबरदारी की, उस मकान में दाख़िल हुआ और उन नेअमतों को खाया पिया और जिसने बुलाने वाले की आवाज़ न मानी, वह मकान में दाख़िल न हो सका न कुछ खा सका. फिर वो कहने लगे कि इस मिसाल पर गहराई से ग़ौर करो कि समझ में आए. मकान जन्नत है, बुलाने वाले मुहम्मद हैं, जिसने उनकी फ़रमाँबरदारी की, उसने अल्लाह की फ़रमाँबरदारी की.

(18) भलाई वालों से अल्लाह के फ़रमाँबरदार बन्दे, ईमान वाले मुराद हैं. और यह जो फ़रमाया कि उनके लिये भलाई है, इस भलाई से जन्नत मुराद है. और “इससे भी ज़्यादा”का मतलब है, अल्लाह का दीदार, मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है कि जन्नतियों के जन्नत में दाख़िल होने के बाद अल्लाह तआला फ़रमाएगा, क्या तुम चाहते हो कि तुमपर और ज़्यादा इनायत करूं. वो अर्ज़ करेंगे या रब, क्या तुने हमारे चेहरे सफ़ेद नहीं किये, क्या तूने हमें जन्नत में दाख़िल नहीं फ़रमाया़ क्या तूने हमें दोज़ख़ से निजात नहीं दी. हुज़ूर ने फ़रमाया, फिर पर्दा उठा दिया जाएगा तो अल्लाह का दीदार उन्हें हर नेअमत से ज़्यादा प्यारा होगा. सही हदीस की किताबों में बहुत सी रिवायतें यह साबित करती हैं कि आयत में “इससे भी ज़्यादा” से अल्लाह का दीदार मुराद है.

(19) कि यह बात जहन्नम वालों के लिये है.

(20) यानी कुफ़्र और गुनाह में जकड़ गए.

(21) ऐसा नहीं कि जैसे नेकियों का सवाब दस गुना और सात सौ गुना किया जाता है ऐसे ही बदियों का अज़ाब भी बढ़ा दिया जाए, बल्कि जितनी बदी होगी उतना ही अज़ाब किया जाएगा.

(22) यह हाल होगा उनकी रूसियाही का, ख़ुदा की पनाह.

(23) और तमाम सृष्टि को हिसाब के मैदान में जमा करेंगे,

(24) यानी वो बुत जिन्हें तुम पूजते थे.

(25) क़यामत के दिन एक घड़ी ऐसी सख़्ती की होगी कि बुत अपने पुजारियों की पूजा का इनकार कर देंगे और अल्लाह की क़सम खाकर कहेंगे कि हम न सुनते थे, न देखते थे, न जानते थे, न समझते थे कि तुम हमें पूजते हो. इसपर बुत परस्त कहेंगे कि अल्लाह की क़सम हम तुम्हीं को पूजते थे तो बुत कहेंगे.

(26) यानी उस मैदान में सब को मालूम हो जाएगा कि उन्होंने पहले जो कर्म किये थे वो कैसे थे. अच्छे या बुरे, नफ़ा वाले या घाटे वाले.

(27) बुतों को ख़ुदा का शरीक बताना और मअबूद ठहराना.

(28) और झूठी और बेहक़ीक़त साबित होंगी.

सूरए यूनुस – चौथा रूकू

सूरए यूनुस – चौथा रूकू

तुम फ़रमाओ तुम्हें कौन रोज़ी देता है आसमान और ज़मीन से(1)
या कौन मालिक है कान और आँखों का (2)
और कौन निकालता है ज़िन्दा को मुर्दे से और निकालता है मुर्दा को ज़िन्दा से(3)
और कौन तमाम कामों की तदबीर (युक्ति) करता है तो अब कहेंगे कि अल्लाह (4)
तो तुम फ़रमाओ तो क्यों नहीं डरते(5){31}
तो यह अल्लाह है तुम्हारा सच्चा रब (6)
फिर हक़ के बाद क्या है मगर गुमराही (7)
फिर कहाँ फिरे जाते हो {32} यूंही साबित हो चुकी है तेरे रब की बात फ़ासिक़ों (दुराचारियों) (8)
पर तो वो ईमान नहीं लाएंगे{33} तुम फ़रमाओ तुम्हारे शरीकों में (9)
कोई ऐसा है कि पहले बनाए फिर फ़ना (विनाश) के बाद दोबारा बनाए (10)
तुम फ़रमाओ अल्लाह पहले बनाता है फिर फ़ना के बाद दोबारा बनाएगा तो कहाँ औंधे जाते हो(11{34}
तुम फ़रमाओ तुम्हारे शरीकों में कोई ऐसा है कि हक़ की राह दिखाए (12)
तुम फ़रमाओ कि अल्लाह हक़ की राह दिखाता है, तो क्या जो हक़ की राह दिखाए उसके हुक्म पर चलना चाहिये या उसके जो ख़ुद ही राह न पाए जब तक राह न दिखाया जाए (13)
तो तुम्हें क्या हुआ कैसा हुक्म लगाते हो {35} और(14)
उनमें अक्सर तो नहीं चलते मगर गुमान पर (15)
बेशक गुमान हक़ का कुछ काम नहीं देता, बेशक अल्लाह उनके कामों को जानता है {36} और क़ुरआन की यह शान नहीं कि कोई अपनी तरफ़ से बनाले बे अल्लाह के उतारे(16)
हाँ वह अगली किताबों की तस्दीक़ {पुष्टि} है (17)
और लौह में जो कुछ लिखा है सबकी तफ़सील है इसमें कुछ शक नहीं है जगत के रब की तरफ़ से है{37} क्या ये कहते हैं (18)
कि उन्होंने इसे बना लिया है, तुम फ़रमाओ (19)
तो इस जैसी कोई एक सूरत ले आओ और अल्लाह को छोड़कर जो मिल सकें सबको बुला लाओ(20)
अगर तुम सच्चे हो {38} बल्कि उसे झुटलाया जिसके इल्म पर क़ाबू न पाया(21)
और अभी उन्होंने इसका अंजाम नहीं देखा, (22)
ऐसे ही उनसे अगलों ने झुटलाया था (23)
तो देखो ज़ालिमों का कैसा अंजाम हुआ(24){39}
और उनमें (25)
कोई इस (26)
पर ईमान लाता है और उनमें कोई इस पर ईमान नहीं लाता है, और तुम्हारा रब फ़सादियों को ख़ूब जानता है(27){40}


सूरए यूनुस – चौथा रूकू तफ़सीर

(1) आसमान से मेंह बरसाकर और ज़मीन में हरियाली उगाकर.

(2) और ये हवास या इन्द्रियाँ तुम्हे किसने दिये है, किसने ये चमत्कार तुम्हें प्रदान किये हैं, कौन इन्हें मुद्दतों सुरक्षित रखता है.

(3) इन्सान को वीर्य से और वीर्य को इन्सान से, चिड़िया को अन्डे से और अन्डे को चिड़िया से. मूमिन को काफ़िर से और  काफ़िर को मूमिन से. आलिम को जाहिल से और जाहिल को आलिम से.

(4) और उसकी सम्पूर्ण क़ुदरत का ऐतिराफ़ करेंगे और इसके सिवा कुछ चारा न होगा.

(5) उसके अज़ाब से, और क्यों बुतों को पूजते और उनको मअबूद बनाते हो जबकि वो कुछ क़ुदरत नहीं रखते.

(6) जिसकी ऐसी भरपूर क़ुदरत है.

(7) यानी जब ऐसी खुली दलीलें और साफ़ प्रमाणों से साबित हो गया कि इबादत के लायक़ सिर्फ़ अल्लाह है, तो उसके अलावा सब बातिल और गुमराही, और जब तुमने उसकी क़ुदरत को पहचान लिया और उसकी क्षमता का ऐतिराफ़ कर लिया तो.

(8) जो कुफ़्र में पक्के हो गए. रब की बात से मुराद है अल्लाह की तरफ़ से जो लिख दिया गया. या अल्लाह तआला का इरशाद “लअम लअन्ना जहन्नमा.”… (मैं तुम सबसे जहन्नम भर दूंगा – सूरए अअराफ़, आयत 18)

(9) जिन्हें ऐ मुश्रिकों, तुम मअबूद ठहराते हो.

(10) इसका जवाब ज़ाहिर है कि कोई ऐसा नहीं क्यों कि मुश्रिक भी यह जानते हैं कि पैदा करने वाला अल्लाह ही है, लिहाज़ा ऐ मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम.

(11) और ऐसी रौशन दलीलें क़ायम होने के बाद सीधे रास्तें से मुंह फेरते हो.

(12) तर्क और दलीलें क़ायम करके, रसूल भेजकर, किताबें उतारकर,  समझ वालों को अक़्ल और नज़र अता फ़रमा कर. इसका खुला जवाब यह है कि कोई नहीं, तो ऐ हबीब.

(13) जैसे कि तुम्हारे बुत हैं किसी जगह जा नहीं सकते जब तक कि कोई उठा ले जाने वाला उन्हें उठाकर न ले जाए. और न किसी चीज़ की हक़ीक़त को समझें और न सच्चाई की राह को पहचानें, बग़ैर इसके कि अल्लाह तआला उन्हें ज़िन्दगी, अक़्ल और नज़र दे. तो जब उनकी मजबूरी का यह आलम है तो वो दूसरों को क्या राह बता सकेंगे. ऐसों को मअबूद बनाना, फ़रमाँबरदारी करना कितना ग़लत और बेहूदा है.

(14) मुश्रिक लोग.

(15) जिसकी उनके पास कोई दलील नहीं, न उसके ठीक होने का इरादा और यक़ीन. शक में पड़े हुए हैं और यह ख़याल करते हैं कि पहले लोग भी बुत पूजते थे, उन्होंने कुछ तो समझा होगा.

(16) मक्का के काफ़िरों ने यह वहम किया था कि क़ुरआन शरीफ़ सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ख़ुद बना लिया है. इस आयत में उनका यह वहम दूर फ़रमाया गया कि क़ुरआने करीम ऐसी किताब ही नहीं जिसकी निस्बत शक हो सके. इसकी मिसाल बनाने से सारी सृष्टि लाचार है तो यक़ीनन वह अल्लाह की उतारी हुई किताब है.

(17) तौरात और इंजील वग़ैरह की.

(18) काफ़िर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की निस्बत.

(19)अगर तुम्हारा यह ख़याल है तो तुम भी अरब हो, ज़बान और अदब, फ़साहत और बलाग़त के दावेदार हो, दुनिया में कोई इन्सान ऐसा नहीं हैं जिसके कलाम के मुक़ाबिल कलाम बनाने को तुम असम्भव समझते हो. अगर तुम्हारे ख़याल में यह इन्सान का कलाम है.

(20 )और उनसे मदद लो और सब मिलकर क़ुरआन जेसी एक सूरत तो बनाओ.

(21) यानी क़ुरआन शरीफ़ को समझने और जानने के बग़ैर उन्होंने इसे झुटलाया और यह निरी जिहालत है कि किसी चीज़ को जाने बग़ैर उसका इन्कार किया जाए. क़ुरआन शरीफ़ में ऐसे उलूम शामिल होना, जिसे इल्म और अक़्ल वाले न छू सकें, इस किताब की महानता और बुज़ुर्गी ज़ाहिर करता है. तो ऐसी उत्तम उलूम वाली किताब को मानना चाहिये था न कि इसका इन्कार करना.

(22) यानी उस अज़ाब को जिसकी क़ुरआन शरीफ़ में चुनौतियाँ हैं.

(23)दुश्मन से अपने रसूलों को, बग़ैर इसके कि उनके चमत्कार और निशानियाँ देखकर सोच समझ से काम लेते.

(24) और पहली उम्मतें अपने नबियों को झुटलाकर कैसे कैसे अज़ाबों में जकड़ी गई तो ऐ हबीब सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, आप को झुटलाने वालों को डरना चाहिये.

(25)मक्का वाले.

(26) नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम या क़ुरआन शरीफ़

(27) जो दुश्मनी से ईमान नहीं लाते और कुफ़्र पर अड़े रहते हैं.

सूरए यूनुस – पाँचवां रूकू

Posted on August 1, 2011 by Kanzul Iman in hindi (Kalamur Rahman)

सूरए यूनुस – पाँचवां रूकू

और अगर वो तुम्हें झुटलाएं (1)
तो फ़रमा दो कि मेरे लिये मेरी करनी और तुम्हारे लिये तुम्हारी करनी (2)
तुम्हें मेरे काम से इलाक़ा नहीं और मुझे तुम्हारे काम से तअल्लुक़ नहीं (3){41}
और उनमें कोई वो हैं जो तुम्हारी तरफ़ कान लगाते हैं(4)
तो क्या तुम बहरों को सुना दोगे अगरचे उन्हें अक़ल न हो (5){42}
और उनमें कोई तुम्हारी तरफ़ तकता है(6)
क्या तुम अंधों को राह दिखा दोगे अगरचे वो न सूझें{43} बेशक अल्लाह लोगों पर कुछ ज़ुल्म नहीं करता(7)
हाँ लोग ही अपनी जानों पर ज़ुल्म करते हैं (8){44}
और जिस दिन उन्हें उठाएगा(9)
मानों दुनिया में न रहे थे मगर उस दिन की एक घड़ी (10)
आपस में पहचान करेंगे(11)
कि पूरे घाटे में रहे वो जिन्होंने अल्लाह से मिलने को झूटलाया और हिदायत पर न थे(12){45}
और अगर हम तुम्हें दिखा दें कुछ (13)
उसमें से जो उन्हें वादा दे रहे हैं (14)
या तुम्हें पहले ही अपने पास बुला ले(15)
हर हाल में उन्हें हमारी तरफ़ पलट कर आना है फिर अल्लाह गवाह है (16)
उनके कामों पर {46} और हर उम्मत में एक रसूल हुआ (17)
जब उसका रसूल उनके पास आता(18)
उनपर इन्साफ़ का फ़ैसला कर दिया जाता (19)
और उनपर ज़ुल्म न होता {47} और कहते हैं यह वादा कब आएगा अगर तुम सच्चे हो (20){48}
तुम फ़रमाओ मैं अपनी जान के बुरे भले का (ज़ाती) इख़्तियार नहीं रखता मगर जो अल्लाह चाहे(21)
हर गिरोह का एक वादा है(22)
जब उनका वादा आएगा तो एक घड़ी न पीछे हटे न आगे बढ़े {49} तुम फरमाओ भला बताओ तो अगर उसका अज़ाब और(23)
तुमपर रात को आए (24)
या दिन को (25)
तो उसमें वह कौन सी चीज़ है कि मुजरिमों को जिसकी जल्दी है {50} तो क्या जब(26)
हो पड़ेगा उस वक़्त उसका यक़ीन करेंगे(27)
क्यों अब मानते हो पहले तो (28)
इसकी जल्दी मचा रहे थे {51} फिर ज़ालिमों से कहा जाएगा हमेशा का अज़ाब चखो तुम्हें कुछ और बदला न मिलेगा मगर वही जो कमाते थे (29){52}
और तुमसे पूछते हैं क्या वह (30) हक़ है, तुम फ़रमाओ, हाँ मेरे रब की क़सम बेशक वह ज़रूर हक़ है और तुम कुछ थका न सकोगे(31){53}


सूरए यूनुस – पाँचवां रूकू तफ़सीर

(1) ऐ मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, और उनकी राह पर आने और सच्चाई और हिदायत क़ुबूल करने की उम्मीद टूट जाए.

(2) हर एक अपने अमल का बदला पाएगा.

(3) किसी के अमल पर दूसरे की पकड़ न होगी. जो पकड़ा जाएगा अपने कर्मों पर पकड़ा जाएगा. यह फ़रमान चेतावनी के तौर पर है कि तुम नसीहत नहीं मानते और हिदायत क़ुबूल नहीं करते तो इसका वबाल ख़ुद तुमपर होगा, किसी दूसरे को इससे नुक़सान नहीं.

(4) और आपसे क़ुरआन शरीफ़ और दीन के अहकाम सुनते हैं और दुश्मनी की वजह से दिल में जगह नहीं देते और क़ुबूल नहीं करते, तो यह सुनना बेकार है, वो हिदायत से नफ़ा न पाने में बेहरों की तरह हैं.

(5) और वो न हवास से काम लें न अक़्ल से.

(6) और सच्चाई की दलीलों और नबुव्वत की निशानियों को देखता है, लेकिन तस्दीक़ नहीं करता और इस देखने से नतीजा नहीं निकलता, फ़ायदा नहीं उठाता, दिल की नज़र से मेहरूम और बातिन यानी अन्दर का अन्धा है.

(7) बल्कि उन्हें हिदायत और राह पाने के सारे सामान अता फ़रमाता है और रौशन दलीलें क़ायम फ़रमाता है.

(8) कि इन दलीलों में ग़ौर नहीं करते और सच्चाई साफ़ स्पष्ट हो जाने के बावुजूद ख़ुद गुमराही में गिरफ़्तार होते हैं.

(9) क़ब्रों से, हिसाब के मैदान में हाज़िर करने के लिये, तो उस दिन की हैबत और वहशत से यह हाल होगा कि वो दुनिया में रहने की मुद्दत को बहुत थोड़ा समझेंगे और यह ख़याल करेंगे कि….

(10) और इसकी वजह यह है कि चूंकि काफ़िरों ने दुनिया की चाह में उम्रें नष्ट कर दीं और अल्लाह की फ़रमाँबरदारी, जो आज काम आती, बजा न लाए तो उनकी ज़िन्दगी का वक़्त उनके काम न आया. इसलिये वो उसे बहुत ही कम समझेंगे.

(11) क़ब्रों से निकलते वक़्त तो एक दूसरे को पहचानेंगे जैसा दुनिया में पहचानते थे, फिर क़यामत के दिन की हौल और दहशतनाक मन्ज़र देखकर यह पहचान बाक़ी न रहेगी. एक क़ौल यह है कि क़यामत के दिन पल पल हाल बदलेंगे. कभी ऐसा हाल होगा कि एक दूसरे को पहचानेंगे, कभी ऐसा कि न पहचानेंगे और जब पहचानेंगे तो कहेंगे.

(12) जो उन्हें घाटे से बचाती.

(13)अज़ाब.

(14) दुनिया ही में आपके ज़मानए हयात में, तो वह मुलाहिज़ा कीजिये.

(15) तो आख़िरत में आपको उनका अज़ाब दिखाएंगे.  इस आयत से साबित हुआ कि अल्लाह तआला अपने रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को काफ़िरों के बहुत से अज़ाब और उनकी ज़िल्लत और रूसवाइयाँ आपकी दुनियावी ज़िन्दगी ही में दिखाएगा. चुनांचे बद्र वग़ैरह में दिखाई गई और जो अज़ाब काफ़िरों के लिये कुफ़्र और झुटलाने के कारण आख़िरत में मुक़र्रर फ़रमाता है वह आख़िरत में दिखाएगा.

(16) ख़बर वाला है, अज़ाब देने वाला है.

(17) जो उन्हें सच्चाई की तरफ़ बुलाता और फ़रमाबँरदारी और ईमान का हुक्म करता.

(18) और अल्लाह के आदेशों की तबलीग़ या प्रचार करता, तो कुछ लोग ईमान लाते और कुछ झुटलाते और कुछ इन्कारी हो जाते हो.

(19) कि रसूल को और उनपर ईमान लाने वाले को निजात दी जाती और झुटलाने वालों को अज़ाब से हलाक कर दिया जाता. आयत की तफ़सीर में दूसरा क़ौल यह है कि इस में आख़िरत का बयान है और मानी ये हैं कि क़यामत के दिन हर उम्मत के लिये एक रसूल होगा जिसकी तरफ़ वह मन्सूब होगी. जब वह रसूल हिसाब के मैदान में आएगा और मूमिन व काफ़िर पर शहदात देगा तब उनमें फ़ैसला किया जायगा कि ईमान वालों को निजात होगी और काफ़िर अज़ाब में जकड़े जायेंगे.

(20) जब आयत “इम्मा नूरियन्नका” में अज़ाब की चेतावनी दी गई तो काफ़िरों ने सरकशी से यह कहा कि ऐ मुहम्मद, जिस अज़ाब का आप वादा देते हैं वह कब आएगा. उसमें क्या देर है. उस अज़ाब को जल्द लाइये. इसपर यह आयत उतरी.

(21) यानी दुश्मनों पर अज़ाब उतरना और दोस्तों की मदद करना और उन्हें ग़ल्बा देना, यह सब अल्लाह की मर्ज़ी है और अल्लाह की मर्ज़ी में.

(22) उसके हलाक और अज़ाब का एक समय निर्धारित है, लौहे मेहफ़ूज़ में लिखा हुआ है.

(23) जिसकी तुम जल्दी करते हो.

(24) जब तुम ग़ाफ़िल पड़े सोते हो.

(25) जब तुम रोज़ी रोटी के कामों में मश्ग़ूल हो.

(26) वह अज़ाब तुम पर नाज़िल.

(27) उस वक़्त का यक़ीन कुछ फ़ायदा न देगा और कहा जाएगा.

(28) झुटलाने और मज़ाक़ उड़ाने के तौर पर.

(29) यानी दुनिया में जो अमल करते थे और नबियों को झुटलाने और कुफ़्र में लगे रहते थे उसी का बदला.

(30) उठाए जाने और अज़ाब, जिसके नाज़िल होने की आपने हमें ख़बर दी.

(31) यानी वह अज़ाब तुम्हें ज़रूर पहुंचेगा.

सूरए यूनुस – छटा रूकू

सूरए यूनुस – छटा रूकू

और अगर हर ज़ालिम जान ज़मीन में जो कुछ है(1)
सब की मालिक होती ज़रूर अपनी जान छूड़ाने में देती(2)
और दिल में चुपके चुपके पशेमान हुए जब अज़ाब देखा और उनमें इन्साफ़ से फ़ैसला कर दिया गया और उनपर ज़ुल्म न होगा{54} सुन लो बेशक अल्लाह ही का है जो कुछ आसमानों में है और ज़मीन में (3)
सुन लो बेशक अल्लाह का वादा सच्चा है मगर उनमें अक्सर को ख़बर नहीं {55} वह जिलाता और मारता है और उसी की तरफ़ फिरोगे{56} ऐ लोगो तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से नसीहत आई (4)
और दिलों की सेहत और हिदायत और रहमत ईमान वालों के लिये {57} तुम फ़रमाओ अल्लाह ही के फ़ज़्ल (अनुकम्पा) और उसी की रहमत और उसी पर चाहिये कि ख़ुशी करें(5)
वह उनके सब धन दौलत से बेहतर है {58} तुम फ़रमाओ भला बताओ तो वह जो अल्लाह ने तुम्हारे लिये रिज़्क़ (जीविका) उतारा उसमें तुम ने अपनी तरफ़ से हराम व हलाल ठहरा लिया (6)
तुम फ़रमाओ क्या अल्लाह ने इसकी तुम्हें इजाज़त दी या अल्लाह पर झूट बांधते हो (7){59}
और क्या गुमान है उनका जो अल्लाह पर झूट बांधते हैं कि क़यामत में उनका क्या हाल होगा, बेशक अल्लाह लोगों पर फ़ज़्ल करता है (8)
मगर अक्सर लोग शुक्र नहीं करते{60}


सूरए यूनुस – छटा रूकू तफ़सीर 

(1) माल मत्ता, ख़ज़ाना और दफ़ीना.

(2) और क़यामत के दिन उसको रिहाई के लिये फ़िदिया कर डालती. मगर यह फ़िदिया क़ुबूल नहीं और तमाम दुनिया की दौलत ख़र्च करके भी रिहाई सम्भव नहीं. जब क़यामत में यह मंज़र पेश आया और क़ाफ़िरों की उम्मीदें टूटीं.

(3) तो काफ़िर किसी चीज़ का मालिक ही नहीं बल्कि वह ख़ुद भी अल्लाह का ममलूक है, उसका फ़िदिया देना सम्भव ही नहीं,

(4) इस आयत मे क़ुरआन शरीफ़ के आने और इसमें मौज़ूद नसीहतों, शिफ़ा, हिदायत और रहमत का बयान है कि यह किताब इन बड़े फ़ायदों से ओतप्रोत है. नसीहत के मानी है वह चीज़ जो इन्सान को उसकी पसन्द की चीज़ की तरफ़ बुलाए और ख़तरे से बचाए. ख़लील ने कहा कि यह नेकी की नसीहत करना है जिससे दिल में नर्मी पैदा हो. शिफ़ा से मुराद यह है कि क़ुरआन शरीफ़ दिल के अन्दर की बीमारियों को दूर करता है. दिल की ये बीमारियाँ दुराचार, ग़लत अक़ीदे और मौत की तरफ़ ले जाने वाली जिहालत हैं. क़ुरआने पाक इन तमाम रोगों को दूर करता है. क़ुरआने करीम की विशेषता में हिदायत भी फ़रमाया, क्योंकि वह गुमराही से बचाता और सच्चाई की राह दिखाता है और ईमान वालों के लिये रहमत, इसलिये फ़रमाया कि वह इससे फ़ायदा उठाते हैं.

(5) किसी प्यारी और मेहबूब चीज़ के पाने से दिल को जो लज़्ज़त हासिल होती है उसको फ़रह कहते हैं. मानी ये हैं कि ईमान वालों को अल्लाह के फ़ज़्ल और रहमत पर ख़ुश होना चाहिये कि उसने उन्हें नसीहतों, और दिलों की अच्छाई और ईमान के साथ दिल की राहत और सुकून अता फ़रमाए. हज़रत इब्ने अब्बास व हसन व क़तादा ने कहा कि अल्लाह के फ़ज़्ल से इस्लाम और उसकी रहमत से क़ुरआन मुराद है. एक क़ौल यह है कि फ़ज़्लुल्लाह से क़ुरआन और रहमत से हदीसें मुराद हैं.

(6) इस आयत से साबित हुआ कि किसी चीज़ को अपनी तरफ़ से हलाल या हराम करना मना और ख़ुदा पर झूट जोड़ना है. आजकल बहुत लोग इसमें जकड़े हुए हैं. ममनूआत यानी वर्जित चीज़ों को हलाल कहते हैं और जिन चीज़ों के इस्तमाल की अल्लाह व रसूल न इजाज़त दी है, उसको हराम. कुछ सूद को हलाल करने पर अड़े हैं, कुछ तस्वीरों को, कुछ खेल तमाशों को, कुछ औरतों की बेक़ैदियों और बेपर्दगीयों को, कुछ भूख हड़ताल को, जो आत्म हत्या है, हलाल समझते हैं. और कुछ लोग हलाल चीज़ों को हराम ठहराने पर तुले हुए हैं, जैसे मीलाद की महफ़िल को, फ़ातिहा को, ग्यारहवीं को और ईसाले सवाब के दूसरे तरीक़ों को, कुछ मीलाद शरीफ़ और फ़ातिहा व तोशा की शीरीनी और तबर्रूक को, जो सब हलाल और पाक चीज़ें हैं, नाजायज़ और वर्जित बताते हैं.

(8) कि रसूल भेजता है, किताबें नाज़िल फ़रमाता है, और हलाल व हराम से बाख़बर फ़रमाता है.

सूरए यूनुस – सातवाँ रूकू

सूरए यूनुस – सातवाँ रूकू

और तुम किसी काम में हो(1)
और उसकी तरफ़ से कुछ क़ुरआन पढ़ो और तुम लोग(2)
कोई काम करो हम तुमपर गवाह होते हैं जब तुम उसको शुरू करते हो, और तुम्हारे रब से ज़र्रा भर कोई चीज़ ग़ायब नहीं ज़मीन में न आसमान में और न उससे छोटी और न उससे बड़ी कोई नहीं जो एक रौशन किताब में न हो (3){61}
सुन लो बेशक अल्लाह के वलियों पर न कुछ डर है न कुछ ग़म (4){62}
उन्हें ख़ुशख़बरी है दुनिया की ज़िन्दगी में (5)
और आख़िरत में, अल्लाह की बातें बदल नहीं सकती(6)
यही बड़ी कामयाबी है {64} और तुम उनकी बातों का ग़म न करो(7)
बेशक इज़्ज़त सारी अल्लाह ही के लिये है(8)
वही सुनता जानता है {65} सुन लो बेशक अल्लाह ही के मुल्क हैं जितने आसमानों में हैं और जितने ज़मीनों में (9)
और काहे के पीछे जा रहे हैं (10)
वो जो अल्लाह के सिवा शरीक पुकार रहे हैं, वो तो पीछे नहीं जाते मगर गुमान के और वो तो नहीं मगर अटकलें दौड़ाते(11){66}
वही है जिसने तुम्हारे लिये रात बनाई कि उसमें चैन पाओ और दिन बनाया तुम्हारी आँखें खोलता (13)
बेशक उसमें निशानियां हैं सुनने वालों के लिये (14){67}
बोले अल्लाह ने अपने लिये औलाद बनाई (15)
पाकी उसको, वही बेनियाज़ है, उसी का है जो कुछ आसमानों में और जो कुछ ज़मीन में(16)
तुम्हारे पास इसकी कोई भी सनद नहीं, क्या अल्लाह पर वह बात बताते हो जिसका तुम्हें इल्म नहीं {68} तुम फ़रमाओ वो जो अल्लाह पर झूट बांधते हैं उनका भला न होगा {69} दुनिया में कुछ बरत लेना है फिर उन्हें हमारी तरफ़ वापस आना फिर हम उन्हें सख़्त अज़ाब चखाएंगे बदला उनके कुफ़्र का{70}

सूरए यूनुस – सातवाँ रूकू तफ़सीर 

(1) ऐ हबीबे अकरम सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम.

(2) ऐ मुसलमानों.

(3) “किताबे मुबीन” यानी रौशन किताब से लोहे मेहफ़ूज़ मुराद है.

(4) “वली” की अस्ल विला से है जो क़ुर्ब और नुसरत के मानी में हैं. अल्लाह का वली वह है जो फ़र्ज़ों से अल्लाह का क़ुर्ब हासिल करें और अल्लाह की फ़रमाँबरदारी में लगा रहे और उसका दिल अल्लाह के जलाल के नूर को पहचानने में डूबा हो जब देखे, अल्लाह की क़ुदरत की दलीलों को देखे और जब सुने अल्लाह की आयतें ही सुने, और जब बोले तो अपने रब की प्रशंसा और तअरीफ़ ही के साथ बोले, और जब हरकत करे अल्लाह की आज्ञा के पालन में ही हरकत करे, और जब कोशिश करे उसी काम में कोशिश करे जो अल्लाह के क़रीब पहुंचने का ज़रिया हो. अल्लाह के ज़िक्र से न थके और दिल की आँख से ख़ुदा के सिवा ग़ैर को न देखे. यह विशेषता वलियों की है. बन्दा जब इस हाल पर पहुंचता है तो अल्लाह उसका वली

और सहायक और मददगार होता है. मुतकल्लिमीन कहते हैं, वली वह है जो प्रमाण पर आधारित सही अक़ीदे रखता हो और शरीअत के मुताबिक़ नेक कर्म करता हो. कुछ आरिफ़ीन ने फ़रमाया कि विलायत नाम है अल्लाह के क़ुर्ब और अल्लाह के साथ मश्ग़ूल रहने का. जब बन्दा इस मक़ाम पर पहुंचता है तो उसको किसी चीज़ का डर नहीं रहता और न किसी चीज़ से मेहरूम होने का ग़म होता है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि वली वह है जिसे देखने से अल्लाह याद आए. सही तबरी की हदीस में भी है. इब्ने ज़ैद ने कहा कि वली वही है जिसमें वह सिफ़त और गुण हो जो इस आयत में बयान किया गया है

. “अल्लज़ीना आमनू वकानू यत्तक़ून” यानी ईमान और तक़वा दोनो का संगम हो. कुछ उलमा ने फ़रमाया, वली वो है जो ख़ालिस अल्लाह के लिये महब्बत करें. वलियों की यह विशेषता कई हदीसों में आई है. कुछ बुज़ुर्गों ने फ़रमाया, वली वो हैं जो फ़रमाँबरदारी से अल्लाह के क़ुर्ब की तलब करते हैं और अल्लाह तआला करामत और बुज़ुर्गी से उनके काम बनाता है,

या वो जिन की हिदायत के प्रमाण के साथ अल्लाह कफ़ील हो और वो उसकी बन्दगी का हक़ अदा करने और उसकी सृष्टि पर रहम करने के लिये वक़्फ हो गए. ये अर्थ और इबारतें अगरचे विभिन्न हैं लेकिन उनमें विरोधाभास कुछ भी नहीं है क्योंकि हर एक इबारत में वली की एक एक विशेषता बयान कर दी गई है जिसे अल्लाह का क़ुर्ब हासिल होता है. ये तमाम विशेषताएं और गुण उसमें होते हैं. विलायत के दर्जों और मरतबों में हर एक अपने दर्जें के हिसाब से बुज़ुर्गी और महानता रखता है.

(5) इस ख़ुशख़बरी से या तो वह मुराद है जो परहेज़गार ईमानदारों को क़ुरआन शरीफ़ में जा बजा दी गई है या बेहतरीन ख़्वाब मुराद हैं जो मूमिन देखता है या उसके लिये देखा जाता है जैसा कि बहुत सी हदीसों में आया है और इसका कारण यह है कि वली का दिल और उसकी आत्मा दोनों अल्लाह के ज़िक्र में डूबे रहते हैं. तो ख़्वाब के वक़्त अल्लाह के ज़िक्र के सिवा उसके दिल में कुछ नहीं होता. इसलिये वली जब ख़्वाब देखता है तो उसका ख़्वाब सच्चा और अल्लाह तआला की तरफ़ से उसके हक़ में ख़ुशख़बरी होती है. कुछ मुफ़स्सिरों ने इस ख़ुशख़बरी से दुनिया की नेकनामी भी मुराद ली है. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अर्ज़ किया गया, उस शख़्स के लिये क्या इरशाद फ़रमाते हैं जो नेक कर्म करता है और लोग उसकी तारीफ़ करते हैं. फ़रमाया यह मूमिन के लिये ख़ुशख़बरी है. उलमा फ़रमाते हैं कि यह ख़ुशख़बरी अल्लाह की रज़ा और  अल्लाह के महब्बत फ़रमाने और सृष्टि के दिल में महब्बत डाल देने की दलील है, जैसा कि हदीस में आया है कि उसको ज़मीन में मक़बूल कर दिया जाता है. क़तादा ने कहा कि फ़रिश्ते मौत के समय अल्लाह तआला की तरफ़ से ख़ुशख़बरी देते हैं. अता का क़ौल है कि दुनिया की ख़ुशख़बरी तो वह है जो फ़रिश्ते मौत के समय सुनाते हैं और आख़िरत की ख़ुशख़बरी वह है जो मूमिन को जान निकलने के बाद सुनाई जाती है कि उससे अल्लाह राज़ी है.

(6) उसके वादे ख़िलाफ़ नहीं हो सकते जो उसने अपनी किताब में और अपने रसूलों की ज़बान से अपने वलियों और अपने फ़रमाँबरदार बन्दों से फ़रमाए.

(7) इसमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली फ़रमाई गई कि काफ़िर बदनसीब, जो आपको झुटलाते है और आपके ख़िलाफ़ बुरे बुरे मशवरे करते हैं, उसका कुछ ग़म न फ़रमाएं.

(8) वह जिसे चाहे इज़्ज़त दे और जिसे चाहे ज़लील करे. ऐ सैयदुल अम्बिया, वह आपका नासिर और मददगार है. उसने आपको और आपके सदक़े मे आपके फ़रमाँबरदारों को इज़्ज़त दी, जैसा कि दूसरी आयत में फ़रमाया कि अल्लाह के लिये इज़्ज़त है और उसके रसूल के लिये और ईमान वालों के लिये.

(9) सब उसके ममलूक अर्थात ग़ुलाम हैं. उसके तहत क़ुदरत और अधिकार, और जो ग़ुलाम है वह रब नहीं हो सकता. इसलिये अल्लाह के सिवा हर एक को पूजना ग़लत है. यह तौहीद की एक ऊमदा दलील है.

(10) यानी किस दलील का अनुकरण करते हैं. मुराद यह है कि उनके पास कोई दलील नहीं.

(11) और बेदलील केवल ग़लत गुमान से अपने बातिल और झूठे मअबूदों को ख़ुदा का शरीक ठहराते हैं, इसके बाद अल्लाह तआला अपनी क़ुदरत और नेअमत का इज़हार फ़रमाता है.

(12) और आराम करके दिन की थकन दूर करो.

(13) रौशन, ताकि तुम अपनी ज़रूरतों और रोज़ी रोटी के सामान पूरे कर सको.

(14) जो सुनें और समझें कि जिसने इन चीज़ों को पैदा किया, वही मअबूद है. उसका कोई शरीक नहीं. इसके बाद मुश्रिकों का एक कथन ज़िक्र फ़रमाता है.

(15) काफ़िरों का यह कलिमा अत्यन्त बुरा और इन्तिहा दर्जे की आज्ञानता का है. अल्लाह तआला इसका रद फ़रमाता है.

(16) यहाँ मुश्रिकों के इस कथन के तीन रद फ़रमाए, पहला रद तो कलिमए सुब्हानहू में है जिसमें बताया गया कि उसकी ज़ात बेटे या औलाद से पाक है कि वाहिदे हक़ीक़ी है, दूसरा रद हुवल ग़निय्यों फ़रमाने में है कि वह तमाम सृष्टि से बेनियाज़ है, तो औलाद उसके लिये कैसे हो सकती है. औलाद तो या कमज़ोर चाहते है जो उससे क़ुव्वत हासिल करें या फ़क़ीर चाहता है जो उससे मदद ले या ज़लील चाहता है जो उसके ज़रीये इज़्ज़त हासिल करे. ग़रज़ जो चाहता है वह हाजत रखता है. तो जो ग़नी हो या ग़ैर मोहताज़ हो उसके लिये औलाद किस तरह हो सकती है. इसके अलावा बेटा वालिद का एक हिस्सा होता है, तो वालिद होना, मिश्रित होना ज़रूरी, और मिश्रित होना संभव होने को, और हर संभव ग़ैर का मोहताज़ है, तो हादिस हुआ, लिहाज़ा मुहाल हुआ कि ग़नी क़दीम के बेटा हो, तीसरा रद लूह मा फ़िस्समावाते वमा फ़िल अर्दे मे है कि सारी सृष्टि उसकी ममलूक है और ममलूक होना बेटा होने के साथ नहीं जमा होता, लिहाज़ा उनमें से कोई उसकी औलाद नहीं हो सकती.

सूरए यूनुस -आठवाँ रूकू

सूरए यूनुस -आठवाँ रूकू

और उन्हें नूह की ख़बर पढ़कर सुनाओ बस उसने अपनी क़ौम से कहा ऐ मेंरी क़ौम अगर तुमपर शाक़ (भारी) गुज़रा है मेरा खड़ा होना (1)
और अल्लाह की निशानियाँ याद दिलाना (2)
तो मैं ने अल्लाह ही पर भरोसा किया (3)
तो मिलकर काम करो और अपने झूटे मअबूदों समेत अपना काम पक्का कर लो तुम्हारे काम में तुमपर कुछ गुंजलक न रहे फिर जो हो सके मेरा कर लो और मुझे मुहलत न दो (4){71}
फिर अगर तुम मुंह फेरो(5)
तो मैं तुम से कुछ उजरत नहीं मांगता (6)
मेरा अज्र (फल, बदला) तो नहीं मगर अल्लाह पर और (7)
और मुझे हुक्म है कि मैं मुसलमानों से हूँ {72} तो उन्होंने उसे(8)
झूटलाया तो हमने उसे और जो उसके साथ किश्ती में थे उसको निजात दी और उन्हें हमने नायब (प्रतिनिधि) किया (9)
और जिन्होंने हमारी आयतें झुटलाई उनको हमने डुबो दिया तो देखो डराए हुओ का अंजाम कैसा हुआ{73} फिर उसके बाद और रसूल (10)
हमने उनकी क़ौम की तरफ़ भेजे तो वो उनके पास रौशन दलीलें लाए तो वो ऐसे न थे कि ईमान लाते उसपर जिसे पहले झुटला चुके थे, हम यूंही मुहर लगा देते हैं सरकशों के दिलों पर {74} फिर उनके बाद हमने मूसा और हारून को फ़िरऔन और उसके दरबारियों की तरफ़ अपनी निशानियाँ लेकर भेजा तो उन्होंने घमण्ड किया और वो मुजरिम लोग थे{75} तो जब उनके पास हमारी तरफ़ से हक़ आया (11)
बोले यह तो ज़रूर खुला जादू है {76} मूसा ने कहा क्या हक़ की निस्बत ऐसा कहते हो जब वह तुम्हारे पास आया क्या यह जादू है  (12)
और जादूगर मुराद को नही पहुंचते (13){77}
बोले क्या तुम हमारे पास इसलिये आए हो कि हमें उससे (14)
फेर दो जिसपर हमने अपने बाप दादा को पाया और ज़मीन में तुम्हारी दोनों की बड़ाई रहे और हम तुमपर ईमान लाने के नहीं{78} और फ़िरऔन (15)
बोला हर जादूगर इल्म वाले को मेरे पास ले आओ {79} फिर जब जादूगर आए उनसे मूसा ने कहा डालो जो तुम्हें डालना है (16){80}
फिर जब उन्होंने डाला मूसा ने कहा यह जो तुम लाए यह जादू है (17)
अब अल्लाह इसे बातिल कर देगा, अल्लाह फ़साद वालों का काम नहीं बनाता {81} और अल्लाह अपनी बातों से (18)
हक़ को हक़ कर दिखाता है पड़े बुरा माने मुजरिम {82}

सूरए यूनुस -आठवाँ रूकू तफ़सीर 

(1) और लम्बी मुद्दत तक तुममें ठहरना.

(2) और इसपर तुमने मेरे क़त्ल करने और निकाल देने का इरादा किया है.

(3) और अपना मामला उस एक अल्लाह के सुपुर्द किया जिसका कोई शरीक नहीं.

(4) मुझे कुछ परवाह नहीं हैं. हज़रत नूह अलैहिस्सलाम का यह कलाम विनम्रता के तौर पर है. मतलब यह है कि मुझे अपने क़ुदरत वाले, क़ुव्वत वाले परवर्दिगार पर पूरा पूरा भरोसा है, तुम और तुम्हारे बे इख़्तियार मअबूद मुझे कुछ नुक़सान नहीं पहुंचा सकते.

(5) मेरी नसीहत से.

(6) जिसके फ़ौत होने का मुझे अफ़सोस है.

(7) वही मुझे बदला देगा. मतलब यह है कि मेरा उपदेश और नसीहत ख़ास अल्लाह के लिये है किसी दुनिया की ग़रज़ से नहीं.

(8) यानी हज़रत नूह अलैहिस्सलाम को.

(9) और हलाक होने वालों के बाद ज़मीन में ठहराया.

(10) हूद, सालेह, इब्राहीम, लूत, शुऐब वग़ैरहुम, अलैहिस्सलाम.

(11) हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के वास्ते से, और फ़िरऔनियों ने पहचान कर, कि ये सत्य है, अल्लाह की तरफ़ से है, तो नफ़्सानियत और हठधर्मी से.

(12) हरगिज़ नहीं.

(13) फ़िरऔनी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से.

(14) दीन व मिल्लत और बुत परस्ती व फ़िरऔन परस्ती.

(15) सरकश और घमण्डी ने चाहा कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के चमत्कार का मुक़ाबला बातिल से करे और दुनिया को इस भ्रम में डाले कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के चमत्कार जादू की क़िस्म से हैं इसलिये वह.

(16) रस्से शहतीर वग़ैरह और जो तुम्हें जादू करना है करो. यह आपने इसलिये फ़रमाया कि हक़ और बातिल, सच और झूठ ज़ाहिर हो जाए और जादू के कमाल, जो वो करने वाले हैं, उनका फ़साद साफ़ खुल कर सामने आ जाए.

(17) न कि वो आयतें और अल्लाह की निशानियाँ, जिनको फ़िरऔन ने अपनी बे ईमानी से जादू बताया.

(18) यानी अपने हुक्म, अपनी क्षमता और क़ुदरत और अपने इस वादे से कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को जादूगरों पर ग़ालिब करेगा.

सूरए यूनुस -नवाँ रूकू

सूरए यूनुस -नवाँ रूकू

तो मूसा पर ईमान न लाए मगर उसकी क़ौम की औलाद से कुछ लोग (1)
फ़िरऔन और उसके दरबारियों से डरते हुए कि कहीं उन्हें (2)
हटने पर मजबूर न कर दें और बेशक फ़िरऔन ज़मीन पर सर उठाने वाला था, और बेशक वह हद से गुज़र गया  (3){83}
और मूसा न कहा ऐ मेरी क़ौम अगर तुम अल्लाह पर ईमान लाए तो उसी पर भरोसा करो(4)
अगर तुम इस्लाम रखते हो{84} बोले हमने अल्लाह ही पर भरोसा किया, इलाही हमको ज़ालिम लोगों के लिये आज़माइश न बना(5){85}
और अपनी रहमत फ़रमाकर हमें काफ़िरों से निजात दे(6){86}
और हमने मूसा और उसके भाई को वही भेजी कि मिस्र में अपनी क़ौम के लिये मकानात बनाओ और अपने घरों को नमाज़ की जगह करो(7)
और नमाज़ क़ायम रखो और मुसलमानों को ख़ुशख़बरी सुनाओ (8){87}
और मूसा ने अर्ज़ की ऐ रब हमारे तूने फ़िरऔन और उसके सरदारों को आरायश(अलंकार) (9)
और माल दुनिया की ज़िन्दगी में दिये ऐ रब हमारे इसलिये कि तेरी राह से बहकावें, ऐ रब हमारे उनके माल बर्बाद कर दे(10)
और उनके दिल सख़्त करदे कि ईमान न लाएं जब तक दर्दनाक अज़ाब न देख लें (11){88}
फ़रमाया तुम दोनों की दुआ क़ुबूल हुई (12)
तुम साबित क़दम रहो नादानों की राह न चलो{89} और हम बनी इस्राईल को दरिया पार ले गए तो फ़िरऔन और उसके लश्करों ने उनका पीछा किया सरकशी और ज़ुल्म से यहां तक कि जब उसे डूबने ने आ लिया(15)
बोला में ईमान लाया कि कोई सच्चा मअबूद नहीं सिवा उसके जिसपर बनी इस्राईल ईमान लाए और मैं मुसलमान हूँ (16){90}
क्या अब (17)
और पहले से नाफ़रमान रहा और तू फ़सादी था (18){91}
आज हम तेरी लाश को उतरा देंगे(बाक़ी रखेंगे) कि तू अपने पिछलों के लिये निशानी हो (19)
और बेशक लोग हमारी आयतों से ग़ाफ़िल हैं{92}

सूरए यूनुस -नवाँ रूकू तफ़सीर 

(1) इसमें नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली है कि आप अपनी उम्मत के ईमान लाने का बहुत एहतिमाम फ़रमाते थे, और उनके मुंह फेर लेने से दुखी हो जाते थे, आपकी तसल्ली फ़रमाई गई कि हालांकि

हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने इतना बड़ा चमत्कार दिखाया, फिर भी थोड़े लोगो ने ईमान क़ुबूल किया. ऐसी हालतें नबियों को पेश आती रही हैं. आप अपनी उम्मत के मुंह फेर लेने से रंजीदा न हों. मिन क़ौमिही में जो ज़मीर है, वह या तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की तरफ़ पलटता है, उस सूरत में क़ौम की सन्तान से बनी इस्राईल मुराद होंगे जिनकी औलाद मिस्र में आपके साथ थी. एक क़ौल यह है कि इससे वो लोग मुराद हैं जो फ़िरऔन के क़त्ल से बच रहे थे क्योंकि जब बनी इस्राईल के लड़के फ़िरऔन के हुक्म पर क़त्ल किये जाते थे तो बनी इस्राइल की कुछ औरतें जो फ़िरऔन की औरतों से कुछ मेल जोल रखती थीं, वो जब बच्चा जनती थीं तो उसकी जान के डर से वह बच्चा फ़िरऔनी क़ौम की औरतों को दे डालतीं. ऐसे बच्चे जो फ़िरऔनियों के घरों में पले थे, उस रोज़ हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर ईमान ले आए जिस दिन अल्लाह तआला ने आपको जादूगरों पर विजय अता की थी. एक क़ौल यह है कि यह ज़मीर फ़िरऔन की तरफ़ पलटती है, और फ़िरऔनी क़ौम की सन्तान मुराद है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि वह फिरऔनी क़ौम के थोड़े लोग थे जो ईमान लाए.

(2) दीन से.

(3) कि बन्दा होकर ख़ुदाई का दावेदार हुआ.

(4) वह अपने फ़रमाँबरदारों की मदद और दुश्मनों को हलाक फ़रमाता है. इस आयत से साबित हुआ कि अल्लाह पर भरोसा करना ईमान के कमाल का तक़ाज़ा है.

(5) यानी उन्हें हमपर ग़ालिब न कर, ताकि वो ये गुमान न करें कि वो हक़ पर हैं.

(6) और उनके ज़ुल्म और सितम से बचा.

(7) कि क़िबले की तरफ़ मुँह करो. हज़रत मूसा और हज़रत हारून अलैहिस्सलाम का क़िबला काबा शरीफ़ था और शुरू में बनी इस्राईल को यही हुक्म था कि वो घरों में छुप कर नमाज़ पढ़ें ताकि फ़िरऔनियों की शरारत और तक़लीफ़ से सुरक्षित रहे.

(8) अल्लाह की मदद की और जन्नत की.

(9) उमदा लिबास, नफ़ीस फ़र्श, कीमती ज़ेवर, तरह तरह के सामान.

(10) कि वो तेरी नेअमतों पर शुक्र के बजाय दिलेर और जरी होकर गुनाह करते हैं. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की यह दुआ क़ुबूल हुई और फ़िरऔनियों के दिरहम व दीनार वग़ैरह पत्थर होकर रह गए. यहाँ तक कि फल और खाने की चीज़ें भी और ये उन निशानियों में से एक है जो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को दी गई थीं.

(11) जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम उन लोगों के ईमान लाने से निराश हो गए तब आपने उनके लिये यह दुआ की. और ऐसा ही हुआ कि वो डूबने के वक़्त तक ईमान न लाए. इससे मालूम हुआ कि किसी शख़्स के लिये कुफ़्र पर मरने की दुआ करना कुफ़्र नहीं है.(मदारिक)

(12) दुआ की निस्बत हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम व हज़रत हारून अलैहिस्सलाम दोनों की तरफ़ की गई हालांकि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम दुआ करते थे और हज़रत हारून अलैहिस्सलाम आमीन कहते थे. इससे मालूम हुआ कि आमीन कहने वाला भी दुआ करने वालों में गिना जाता है. यह भी साबित हुआ कि क़ुबूल होने के बीच चालीस बरस का फ़ासला हुआ.

(13) दावत और तबलीग़ पर.

(14) जो दुआ के क़ुबूल होने में देर होने की हिकमत नहीं जानते.

(15) तब फ़िरऔन.

(16) फ़िरऔन ने क़ुबूल होने की तमन्ना के साथ ईमान का मज़मून तीन बार दोहरा कर अदा किया लेकिन यह ईमान क़ुबूल न हुआ क्योंकि फ़रिश्तों और अज़ाब के देखने के बाद ईमान मक़बूल नहीं. अगर इख़्तियार की हालत में वह एक बार भी यह कलिमा कहता तो उसका ईमान क़ुबूल कर लिया जाता. लेकिन उसने वक़्त खो दिया. इसलिये उससे यह कहा गया जो आयत में आगे बयान किया गया है.

(17) बेचैनी की हालत में, जबकि ग़र्क़ में जकड़ा गया है और ज़िन्दगी की उम्मीद बाक़ी नहीं रही, उस वक़्त ईमान लाता है.

(18) ख़ुद गुमराह था, दूसरों को गुमराह करता था. रिवायत है कि एक बार हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम फ़िरऔन के पास एक सवाल लाए जिसका मज़मून यह था कि बादशाह का क्या हुक्म है ऐसे ग़ुलाम के बारे में जिसने एक शख़्स के माल व नेअमत में परवरिश पाई फिर उसकी नाशुक्री की और उसके हक़ का इन्कारी हो गया और अपने आप मौला होने का दावेदार बन गया. इसपर फ़िरऔन ने यह जवाब लिखा कि जो ग़ुलाम अपने आक़ा की नेअमतों का इन्कार करे और उसके मुक़ाबले में आए उसकी सज़ा यह है कि उसको दरिया में डुबो दिया जाए. जब फ़िरऔन डूबने लगा तो हज़रत जिब्रील ने वही फ़तवा उसके सामने कर दिया और उसने उसको पहचान लिया.

(19) तफ़सीर के उलमा कहते हैं कि जब अल्लाह तआला ने फ़िरऔन और उसकी क़ौम को डुबाया और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम को उनकी हलाकत की ख़बर दी तो कुछ बनी इस्राईल को शुबह रहा और फ़िरऔन की महानता और हैबत जो उनके दिलों में थी उसके कारण उन्हें उसकी हलाकत का यक़ीन न आया. अल्लाह के हुक्म से दरिया ने फ़िरऔन की लाश किनारे पर फैंक दी. बनी इस्राईल ने उसको देखकर पहचाना.

सूरए यूनुस -दसवाँ रूकू

सूरए यूनुस -दसवाँ रूकू

और बेशक हमने बनी इस्राईल को इज़्ज़त की जगह दी(1)
और उन्हें सुथरी रोज़ी अता की तो इख़्तिलाफ़ में न पड़े(2)
मगर इल्म आने के बाद (3)
बेशक तुम्हारा रब क़यामत के दिन उनमें फैसला कर देगा जिस बात में झगड़ते थे(4){93}
और ऐ सुनने वाले अगर तुझे कुछ शुबह हो उसमें जो हमने तेरी तरफ़ उतारा(5)
तो उनसे पूछ देख जो तुम से पहले किताब पढ़ने वाले हैं(6)
बेशक तेरे पास तेरे रब की तरफ़ से हक़ आया(7)
तो तू हरगिज़ शक वालों में न हो{94} और हरगिज़ उनमें न होना जिन्होंने अल्लाह की आयतें झुटलाईं कि तू ख़सारे (घाटे) वालों में हो जाएगा {95} बेशक वो जिनपर तेरे रब की बात ठीक पड़ चुकी है(8)
ईमान न लाएंगे {96} अगरचे सब निशानियाँ उनके पास आईं जब तक दर्दनाक अज़ाब न देख लें(9){97}
तो हुई होती न कोई बस्ती (10)
कि ईमान लाती (11)
तो उसका ईमान काम आता हाँ यूनुस की क़ौम जब ईमान लाए हमने उनसे रूसवाई का अज़ाब दुनिया की ज़िन्दगी में हटा दिया और एक वक़्त तक उन्हें बरतने दिया(12){98}
और अगर तुम्हारा रब चाहता ज़मीन में जितने हैं सबके सब ईमान ले आते(13)
तो क्या तुम लोगों को ज़बरदस्ती करोगे यहाँ तक कि मुसलमान हो जाएं(14){99}
और किसी जान की क़ुदरत नहीं कि ईमान ले आए मगर अल्लाह के हुक्म से(15)
और अज़ाब उनपर डालता है जिन्हें अक़्ल नहीं{100} तुम फ़रमाओ देखो(16)
आसमानों और ज़मीन में क्या है(17)
और आयतें और रसूल उन्हें कुछ नहीं देते जिनके नसीब में ईमान नहीं {101} तो उन्हें काहे का इन्तिज़ार है मगर उन्हीं लोगों के से दिनों का जो उनसे पहले हो गुज़रे(18)
तुम फ़रमाओ तो इन्तिज़ार करो मैं भी तुम्हारे साथ इन्तिज़ार में हूँ (19){102}
फिर हम अपने रसूलों और ईमान वालों को निजात देंगे, बात यही है हमारे करम के ज़िम्मे पर हक़ है मुसलमानों को निजात देना{103}

सूरए यूनुस -दसवाँ रूकू तफ़सीर 

(1) इज़्ज़त की जगह से या तो मिस्र देश और फ़िरऔनियों की सम्पत्तियाँ मुराद है या शाम प्रदेश और क़ुदस व उर्दुन जो अत्यन्त हरे भरे और उपजाऊ इलाक़े हैं.

(2) बनी इस्राईल, जिनके साथ ये घटनाएं हो चुकीं.

(3) इल्म से मुराद यहाँ या तो तौरात है जिसके मानी में यहूदी आपस में मतभेद रखते थे, या सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तशरीफ़ आवरी है कि इससे पहले तो यहूदी आपके मानने वाले और आपकी नबुव्वत पर सहमत थे और तौरात में जो आपकी विशेषताएं दर्ज थीं उनको मानते थे. लेकिन तशरीफ़ लाने के बाद विरोध करने लगे, कुछ ईमान लाए और कुछ लोगों ने हसद और दुश्मनी से कुफ़्र किया. एक क़ौल यह है कि इल्म से क़ुरआन मुराद है.

(4) इस तरह कि ऐ नबियों के सरदार, आप पर ईमान लाने वालों को जन्नत में दाख़िल फ़रमाएगा और आपका इन्कार करने वालों को जहन्नम में अज़ाब देगा.

(5) अपने रसूल मुहम्मदे मुस्तफ़ा सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के वास्ते से.

(6) यानी किताब वालों के उलमा जैसे हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम और उनके साथी, ताकि वो तुझको सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत का इत्मीनान दिलाएं और आपकी नात और तारीफ़, जो तौरात में लिखी है, वह सुनाकर शक दूर करें. शक इन्सान के नज़दीक किसी बात में दोनों तरफ़ों का बराबर होना है, चाहे वह इस तरह हो कि दोनों तरफ़ बराबर क़रीने पाएं जाएं. चाहे इस तरह कि किसी तरफ़ भी कोई क़रीना न हो तहक़ीक़ करने वालों के नज़दीक शक जिहालत की क़िस्मों से है और जिहालत और शक में आम व ख़ास मुतलक़ की निस्बत है कि हर एक शक जिहालत है और जिहालत शक नहीं.

(7) जो साफ़ प्रमाणों और रौशन निशानियों से इतना रौशन है कि उसमें शक की मजाल नहीं.

(8) यानी वह क़ौल उनपर साबित हो चुका जो लौहे मेहफ़ूज़ में लिख दिया गया है और जिसकी फ़रिश्तों ने ख़बर दी है कि ये लोग काफ़िर मरेंगे, वो.

(9) और उस वक़्त का ईमान लाभदायक नहीं.

(10) उन बस्तियों में से जिनको हमने हलाक़ किया.

(11) क़ौमे यूनुस का हाल यह है कि नैनवा प्रदेश मूसल में ये लोग रहते थे और क़ुफ़्र व शिर्क में जकड़े हुए थे. अल्लाह तआला ने हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम को उनकी तरफ़ भेजा. आपने उनको बुत परस्ती छोड़ने और ईमान लाने का हुक्म दिया. उन लोगों ने इन्कार किया. हज़रत युनूस अलैहिस्सलाम को झुटलाया. आपने उन्हें अल्लाह के हुक्म से अज़ाब उतरने की ख़बर दी. उन लोगों ने आपस में कहा कि हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम ने कभी कोई बात ग़लत नहीं कही है देखो अगर वह रात को यहाँ रहे जब तो कोई अन्देशा नहीं और अगर उन्होंने रात यहाँ न गुज़ारी तो समझ लेना चाहिये कि अज़ाब आएगा. रात में हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम वहाँ से तशरीफ़ ले गए. सुबह को अज़ाब के चिन्ह ज़ाहिर हो गए. आसमान पर काला डरावना बादल आया और बहुत सा धुंआ जमा हुआ. सारे शहर पर छा गया. यह देखकर उन्हें यक़ीन हो गया कि अज़ाब आने वाला है. उन्होंने हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम की तलाश की और आपको न पाया. अब उन्हें और ज़्यादा डर हुआ तो वो अपने बच्चों औरतों और जानवरों के साथ जंगल को निकल गए. मोटे कपड़े पहने और तौबह व इस्लाम का इज़हार किया. शौहर से बीबी और माँ से बच्चे अलग हो गए और सब ने अल्लाह की बारगाह में रोना और गिड़गिड़ाना शुरू किया और कहा, जो यूनुस अलैहिस्सलाम लाए, हम उस पर ईमान लाए और सच्ची तौबह की. जो अत्याचार उनसे हुए थे उनको दूर किया. पराए माल वापस किये, यहाँ तक कि अगर एक पत्थर दूसरे का किसी की बुनियाद में लग गया था तो बुनियाद उखाड़ कर पत्थर निकाल दिया और वापस कर दिया. और अल्लाह तआला से सच्चे दिल से मग़फ़िरत की दुआएं की. अल्लाह तआला ने उनपर रहम किया. दुआ क़ुबूल फ़रमाई, अज़ाब उठा दिया गया. यहाँ यह सवाल पैदा होता है कि जब अज़ाब उतरने के बाद फ़िरऔन का ईमान और उसकी तौबह क़ुबूल न हुई, क़ौमे यूनुस की तौबह क़ुबूल फ़रमाने और अज़ाब उठा देने में क्या हिकमत है. उलमा ने इसके कई जवाब दिये हैं. एक तो यह कि यह ख़ास करम था, हज़रत यूनुस की क़ौम के साथ. दूसरा जवाब अज़ाब यह है कि फ़िरऔन अज़ाब में जकड़े जाने के बाद ईमान लाया, जब ज़िन्दगी की उम्मीद ही बाक़ी न रही और क़ौमे यूनुस से जब अज़ाब क़रीब हुआ तो वो उसमें मुबतिला होने से पहले ईमान ले आए और अल्लाह दिलों का हाल जानने वाला है. सच्चे दिल वालों की सच्चाई और आचार का उसको इल्म है.

(13) यानी ईमान लाना पहले से लिखी ख़ुशनसीबी पर निर्भर है. ईमान वही लाएंगे जिनको अल्लाह तआला इसकी तौफ़ीक़ अता फ़रमाएगा. इसमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो वसल्लम की तसल्ली है कि आप चाहते है कि सब ईमान ले आएं और सीधी राह इख़्तियार करें. फिर जो ईमान से मेहरूम रह जाते हैं उनका आपको ग़म होता है. इसका आपको ग़म न होना चाहिये, क्योंकि जो पहले से बुरे दिल वाला लिखा हुआ है, वह ईमान न लाएगा.

(14) और ईमान में ज़बरदस्ती नहीं हो सकती क्योंकि ईमान होता है तस्दीक़ और इक़रार से, और ज़बरदस्ती या दबावसे दिल की तस्दीक़ हासिल नहीं होती.

(15) उसकी मर्जी़ से.

(16) दिल की आँखो से और ग़ौर करो कि.

(17) जो अल्लाह तआला के एक होने का प्रमाण देता है.

(18) नूह, आद व समूद वग़ैरह की तरह.

(19) कि तुम्हारी हलाकत और अज़ाब के. रबीअ बिन अनस ने कहा कि अज़ाब का डर दिलाने के बाद अगली आयत में यह बयान फ़रमाया कि जब अज़ाब होता है तो अल्लाह तआला रसूल को और उनके साथ ईमान लाने वालों को निजात अता फ़रमाता है.

सूरए यूनुस- ग्यारहवाँ रूकू

सूरए यूनुस- ग्यारहवाँ रूकू

तुम फ़रमाओ ऐ लोगो अगर तुम मेरे दीन की तरफ़ से किसी शुबह में हो तो मैं तो उसे न पूजूंगा जिसे तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो (1)
हाँ उस अल्लाह को पूजता हूँ जो तुम्हारी जान निकालेगा(2)
और मुझे हुक्म है कि ईमान वालों में हूँ{104} और यह कि अपना मुंह दीन के लिये सीधा रख सबसे अलग होकर (3)
और हरगिज़ शिर्क वालों में न होना {105} और अल्लाह के सिवा उसकी बन्दगी न कर जो न तेरा भला कर सके न बुरा, फिर अगर ऐसा करे तो उस वक़्त तू ज़ालिमों में होगा{106} और अगर तुझे अल्लाह कोई तकलीफ़ पहुंचाए तो उसका कोई टालने वाला नहीं उसके सिवा, और अगर तेरा भला चाहे तो उसके फ़ज़्ल (कृपा) का रद करने वाला कोई नहीं (4)
उसे पहुंचता है अपने बन्दों में जिसे चाहे, और वही बख़्शने वाला मेहरबान है {107} तुम फ़रमाओ ऐ लोगो तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से हक़ आया (5)
तो जो राह पर आया वह अपने भले को राह पर आया(6)
और जो बहका वह अपने बुरे को बहका,(7)
और कुछ में करोड़ा नहीं(8){108}
और उस पर चलो जो तुमपर वही होती है और सब्र करो (9)
यहाँ तक कि अल्लाह हुक्म फ़रमाए (10)
और वह सबसे बेहतर हुक्म फ़रमाने वाला है (11){109}

तफ़सीर सूरए यूनुस- ग्यारहवाँ रूकू

(1) क्योंकि वह मख़लूक़ है, इबादत के लायक़ नहीं.

(2) क्योंकि वह क़ादिर, मुख़्तार, सच्चा मअबूद, इबादत के लायक़ है.

(3) यानी सच्चे दिल से मूमिन रहो.

(4) वही नफ़ा नुक़सान का मालिक है. सारी सृष्टि उसी की मोहताज़ है. वही हर चीज़ पर क़ादिर और मेहरबानी व रहमत वाला है. बन्दों को उसकी तरफ़ रग़बत और उसका ख़ौफ़ और उसी पर भरोसा और उसी पर विश्वास चाहिये और नफ़ा नुक़सान जो कुछ भी है वही.

(5)हक़ से यहाँ क़ुरआन मुराद है या इस्लाम या सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

(6) क्योंकि इसका लाभ उसी को पहुंचेगा.

(7) क्योंकि उसका वबाल उसी पर है.

(8) कि तुमपर ज़बरदस्ती करूं.

(9)काफ़िरों के झुटलाने और उनके तकलीफ़ पहुंचाने पर.

(10) मुश्रिकों से जंग करने और किताबियों से जिज़िया लेने का.

(11) कि उसके हुक्म में ग़लती और ख़ता की गुंजायश नहीं और वह बन्दों के खुले छुपे हालात सबका जानने वाला है. उसका फ़ैसला दलील और गवाह का मोहताज नहीं.

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दुश्मन से बचने की दुआ इन हिंदी दुश्मन से बचने .

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surah Nisa in hindi

सूरए निसा

सूरए निसा 
सूरए (1) निसा मदीने में उतरी, आयतें 176, रूकू चौबीस, 
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला 

सूरए निसा – पहला रूकू

ऐ लोगों (2)
अपने रब से डरो जिसने तुम्हें एक जान से पैदा किया (3)
और उसी में उसका जोड़ा बनाया और उन दोनों से बहुत से मर्द व औरत फैला दिये और अल्लाह से डरो जिसके नाम पर मांगते हो और रिश्तों का लिहाज़ रखो(4)
बेशक अल्लाह हर वक़्त तुम्हें देख रहा है (1)और यतीमों को उनके माल दो (5)
और सुथरे(6)
के बदले गन्दा न लो(7)
और उनके माल अपने मालों में मिला कर न खा जाओ बेशक यह बड़ा गुनाह है (2) और अगर तुम्हें डर हो कि यतीम (अनाथ) लड़कियों में इन्साफ़ न करोगे (8)
तो निकाह में लाओ जो औरतें तुम्हें ख़ुश आऐं दो दो और तीन तीन और चार चार (9)
फिर अगर डरो कि दो बीवियों को बराबर न रख सकोगे तो एक ही करो या कनीज़े (दासियां) जिनके तुम मालिक हो पर उससे ज़्यादा क़रीब है कि तुम से ज़ुल्म न हो  (10)(3)
और औरतों को उनके मेहर ख़ुशी से दो(11)
फिर अगर वो अपने दिल की ख़ुशी से मेहर में से तुम्हें कुछ दें तो उसे खाओ रचता पचता (12) (4)
और बेअक़्लों को (13)
उनके माल न दो जो तुम्हारे पास हैं जिनको अल्लाह ने तुम्हारी बसर औक़ात (गुज़ारा) किया है और उन्हें उसमें से खिलाओ और पहनाओ और उनसे अच्छी बात कहो (14) (5)
और यतीमों को आज़माते रहो  (15)
यहां तक कि जब वह निकाह के क़ाबिल हों तो अगर तुम उनकी समझ ठीक देखो तो उनके माल उन्हें सुपुर्द कर दो और उन्हें न खाओ हद से बढ़कर और इस जल्दी में कि कहीं बड़े न हो जाएं और जिसे हाजत (आवश्यकता) न हो वह बचता रहे (16)
और जो हाजत वाला हो वह मुनासिब हद तक खाए फिर जब तुम उनके माल उन्हें सुपुर्द करो तो उनपर गवाह कर लो और अल्लाह काफ़ी है हिसाब लेने को (6) मर्दों के लिये हिस्सा है उसमें से जो छोड़ गए मां बाप और क़रावत (रिश्तेदार) वाले और औरतों के लिये हिस्सा है उसमें से जो छोड़ गए मां बाप  और क़रावत वाले तर्का (माल व जायदाद) थोड़ा हो या बहुत, हिस्सा है अन्दाज़ा बांधा हुआ(17) (7)
फिर बांटते वक़्त अगर रिश्तेदार और यतीम और मिस्कीन (दरिद्र) (18)
आजाएं तो उसमें से उन्हें भी कुछ दो  (19)
और उनसे अच्छी बात कहो (20) (8)
और डरें (21) वो लोग अगर अपने बाद कमज़ोर औलाद छोड़ते तो उनका कैसा उन्हें ख़तरा होता तो चाहिये कि अल्लाह से डरें (22)
और सीधी बात करें (23)  (9)
वो जो यतीमों का माल नाहक़ खाते हैं वो तो अपने पेट में निरी आग भरते हैं (24)
और कोई दम जाता है कि भड़कते धड़े में जाएंगे (10)

surah nisa ruku 1

तफ़सीर : 
सूरए निसा – पहला रूकू

(1) सूरए निसा मदीनए तैय्यिबह में उतरी, इसमें 24 रूकू, 176 आयतें, 3045 कलिमे और 16030 अक्षर हैं.

(2) ये सम्बोधन आया है तमाम आदमी की औलाद को.

(3) अबुल बशर हज़रत आदम से, जिनको माँ बाप के बग़ैर मिट्टी से पैदा किया था. इन्सान की पैदाइश के आरम्भ का बयान करके अल्लाह की क़ुदरत की महानता का बयान फ़रमाया गया. अगरचे दुनिया के बेदीन अपनी बेअक़्ली और नासमझी से इसका मज़ाक़ उड़ाते हैं लेकिन समझ वाले और अक़्ल वाले जानते हैं कि ये मज़मून ऐसी ज़बरदस्त बुरहान से साबित है जिसका इन्कार असभंव है. जन गणना का हिसाब बता देता है कि आज से सौ बरस पहले दुनिया में इन्सानों की संख्या आज से बहुत कम थी और इससे सौ बरस पहले और भी कम. तो इस तरह अतीत की तरफ़ चलते चलते इस कमी की हद एक ज़ात क़रार पाएगी या यूँ कहिये कि क़बीलों की बहुसंख्या एक व्यक्ति की तरफ़ ख़त्म हो जाती है. मसलन, सैयद दुनिया में करोड़ो पाए जाएंगे मगर अतीत की तरफ़ उनका अन्त सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की एक ज़ात पर होगा और बनी इस्त्राईल कितने भी ज़्यादा हों मगर इस तमाम ज़ियादती का स्त्रोत हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम की एक ज़ात होगी. इसी तरह और ऊपर को चलना शुरू करें तो इन्सान के तमाम समुदायों और क़बीलों का अन्त एक ज़ात पर होगा, उसका नाम अल्लाह की किताबों में आदम अलैहिस्सलाम है और मुमकिन नहीं कि वह एक व्यक्ति मानव उत्पत्ति या इन्सानी पैदायश के मामूली तरीक़े से पैदा हो सके. अगर उसके लिये बाप भी मान लिया जाये तो माँ कहाँ से आए. इसलिये ज़रूरी है कि उसकी पैदायश बग़ैर माँ बाप के हो और जब बग़ैर माँ बाप के पैदा हुआ तो यक़ीनन उन्हीं अनासिर या तत्वों से पैदा होगा जो उसके अस्तित्व या वुजूद में पाए जाते हैं. फिर तत्वों में से वह तत्व उसका ठिकाना हो और जिसके सिवा दूसरे में वह न रह सके, लाज़िम है कि वही उसके वुजूद में ग़ालिब हो इसलिये पैदायश की निस्बत उसी तत्व की तरफ़ की जाएगी. यह भी ज़ाहिर है कि मानव उत्पत्ति का मामूली तरीक़ा एक व्यक्ति से जारी नहीं हो सकता, इसलिये उसके साथ एक और भी हो कि जोड़ा हो जाए और वह दूसरा व्यक्ति जो उसके बाद पैदा हो तो हिकमत का तक़ाज़ा यही है कि उसी के जिस्म से पैदा किया जाए क्योंकि एक व्यक्ति के पैदा होने से नस्ल तो पैदा हो चुकी मगर यह भी लाज़िम है कि उसकी बनावट पहले इन्सान से साधारण उत्पत्ति के अलावा किसी और तरीक़े से हो, क्योंकि साधारण उत्पत्ति दो के बिना संभव ही नहीं और यहाँ एक ही है. लिहाज़ा अल्लाह की हिकमत ने हज़रत आदम की एक बाईं पसली उनके सोते में निकाली और उससे उनकी बीबी हज़रत हव्वा को पैदा किया. चूंकि हज़रत हव्वा साधारण उत्पत्ति के तरीक़े से पैदा नहीं हुईं इसलिये वह औलाद नहीं हो सकतीं जिस तरह कि इस तरीक़े के ख़िलाफ़ मानव शरीर से बहुत से कीड़े पैदा हुआ करते हैं, वो उसकी औलाद नहीं हो सकते हैं. नींद से जागकर हज़रत आदम ने अपने पास हज़रत हव्वा को देखा तो अपने जैसे दूसरे को पाने की महब्बत दिल में पैदा हुई. उनसे फ़रमाया तुम कौन हो. उन्हों ने अर्ज़ किया औरत. फ़रमाया, किस लिये पैदा की गई हो. अर्ज़ किया आपका दिल बहलाने के लिये. तो आप उनसे मानूस हुए.

(4) उन्हें तोड़ो या काटे मत. हदीस शरीफ़ में है, जो रिज़्क़ में बढ़ौतरी चाहे उसको चाहिये कि अपने रिशतेदारों के साथ मेहरबानी से पेश आए और उनके अधिकारों का ख़याल रखे.

(5) एक व्यक्ति की निगरानी में उसके अनाथ भतीजे का बहुत सा माल था. जब वह यतीम बालिग़ हुआ और उसने अपना माल तलब किया तो चचा ने देने से इन्कार कर दिया. इस पर यह आयत उतरी. इसको सुनकर उस व्यक्ति ने यतीम का माल उसके हवाले किया और कहा कि हम अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करते है.

(6) यानी अपने हलाल माल.

(7) यतीम का माल जो तुम्हारे लिये हराम है, उसको अच्छा समझकर अपने रद्दी माल से न बदलो क्योंकि वह रद्दी तुम्हारे लिये हलाल और पाक है, और यह हराम और नापाक.

(8) और उनके अधिकार का ख़याल न रख सकोगे.

(9) आयत के मानी में विभिन्न क़ौल हैं. हसन का क़ौल है कि पहले ज़माने में मदीने के लोग अपनी सरपरस्ती वाली यतीम लड़की से उसके माल की वजह से निकाह कर लेते जबकि उसकी तरफ़ रग़बत न होती. फिर उसके साथ सहवास में अच्छा व्यवहार न करते और उसके माल के वारिस बनने के लिये उसकी मौत की प्रतीक्षा करतें. इस आयत में उन्हें इससे रोका गया. एक क़ौल यह है कि लोग यतीमों की सरपरस्ती से तो बेइन्साफ़ी होने के डर से घबराते थे और ज़िना की पर्वाह न करते थे. उन्हें बताया गया कि अगर तुम नाइन्साफ़ी के डर से यतीमों की सरपरस्ती से बचते हो तो ज़िना से भी डरो और इससे बचने के लिये जो औरतें तुम्हारे लिये हलाल हैं उनसे निकाह करो और हराम के क़रीब मत जाओ. एक क़ौल यह है कि लोग यतीमों की विलायत और सरपरस्ती में तो नाइन्साफ़ी का डर करते थे और बहुत से निकाह करने में कुछ भी नहीं हिचकिचाते थे. उन्हें बताया गया कि जब ज़्यादा औरतें निकाह में हों तो उनके हक़ में नाइन्साफ़ी होने से डरो. उतनी ही औरतों से निकाह करो जिनके अधिकार अदा कर सको. इकरिमा ने हज़रत इब्ने अब्बास से रिवायत की कि क़ुरैश दस दस बल्कि इससे ज़्यादा औरतें करते थे और जब उनका बोझ न उठ सकता तो जो यतीम लड़कियाँ उनकी सरपरस्ती में होतीं उनके माल ख़्रर्च कर डालते. इस आयत में फ़रमाया गया कि अपनी क्षमता देख ली और चार से ज़्यादा न करो ताकि तुम्हें यतीमों का माल ख़र्च करने की ज़रूरत पेश न आए. इस आयत से मालूम हुआ कि आज़ाद मर्द के लिये एक वक़्त में चार औरतों तक से निकाह जायज़ है, चाहे वो आज़ाद हों या दासी. तमाम उम्मत की सहमित है कि एक वक़्त में चार औरतों से ज़्यादा निकाह में रखना किसी के लिये जायज़ नहीं सिवाय रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के. यह आप की विशेषताओं में से हैं. अबू दाऊद की हदीस में है कि एक व्यक्ति इस्लाम लाए. उनकी आठ बीबीयाँ थीं. हुज़ूर ने फ़रमाया उनमें से चार रखना. तिरमिज़ी की हदीस में है कि ग़ीलान बिन सलमा सक़फ़ी इस्लाम लाए. उनकी दस बीबीयाँ थीं. वो साथ मुसलमान हुई. हुज़ूर ने हुक्म दिया, इनमें से चार रखो.

(10) इससे मालूम हुआ कि बीबीयों के बीच इन्साफ़ फ़र्ज़ है. नई पुरानी, सब अधिकारों में बराबर हैं. ये इन्साफ़ लिबास में, खाने पीने में, रहने की जगह में, और रात के सहवास में अनिवार्य है. इन बातों में सब के साथ एक सा सुलूक हो.

(11) इससे मालूम हुआ कि मेहर की अधिकारी औरतें हैं न कि उनके सरपरस्त. अगर सरपरस्तों ने मेहर वसूल कर लिया हो तो उन्हें लाज़िम है कि वो मेहर हक़दार औरत को पहुंचा दें.

(12) औरतों की इख़्तियार है कि वो अपने शौहरों को मेहर का कोई हिस्सा हिबा करें या कुल मेहर मगर मेहर बख़्शवाने के लिये उन्हें मजबूर करना, उनके साथ दुर्व्यवहार न करना चाहिये क्योंकि अल्लाह तआला ने “तिब्ना लकुम” फ़रमाया जिसका मतलब है दिल की ख़ुशी के साथ माफ़ करना.

(13) जो इतनी समझ नहीं रखते कि माल कहाँ ख़र्च किया जाए इसे पहचानें. और जो माल को बेमहल ख़र्च करते हैं और अगर उन पर छोड़ दिया जाए तो वो जल्द नष्ट कर देंगे.

(14) जिससे उनके दिल की तसल्ली हो और वो परेशान न हों जैसे यह कि माल तुम्हारा है और तुम होशियार हो जाओगे तो तुम्हारे सुपुर्द कर दिया जाएगा.

(15) कि उनमें होशियारी और मामला जानने की समझ पैदा हुई या नहीं.

(16) यतीम का माल खाने से.

(17) जिहालत के ज़माने में औरतों और बच्चों को विरासत न देते थे. इस आयत में उस रस्म को बातिल किया गया.

(18) अजनबी, जिन में से कोई मैयत का वारिस न हो.

(19) तक़सीम से पहले, और यह देना मुस्तहब है.

(20) इसमें ख़ूबसूरत बहाना, अच्छा वादा और भलाई की दुआ, सब शामिल हैं. इस आयत में मैयत के तर्के से ग़ैर वारिस रिशतेदारों और यतीमों और मिस्कीनों को कुछ सदक़े के तौर पर देने और अच्छी बात कहने का हुक्म दिया. सहाबा के ज़माने में इस पर अमल था. मुहम्मद बिन सीरीन से रिवायत है कि उनके वालिद ने विरासत की तक़सीम के वक़्त एक बकरी ज़िबह कराके खाना पकाया और रिश्तेदारों, यतीमों और मिस्कीनों को खिलाया और यह आयत पढ़ी. इब्ने सीरीन ने इसी मज़मून की उबैदा सलमानी से भी रिवायत की है. उसमें यह भी है कि कहा अगर यह आयत न आई होती तो यह सदक़ा मैं अपने माल से करता. तीजा, जिसको सोयम कहते हैं और मुसलमानों का तरीक़ा है, वह भी इसी आयत का अनुकरण है कि उसमें रिश्तेदारों यतीमों और मिस्कीनों पर सदक़ा होता है और कलिमे का ख़त्म और क़ुरआने पाक की तिलावत और दुआ अच्छी बात है. इसमें कुछ लोगों को बेजा इसरार हो गया है जो बुजुर्गों के इस अमल का स्त्रोत तो तलाश कर न सके, जब कि इतना साफ़ क़ुरआन पाक में मौजूद था, अलबत्ता उन्होंने अपनी राय को दीन में दख़्ल दिया और अच्छे काम को रोकने में जुट गये, अल्लाह हिदायत करे.

(21) जिसके नाम वसिय्यत की गई वह और यतीमों के सरपरस्त और वो लोग जो मौत के क़रीब मरने वाले के पास मौजूद हों.

(22) और मरने वाले की औलाद के साथ मेहरबानी के अलावा कोई कायर्वाही न करें जिससे उसकी औलाद परेशान हो.

(23) मरीज़ के पास उसकी मौत के क़रीब मौजूद होने वालों की सीधी बात तो यह है कि उसे सदक़ा और वसिय्यत में यह राय दें कि वह उतने माल से करे जिससे उसकी औलाद तंगदस्त और नादार न रह जाए और वसी यानी जिसके नाम वसिय्यत की जाए और वली यानी सरपरस्त की सीधी बात यह है कि वो मरने वाले की ज़ुर्रियत के साथ सदव्यवहार करें, अच्छे से बात करें जैसा कि अपनी औलाद के साथ करते हैं.

(24) यानी यतीमों का माल नाहक़ खाना मानो आग खाना है. क्योंकि वह अज़ाब का कारण है. हदीस शरीफ़ में है, क़यामत के दिन यतीमों का माल खाने वाले इस तरह उठाए जाएंगे कि उनकी क़ब्रों से और उनके मुंह से और उनके कानों से धुवाँ निकलता होगा तो लोग पहचानेंगे कि यह यतीम का माल खाने वाला ह

सूरए निसा _ दूसरा रूकू

सूरए निसा _ दूसरा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है (1) 
तुम्हारी औलाद के बारे में  (2)
बेटे का हिस्सा दो बेटियों के बराबर है (3)
फिर अगर निरी लड़कियां हो अगरचे दो से ऊपर (4)
तो उनको तर्के की दो तिहाई और अगर एक लड़की हो तो उसका आधा (5)
और मैयत के माँ बाप को हर एक को उसके तर्के से छटा, अगर मैयत के औलाद हो (6)
फिर अगर उसकी औलाद न हो और माँ बाप छोड़े (7)
तो माँ का तिहाई फिर अगर उसके कई बहन भाई हों(8)
तो माँ का छटा (9)
बाद उस वसियत के जो कर गया और दैन के (10)
तुम्हारे बाप और तुम्हारे बेटे तुम क्या जानो कि उनमें कौन तुम्हारे ज़्यादा काम आएगा (11)
यह हिस्सा बांधा हुआ है अल्लाह की तरफ़ से बेशक अल्लाह इल्म वाला हिकमत (बोध) वाला है  (11)
और तुम्हारी बीवियाँ जो छोड़ जाएं उसमें तुम्हें आधा है अगर उनके औलाद हो तो उनके तर्के में से तुम्हें चौथाई है (12)
जो वसिय्यत वो कर गई और दैन (ऋण) निकाल कर और तुम्हारे तर्के में औरतों का चौथाई है अगर तुम्हारे औलाद न हो. फिर अगर तुम्हारे औलाद हो तो उनका तुम्हारे तर्के में से आठवाँ (13)
जो वसिय्यत तुम कर जाओ  दैन (ऋण) निकाल कर और अगर किसी ऐसे मर्द या औरत का तर्का बटता हो जिसने माँ बाप औलाद कुछ न छोड़े और माँ की तरफ़ से उसका भाई या बहन है तो उनमें से हर एक को छटा फिर अगर  वो बहन भाई एक से ज़्यादा हों तो सब तिहाई में शरीक हैं (14)
मैयत की वसिय्यत और दैन निकाल कर जिसमें उसने नुक़सान न पहुंचाया हो  (15)
यह अल्लाह का इरशाद  (आदेश) है और  अल्लाह इल्म वाला हिल्म (सहिष्णुता) वाला है (12) ये अल्लाह की हदें हैं, और जो हुक्म माने अल्लाह और अल्लाह के रसूल का, अल्लाह उसे बाग़ों में ले जाएगा जिनके नीचे नेहरें बहें हमेशा उनमें रहेंगे और यही है बड़ी कामयाबी (13)
और जो अल्लाह और उसके रसूल की नाफ़रमानी करे और उसकी कुल हदों से बढ़ जाए अल्लाह उसे आग में दाख़िल करेगा जिसमें हमेशा रहेगा और उसके लिये ख़्वारी (ज़िल्लत) का अज़ाब है (16) (14)

तफ़सीर :

सूरए निसा – दूसरा रूकू

(1) विरासत के बारे में.

(2) अगर मरने वाले ने बेटे बेटियाँ दोनों छोड़ी हों तो.

(3) यानी बेटी का हिस्सा बेटे से आधा है और अगर मरने वाले ने सिर्फ़ लड़के छोड़े हों तो कुल माल उन का.

(4) या दो.

(5) इससे मालूम हुआ कि अगर लड़का अकेला वारिस रहा हो तो कुल माल उसका होगा क्योंकि ऊपर बेटे का हिस्सा बेटियों से दूना बताया गया है तो जब अकेली लड़की का आधा हुआ तो अकेले लड़के का उससे दूना हुआ और वह कुल है.

(6) चाहे लड़का हो या लड़की कि उनमें से हर एक को औलाद कहा जाता है.

(7) यानी सिर्फ़ माँ बाप छोड़े और अगर माँ बाप के साथ शौहर या बीवी में से किसी को छोड़ा, तो माँ का हिस्सा बीवी का हिस्सा निकालने के बाद जो बाक़ी बचे उसका तिहाई होगा न कि कुल का तिहाई.

(8) सगे चाहे सौतेले.

(9) और एक ही भाई हो तो वह माँ का हिस्सा नहीं घटा सकता.

(10) क्योंकि वसिय्यत और क़र्ज़ विरासत की तक़सीम से पहले है. और क़र्ज़ वसिय्यत से भी पहले है. हदीस शरीफ़ में है “इन्नद दैना क़बलल वसिय्यते” जिसका अर्थ यह होता है कि वसिय्यत पर अमल करने से पहले मरने वाले का क़र्ज़ अदा करना ज़रूरी है.

(11) इसलिये हिस्सो का मुक़र्रर करना तुम्हारी राय पर न छोड़ा.

(12  चाहे एक बीबी हो या कई. एक होगी तो वह अकेली चौथाई पाएगी. कई होंगी तो सब उस चौथाई में बराबर शरीक होंगी चाहे बीबी एक हो या कई, हिस्सा यही रहेगा.

(13) चाहे बीबी एक हो या ज़्यादा.

(14) क्योंकि वो माँ के रिश्ते की बदौलत हक़दार हुए और माँ तिहाई से ज़्यादा नहीं पाती और इसीलिये उनमें मर्द का हिस्सा औरत से ज़्यादा नहीं है.

(15) अपने वारिसों को तिहाई से ज़्यादा वसिय्यत करके या किसी वारिस के हक़ में वसिय्यत करके. वारिस के क़र्ज़ कई क़िस्म हैं. असहाबे फ़राइज़ वो लोग हैं जिनके लिये हिस्सा मुक़र्रर है जैसे बेटी एक हो तो आधे माल की मालिक, ज़्यादा हों तो सब के लिये दो तिहाई. पोती और पड़पोती और उससे नीचे की हर पोती, अगर मरने वाले के औलाद न हो तो बेटी के हुक्म में है. और अगर मैयत ने एक बेटी छोड़ी है तो यह उसके साथ छटा पाएगी और अगर मैयत ने बेटा छोड़ा तो विरासत से वंचित हो जाएगी, कुछ न पाएगी और अगर मरने वाले ने दो बेटियाँ छोड़ीं तो भी पोती वंचित यानी साक़ित हो गई. लेकिन अगर उसके साथ या उसके नीचे दर्जे में कोई लड़का होगा तो वह उसको इसबा बना देगा. सगी बहन मैयत के बेटा या पोता न छोड़ने की सूरत में बेटियों के हुक्म में है. अल्लाती बहनें, जो बाप में शरीक हों और उनकी माएं अलग अलग हों, वो सगी बहनों के न होने की सूरत में उनकी मिस्ल है और दोनों क़िस्म की बहनें, यानी सगी और अल्लाती, मैयत की बेटी या पोती के साथ इसबा हो जाती हैं और बेटे और पोते और उसके मातहत पोते और बाप के साथ साक़ित या वंचित और इमाम साहब के नज़दीक दादा के साथ भी मेहरूम हैं. सौतेले भाई बहन जो फ़क़त माँ में शरीक हों, उनमें से एक हो तो छटा और ज़्यादा हों तो तिहाई और उनमें मर्द और औरत बराबर हिस्सा पाएंगे. और बेटे पोते और उसके मातहत के पोते और बाप दादा के होते मेहरूम हो जाएंगे. बाप छटा हिस्सा पाएगा अगर मैयत ने बेटा या पोता या उससे नीचे की कोई पोती छोड़ी हो तो बाप छटा और वह बाक़ी भी पाएगा जो असाबे फ़र्ज़ को देकर बचे. दादा यानी बाप का बाप, बाप के न होने की सूरत में बाप की मिस्ल है सिवाय इसके कि माँ को मेहरूम न कर सकेगा. माँ का छटा हिस्सा है. अगर मैयत ने अपनी औलाद या अपने बेटे या पोते या पड़पोते की औलाद या बहन भाई में से दो छोड़े हों चाहे वो सगे भाई हों या सौतेले और अगर उनमें से कोई छोड़ा न हो तो तो माँ कुल माल का तिहाई पाएगी और अगर मैयत ने शौहर या बीबी और माँ बाप छोड़े हों तो माँ को शौहर या बीबी का हिस्सा देने के बाद जो बाक़ी रहे उसका तिहाई मिलेगा और जद्दा का छटा हिस्सा है चाहे वह माँ की तरफ़ से हो यानी नानी या बाप की तरफ़ से हो यानी दादी. एक हो, ज़्यादा हों, और क़रीब वाली दूर वाली के लिये आड़ हो जाती है. और माँ हर एक जद्दा यानी नानी और दादी को मेहरूम कर देती है. और बाप की तरफ़ की जद्दात यानी दादियाँ बाप के होने की सूरत में मेहजूब यानी मेहरूम हो जाती हैं. इस सूरत में कुछ न मिलेगा. ज़ौज को चौथा हिस्सा मिलेगा. अगर मैयत ने अपनी या अपने बेटे पोते परपोते वग़ैरह की औलाद छोड़ी हो और अगर इस क़िस्म की औलाद न छोड़ी हो तो शौहर आधा पाएगा. बीवी मैयत की और उसके बेटे पोते वग़ैरह की औलाद होने की सूरत में आठवाँ हिस्सा पाएगी और न होने की सूरत में चौथाई. इसबात वो वारिस है जिनके लिये कोई हिस्सा निश्चित नहीं है. फ़र्ज़ वारिसों से जो बाक़ी बचता है वो पाते हैं. इन में सबसे ऊपर बेटा है फिर उसका बेटा फिर और नीचे के पोते फिर बाप फिर उसका बेटा फिर और नीचे के पोते फिर बाप फिर दादा फिर बाप के सिलसिले में जहाँ तक कोई पाया जाए. फिर सगा भाई फिर सौतेला यानी बाप शरीक भाई फिर सगे भाई का बेटा फिर बाप शरीक भाई का बेटा, फिर आज़ाद करने वाला और जिन औरतों का हिस्सा आधा या दो तिहाई है वो अपने भाईयों के साथ इसबा हो जाती हैं और जो ऐसी न हों वो नहीं. ख़ून के रिश्तों, फ़र्ज़ वारिस और इसबात के सिवा जो रिश्तेदार हैं वो ज़विल अरहाम में दाख़िल हैं और उनकी तरतीब इस्बात की मिस्ल है.

(16) क्योंकि कुल हदों के फलांगने वाला काफ़िर है. इसलिये कि मूमिन कैसा भी गुनाहगार हो, ईमान की हद से तो न गुज़रेगा.

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सूरए निसा _ तीसरा रूकू

सूरए निसा _ तीसरा रूकू 
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और तुम्हारी औरतें जो बदकारी करें उन पर ख़ास अपने में (1)
के चार मर्दों की गवाही लो फिर अगर वो गवाही दे दें तो उन औरतों को घर में बंद रखो (2)
यहां तक कि उन्हें मौत उठाले या अल्लाह उनकी कुछ राह निकाले(3)(15)
और तुम में जो मर्द औरत ऐसा काम करें उनको ईज़ा (कष्ट) दो(4)
फिर अगर वो तौबह कर लें और नेक हो जाएं तो उनका पीछा छोड़ दो बेशक अल्लाह बड़ा तौबह क़ुबूल करने वाला मेहरबान है (5)(16)
वह तौबह जिसका क़ुबूल करना अल्लाह ने अपने फ़ज़्ल(कृपा) से लाज़िम कर लिया है वह उन्हीं की है जो नादानी से बुराई कर बैठे फिर थोड़ी देर में तौबा करलें (6)
ऐसो पर अल्लाह अपनी रहमत से रूजू (तवज्जुह)करता है और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है(17) और वह तौबा उनकी नहीं जो गुनाहों में लगे रहते हैं(7)
यहां तक कि जब उनमें किसी को मौत आए तो कहे अब मैं ने तौबा की(8)
और न उनकी जो काफ़िर मरें उनके लिये हमने दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है (9)(18)
ऐ ईमान वालों, तुम्हें हलाल नहीं कि औरतों के वारिस बन जाओ ज़बरदस्ती (10)
और औरतों को रोको नहीं इस नियत से कि जो मेहर उनको दिया था उसमें से कुछ ले लो (11)
मगर उस सूरत में कि खुल्लमखुल्ला बेहयाई का काम करें (12)
और उनसे अच्छा बर्ताव करो (13)
फिर अगर वो तुम्हें पसन्द न आएं (14)
तो क़रीब है कि कोई चीज़ तुम्हें नापसन्द हो और अल्लाह उसमें बहुत भलाई रखे (15) (19)
और अगर तुम एक बीबी के बदले दूसरी बदलना चाहो (16)
और उसे ढेरों माल दे चुके हो (17)
तो उसमें से कुछ वापिस न लो (18)
क्या उसे वापिस लोगे झूठ बांधकर और खुले गुनाह से (19) (20)
और किस तरह वापिस लोगे हालांकि तुम में एक दूसरे के सामने बेपर्दा हो लिया और वो तुम से गाढ़ा अहद (प्रतिज्ञा) ले चुकीं  (20)(21)
और बाप दादा की मनकूहा (विवाहिता) से निकाह न करो  (21)
मगर जो हो गुज़रा वह बेशक बेहयाई (22)
और गज़ब (प्रकोप) का काम है और  बहुत बुरी राह (23) (22)

तफसीर 
सूरए निसा – तीसरा रूकू

(1) यानी मुसलमानों में के.

(2) कि वो बदकारी न करने पाएं.

(3) यानी हद निश्चित करे या तौबह और निकाह की तौफ़ीक़ दे. जो मुफ़स्सिर इस आयत “अलफ़ाहिशता” (बदकारी) से ज़िना मुराद लेते हैं वो कहते हैं कि हब्स का हुक्म हूदूद यानी सज़ाएं नाज़िल होने से पहले था. सज़ाएं उतरने के बाद स्थगित किया गया. (ख़ाज़िन, जलालैन व तफ़सीरे अहमदी)

(4) झिड़कों, घुड़को, बुरा कहो, शर्म दिलाओ, जूतियाँ मारो, (जलालैन, मदारिक व ख़ाज़िन वग़ैरह)

(5) हसन का क़ौल है कि ज़िना की सज़ा पहले ईज़ा यानी यातना मुक़र्रर की गई फिर क़ैद फिर कोड़े मारना या संगसार करना. इब्ने बहर का क़ौल है कि पहली आयत “वल्लती यातीना” (और तुम्हारी औरतों में…..) उन औरतों के बारे में है जो औरतों के साथ बुरा काम करती हैं और दूसरी आयत “वल्लज़ाने”(और तुममें जो मर्द…..) लौंडे बाज़ी या इग़लाम करने वालों के बारे में उतरी. और ज़िना करने वाली औरतें और ज़िना करने वाले मर्द का हुक्म सूरए नूर में बयान फ़रमाया गया. इस तक़दीर पर ये आयतें मन्सूख़ यानी स्थगित हैं और इनमें इमाम अबू हनीफ़ा के लिये ज़ाहिर दलील है उस पर जो वो फ़रमाते हैं कि लिवातत यानी लौंडे बाज़ी में छोटी मोटी सज़ा है, बड़ा धार्मिक दण्ड नहीं.

(6) ज़ुहाक का क़ौल है कि जो तौबह मौत से पहले हो, वह क़रीब है यानी थोड़ी देर वाली है.

(7)  और तौबह में देरी कर जाते है.

(8) तौबह क़ुबूल किये जाने का वादा जो ऊपर की आयत में गुज़रा वह ऐसे लोगों के लिये नहीं है. अल्लाह मालिक है, जो चाहे करे. उनकी तौबह क़ुबूल करे या न करे. बख़्श दे या अज़ाब फ़रमाए, उस की मर्ज़ी. (तफ़सीरे अहमदी)

(9) इससे मालूम हुआ कि मरते वक़्त काफ़िर की तौबह और उसका ईमान मक़बूल नहीं.

(10) जिहालत के दौर में लोग माल की तरह अपने रिश्तेदारों की बीबियों के भी वारिस बन जाते थे फिर अगर चाहते तो मेहर के बिना उन्हें अपनी बीबी बनाकर रखते या किसी और के साथ शादी कर देते और ख़ुद मेहर ले लेते या उन्हें क़ैद कर रखते कि जो विरासत उन्हों ने पाई है वह देकर रिहाई हासिल करलें या मर जाएं तो ये उनके वारिस हो जाएं. ग़रज़ वो औरतें बिल्कुल उनके हाथ में मजबूर होती थीं और अपनी मर्ज़ी से कुछ भी नहीं कर सकती थीं. इस रस्म को मिटाने के लिये यह आयत उतारी गई.

(11) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया यह उसके सम्बन्ध में है जो अपनी बीबी से नफ़रत रखता हो और इस लिये दुर्व्यवहार करता हो कि औरत परेशान होकर मेहर वापस कर दे या छोड़ दे. इसकी अल्लाह तआला ने मनाही फ़रमाई. एक क़ौल यह है कि लोग औरत को तलाक़ देते फिर वापस ले लेते, फिर तलाक़ देते. इस तरह उसको लटका कर रखते थे. न वह उनके पास आराम पा सकती, न दूसरी जगह ठिकाना कर सकती. इसको मना फ़रमाया गया. एक क़ौल यह है कि मरने वाले के सरपरस्त को ख़िताब है कि वो उसकी बीबी को न रोकें.

(12) शौहर की नाफ़रमानी या उसकी या उसके घर वालों की यातना, बदज़बानी या हरामकारी ऐसी कोई हालत हो तो ख़ुलअ चाहने में हर्ज नहीं.

(13) खिलाने पहनाने में, बात चीत में और मियाँ बीवी के व्यवहार में.

(14) दुर्व्यवहार या सूरत नापसन्द होने की वजह से, तो सब्र करो और जुदाई मत चाहो.

(15) नेक बेटा वग़ैरह.

(16) यानी एक को तलाक़ देकर दूसरी से निकाह करना.

(17) इस आयत से भारी मेहर मुक़र्रर करने के जायज़ होने पर दलील लाई गई है. हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने मिम्बर पर से फ़रमाया कि औरतों के मेहर भारी न करो. एक औरत ने यह आयत पढ़कर कहा कि ऐ  इब्ने ख़त्ताब, अल्लाह हमें देता है और तुम मना करते हो, इस पर अमीरूल मूमिनीन हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया, ऐ उमर, तुझसे हर शख़्स ज़्यादा समझदार है. जो चाहो मेहर मुक़र्रर करो. सुब्हानल्लाह, ऐसी थी रसूल के ख़लीफ़ा के इन्साफ़ की शान और शरीफ़ नफ़्स की पाकी. अल्लाह तआला हमें उनका अनुकरण करने की तौफ़ीक अता फ़रमाए. आमीन.

(18) क्योंकि जुदाई तुम्हारी तरफ़ से है.

(19) यह जिहालत वालों के उस काम का रद है कि जब उन्हें कोई दूसरी औरत पसन्द आती तो वो अपनी बीबी पर तोहमत यानी लांछन लगाते ताकि वह इससे परेशान होकर जो कुछ ले चुकी है वापस कर दे. इस तरीक़े को इस आयत में मना फ़रमाया गया और झुट और गुनाह बताया गया.

(20) वह अहद अल्लाह तआला का यह इरशाद है ” फ़ इम्साकुन बि मअरूफ़िन फ़ तसरीहुम बि इहसानिन” यानी फिर भलाई के साथ रोक लेना है या नेकूई के साथ छोड़ देना है. (सूरए बक़रह, आयत 229) यह आयत इस पर दलील है कि तन्हाई में हमबिस्तरी करने से मेहर वाजिब हो जाता है.

(21) जैसा कि जिहालत के ज़माने में रिवाज था कि अपनी माँ के सिवा बाप के बाद उसकी दूसरी औरत को बेटा अपनी बीवी बना लेता था.

(22) क्योंकि बाप की बीवी माँ के बराबर है. कहा गया है कि निकाह से हम-बिस्तरी मुराद है. इससे साबित होता है कि जिससे बाप ने हमबिस्तरी की हो, चाहे निकाह करके या ज़िना करके या वह दासी हो, उसका वह मालिक होकर, उनमें से हर सूरत में बेटे का उससे निकाह हराम है.

(23) अब इसके बाद जिस क़द्र औरतें हराम हैं उनका बयान फ़रमाया जाता है. इनमें सात तोनसब से हराम है.F

सूरए निसा – चौथा रूकू

सूरए निसा – चौथा रूकू 
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला


हराम हुई तुम पर तुम्हारी माएं  (1)
और बेटियां (2)
और बहनें और फुफियां और ख़ालाएं और भतीजियां(3)
और भांजियां और तुम्हारी माएं जिन्होंने दूध पिलाया (4)
और दूध की बहनें और औरतों की माएं  (5)
और उनकी बेटियां जो तुम्हारी गोद में हैं (6)
तो उनकी बेटियों में हर्ज नहीं (7)
और तुम्हारी नस्ली बेटों की बीबियां(8)
और दो बहनें इकट्ठी करना (9)
मगर जो हो गुज़रा बेशक अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है (23)

पाँचवां पारा – वल – मुहसनात
(सूरए निसा _ चौथा रूकू जारी)

और हराम हैं शौहरदार औरतें  मगर काफ़िरों की औरतें जो तुम्हारी मिल्क में आ जाएं (10)
यह अल्लाह का लिखा हुआ है तुमपर और उन (11)
के सिवा जो रहीं वो तुम्हें हलाल हैं कि अपने मालों के इवज़ तलाश करो कै़द लाते (12)
न पानी गिराते (13)
तो जिन औरतों को निकाह में लाना चाहो उनके बंधे हुए मेहर उन्हें दे दो और क़रारदाद (समझौते) के बाद अगर तुम्हारे आपस में कुछ रज़ामन्दी हो जावे तो उसमें गुनाह नहीं (14)
बेशक अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है  (24) और तुमसे बेमक़दूरी (असामथर्य) के कारण जिनके निकाह में आज़ाद औरतें ईमान वालियां न हों तो उनसे निकाह करे जो तुम्हारे हाथ की मिल्क हैं ईमान वाली कनीजे़ (15)
और अल्लाह तुम्हारे ईमान को ख़ूब जानता है, तुम में एक,दूसरे से है तो उनसे निकाह करो  (16)
उनके मालिकों  की इज़ाज़त से (17)
और दस्तूर के मुताबिक़  उनके मेहर उन्हें दो(18)
क़ैद में आतियां, न मस्ती निकालती और न यार बनाती (19)
जब वो कै़द में आजाएं (20)
फिर बुरा काम करें तो उनपर उसकी सज़ा आधी है जो आज़ाद औरतों पर है  (21)
यह (22)
उसके लिये जिसे तुम में से ज़िना  (व्यभिचार) का डर है और सब्र करना तुम्हारे लिये बेहतर है (23)
और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है(25)

तफसीर 
सूरए निसा – चौथा रूकू

(1) और हर औरतें जिसकी तरफ़ बाप या माँ के ज़रिये से नसब पलटता हो, यानी दादियाँ व नानियाँ , चाहे क़रीब की हों या दूर की, सब माएं हैं  अपनी वालिदा के हुक्म में दाख़िल हैं.

(2) पोतियाँ नवासियाँ किसी दर्जे की हों, बेटियों में दाख़िल हैं.

(3) ये सब सगी हों या सौतेली. इनके बाद उन औरतों का बयान किया जाता है जो सबब से हराम हैं.

(4) दूध के रिश्ते, दूध पीने को मुद्दत में थोड़ा दूध पिया जाय या बहुत सा, उसके साथ हुरमत जुड़ जाती है. दूध पीने की मुद्दत हज़रत इमाम अबू हनीफ़ रदियल्लाहो अन्हो के नज़दीक दो साल है. दूध पीने की मुद्दत के बाद जो दूध पिया जाए उससे हुरमत नहीं जुड़ती. अल्लाह तआला ने रिज़ाअत (दूध पीने) को नसब की जगह किया है और दूध पिलाने वाली को दूध पीने वाले बच्चे की माँ और उसकी लड़की को बच्चे की बहन फ़रमाया. इसी तरह दूध पिलाई का शौहर दूध पीने वाले बच्चे का बाप और उसका बाप बच्चे का दादा और उसकी बहन उसकी फुफी और उसका हर बच्चा जो दूध पिलाई के सिवा और किसी औरत से भी हो, चाहे वह दूध पीने से पहले पैदा हुआ या उसके बाद, वो सब उसके सौतेले भाई बहन हैं. और दूध पिलाई की माँ दूध पीने वाले बच्चे की नानी और उसकी बहन उसकी ख़ाला और उस शौहर से उसके जो बच्चे पैदा हो वो दूध पीने वाले बच्चे के दूध शरीक भाई बहन, और उस शौहर के अलावा दूसरे शौहर से जो हों वह उसके सौतेले भाई बहन, इसमें अस्ल यह हदीस है कि दूध पीने से वो रिश्ते हराम हो जाते हैं जो नसब से हराम हैं. इसलिये दूध पीने वाले बच्चे पर उसके दूध माँ बाप और उनके नसबी और रिज़ाई उसूल व फ़रोअ सब हराम हैं.

(5) बीवियों की माएं, बीवियों की बेटियाँ और बेटो की बीवियाँ बीवियों की माएं सिर्फ़ निकाह का बन्धन होते ही हराम हो जाती हैं चाहें उन बीवियों से सोहबत या हमबिस्तरी हुई हो या नहीं.

(6) गोद में होना ग़ालिबे हाल का बयान है, हुरमत के लिये शर्त नहीं.

(7) उनकी माओ से तलाक़ या मौत वग़ैरह के ज़रीये से, सोहबत से पहले जुदाई होने की सूरत में उनके साथ निकाह जायज़ है.

(8) इससे लेपालक निकल गए. उनकी औरतों के साथ निकाह जायज़ है. और दूध बेटे की बीबी भी हराम है क्योंकि वह सगे के हुक्म् में है. और पोते परपोते बेटों में दाख़िल हैं.

(9) यह भी हराम है चाहे दोनों बहनों को निकाह में जमा किया जाए या मिल्के यमीन के ज़रिये से वती में. और हदीस शरीफ़ में फुफी भतीजी और ख़ाला भांजी का निकाह में जमा करना भी हराम फ़रमाया गया. और क़ानून यह है कि निकाह में हर ऐसी दो औरतों का जमा करना हराम है जिससे हर एक को मर्द फ़र्ज़ करने से दूसरी उसके लिये हलाल न हो, जैसे कि फुफी भतीजी, कि अगर फुफी को मर्द समझा जाए तो चचा हुआ, भतीजी उस पर हराम है और अगर भतीजी को मर्द समझा जाए तो भतीजा हुआ, फुफी उस पर हराम है, हुरमत दोनों तरफ़ है. और अगर सिर्फ़ एक तरफ़ से हो तो जमा हराम न होगी जैसे कि औरत और उसके शौहर की लड़की को मर्द समझा जाए तो उसके लिये बाप की बीबी तो हराम रहती है मगर दूसरी तरफ़ से यह बात नहीं है यानी शौहर की बीबी कि अगर मर्द समझा जाए तो यह अजनबी होगा और कोई रिश्ता ही न रहेगा.

(10) गिरफ़्तार होकर बग़ैर अपने शौहरों के, वो तुम्हारे लिये इस्तबरा (छुटकारा हो जाने) के बाद हलाल हैं, अगरचें दारूल हर्ब में उनके शौहर मौजूद हों क्योंकि तबायने दारैन (अलग अलग सुकूनत) की वजह से उनकी शौहरों से फुर्क़त हो चुकी. हज़रत अबू सइर्द ख़ुदरी रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया हमने एक रोज़ बहुत सी क़ैदी औरतें पाई जिनके शौहर दारूल हर्ब में मौजूद थे, तो हमने उनसे क़ुर्बत में विलम्ब किया और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से मसअला पूछा. इस पर यह आयत उतरी.

(11) वो मेहरम औरतें जिनका ऊपर बयान किया गया.

(12) निकाह से या मिल्के यमीन से. इस आयत से कई मसअले साबित हुए. निकाह में मेहर ज़रूरी है और मेहर निशिचत न किया हो, जब भी वाज़िब होता है. मेहर माल ही होता है न कि ख़िदमत और तालीम वग़ैरह जो चीज़ें माल नहीं हैं, इतना क़लील जिसको माल न कहा जाए, मेहर होने की सलाहियत नहीं रखता. हज़रत जाबिर और हज़रत अली मुरतज़ा रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि मेहर की कम मिक़दार दस दरहम है, इससे कम नहीं हो सकता.

(13) इससे हरामकारी मुराद है और यहाँ चेतावनी है कि ज़िना करने वाला सिर्फ़ अपनी वासना की पूर्ति करता है और मस्ती निकालता है और उसका काम सही लक्ष्य और अच्छे उदेश्य से ख़ाली होता है, न औलाद हासिल करना, न नस्ल, न नसब मेहफ़ूज़ रखना, न अपने नफ़्स को हराम से बचाना, इनमें से कोई बात उसके सामने नहीं होती, वह अपने नुत्फ़े और माल को नष्ट करके दीन और दुनिया के घाटे में गिरफ़्तार होता है.

(14) चाहे औरत निश्चित मेहर से कम कर दे या बिल्कुल बख़्श दे या मर्द मेहर की मात्रा और ज़्यादा कर दें.

(15) यानी मुसलमानों की ईमानदार दासियाँ, क्योंकि निकाह अपनी दासी से नहीं होता : वह निकाह के बिना ही मालिक के लिये हलाल है. मतलब यह है कि जो शख़्स ईमान वाली आज़ाद औरत से निकाह की क्षमता और ताक़त न रखता हो वह ईमानदार दासी से निकाह करे, यह बात शर्माने की नहीं. जो शख़्स आज़ाद औरत से निकाह की क्षमता रखता हो उसको भी मुसलमान बांदी से निकाह करना जायज़ है. यह मसअला इस आयत में तो नहीं है, मगर ऊपर की आयत ” व उहिल्ला लकुम मा वराआ ज़ालिकुम” से साबित है. ऐसे ही किताब वाली दासी से भी निकाह जायज़ है और मूमिना यानी ईमान वाली के साथ अफ़ज़ल व मुस्तहब है. जैसा कि इस आयत से साबित हुआ.

(16) यह कोई शर्म की बात नहीं. फ़ज़ीलत ईमान से है. इसी को काफ़ी समझो.

(17) इससे मालूम हुआ कि दासी को अपने मालिक की आज्ञा के बिना निकाह का हक़ नहीं, इसी तरह ग़ुलाम को.

(18) अगरचे मालिक उनके मेहर के मालिक हैं लेकिन दासियों को देना मालिक ही को देना है क्योंकि ख़ुद वो और जो कुछ उनके क़ब्ज़े में हो, सब मालिक का है. या ये मानी हैं कि उनके मालिकों की इजाज़त से उन्हें मेहर दो.

(19) यानी खुले छुपे किसी तरह बदकारी नहीं करतीं.

(20) और शौहर-दार हो जाएं.

(21) जो शौहरदार न हों, यानी पचास कोड़े, क्योंकि आज़ाद के लिये सौ कोड़े हैं और दासियों को संगसार नहीं किया जाता.

(22) दासी से निकाह करना.

(23) दासी के साथ निकाह करने से, क्योंकि इससे ग़ुलाम औलाद पैदा होगी.

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सूरए निसा – पाँचवा रूकू

सूरए निसा – पाँचवा रूकू 
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला


अल्लाह चाहता है कि अपने आदेश तुम्हारे लिये बयान करदे और तुम्हें अगलों के तरीक़े बतादे (1)
और तुमपर अपनी रहमत से रूज़ू (तवज्जूह) फ़रमाए और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है (26) और अल्लाह तुमपर अपनी रहमत से रूजू फ़रमाना चाहता है और जो अपने मज़ों के पीछे पड़े है वो चाहते है कि तुम सीधी राह से बहुत अलग हो जाओ  (2)(27)
अल्लाह चाहता है कि तुमपर तख़फ़ीफ़ (कमी) करे(3)
और आदमी कमज़ोर बनाया गया(4)(28)
ऐ ईमान वालों, आपस में एक दूसरे के माल नाहक़ ना खाओ  (5)
मगर यह कि कोई सौदा तुम्हारी आपसी रज़ामन्दी का हो (6)
और अपनी जानें क़त्ल न करो (7)
बेशक अल्लाह तुम पर मेहरबान है (29) और जो ज़ुल्म व ज़्यादती से ऐसा करेगा तो जल्द ही हम उसे आग में दाख़िल करेंगे और यह अल्लाह को आसान है(30) अगर बचते रहो बड़े गुनाहों से जिनकी तुम्हें मनाई है (8)
तो तुम्हारे और गुनाह (9)
हम बख़्श देंगे और तुम्हें इज़्ज़त की जगह दाख़िल करेंगे (31)
और उसकी आरज़ू न करो जिससे अल्लाह ने तुम में एक को दूसरे पर बड़ाई दी(10)
मर्दों के लिये उनकी कमाई से हिस्सा है और औरतों के लिये उनकी कमाई से हिस्सा (11)
और अल्लाह से उसका फ़ज़्ल (कृपा) मांगो बेशक अल्लाह सब कुछ जानता है (32)
और हमने सबके लिये माल के मुस्तहक़ (हक़दार) बना दिये है जो कुछ छोड़ जाएं  मां बाप और क़रावत वाले (रिश्तेदार) और वो जिनसे तुम्हारा हलफ़ बंध चुका (12)
उन्हें उनका हिस्सा दो बेशक हर चीज़ अल्लाह के सामने है (33)

तफसीर 
सूरए निसा – पाँचवां रूकू

(1) नबियों और नेक बन्दों की.

(2) और हराम में लगकर उन्हीं की तरफ़ हो जाओ.

(3) और अपने फ़ज़्ल व मेहरबानी से अहकाम आसान करे.

(4) उसको औरतों से और वासना से सब्र दुशवार है. हदीस में है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, औरतों में भलाई नहीं और उनकी तरफ़ से सब्र भी नहीं हो सकता. नेकों पर वो ग़ालिब आती हैं, बुरे उन पर ग़ालिब आ जाते हैं.

(5) चोरी, ग़बन, ख़ुर्द बुर्द और नाजायज़ तौर से क़ब्ज़ा कर लेना, जुआ, सूद जितने हराम तरीक़े हैं सब नाहक़ हैं, सब की मनाही है.

(6) वह तुम्हारे लिये हलाल है.

(7) ऐसे काम इख़्तियार करके जो दुनिया या आख़िरत में हलाकत का कारण हों, इसमें मुसलमानों का क़त्ल करना भी आ गया है और मूमिन का क़त्ल ख़ुद अपना ही क़त्ल है, क्योंकि तमाम ईमान वाले एक जान की तरह हैं. इस आयत से ख़ुदकुशी यानी आत्महत्या की अवैधता भी साबित हुई. और नफ़्स का अनुकरण करके हराम में पड़ जाना भी अपने आपको हलाक करना है.

(8) और जिन पर फटकार उतरी यानी अज़ाब का वादा दिया गया मिस्ल क़त्ल, ज़िना, चोरी वग़ैरह के.

(9) छोटे गुनाह. कुफ़्र और शिर्क तो न बख़्शा जाएगा अगर आदमी उसी पर मरा (अल्लाह की पनाह). बाक़ी सारे गुनाह, छोटे हों या बड़े, अल्लाह की मर्ज़ी में हैं, चाहे उन पर अज़ाब करे, चाहे माफ़ फ़रमाए.

(10) चाहे दुनिया के नाते से या दीन के, कि आपस में ईर्ष्या, हसद और दुश्मनी न पैदा हो. ईर्ष्या यानी हसद अत्यन्त बुरी चीज़ है. हसद वाला दूसरे को अच्छे हाल में देखता है तो अपने लिये उसकी इच्छा करता है और साथ में यह भी चाहता है कि उसका भाई उस नेअमत से मेहरूम हो जाए. यह मना है. बन्दे को चाहिये कि अल्लाह तआला की तरफ़ से उसे जो दिया गया है, उस पर राज़ी रहे. उसने जिस बन्दे को जो बुज़ुर्गी दी, चाहे दौलत और माल की, या दीन में ऊंचे दर्जे, यह उसकी हिकमत है. जब मीरास की आयत में ” लिज़्ज़करे मिस्लो हज़्ज़िल उनसयेन” उतरा और मरने वाले के तर्के में मर्द का हिस्सा औरत से दूना मुक़र्रर किया गया, तो मर्दों ने कहा कि हमें उम्मीद है कि आख़िरत में नेकियों का सवाब भी हमें औरतों से दुगना मिलेगा और औरतों ने कहा कि हमें उम्मीद है कि गुनाह का अज़ाब हमें मर्दों से आधा होगा. इस पर यह आयत उतरी और इसमें बताया गया कि अल्लाह तआला ने जिसको जो फ़ज़्ल दिया वह उसकी हिकमत है.

(11) हर एक को उसके कर्मों का बदला. उम्मुल मूमिनीन हज़रत उम्मे सलमा रदियल्लाहो अन्हा ने फ़रमाया कि हम भी अगर मर्द होते तो जिहाद करते और मर्दों की तरह जान क़ुर्बान करने का महान सवाब पाते. इस पर यह आयत उतरी और उन्हें तसल्ली दी गई कि मर्द जिहाद से सवाब हासिल कर सकते हैं तो औरतें शौहरों की फ़रमाँबरदारी और अपनी पवित्रता की हिफ़ाज़त करके सवाब हासिल कर सकती हैं.

(12) इससे अक़्दे मवालात मुराद है. इसकी सूरत यह है कि कोई मजहूलुन नसब शख़्स दूसरे से यह कहे कि तू मेरा मौला है, मैं मर जाऊं तो मेरा वारिस होगा और मैं कोई जिनायत करूँ तो तुझे दय्यत देनी होगी. दूसरा कहे मैंने क़ुबूल किया. उस सूरत में यह अक़्द सहीह हो जाता है और क़ुबूल करने वाला वारिस बन जाता है और दय्यत भी उस पर आ जाती है और दूसरा भी उसी की तरह से मजहूलुन नसब हो और ऐसा ही कहे और यह भी क़ुबूल कर ले तो उनमें से हर एक दूसरे का वारिस और उसकी दय्यत का ज़िम्मेदार होगा. यह अक़्द साबित है. सहाबा रदियल्लाहो अन्हुम इसके क़ायल हैं.

सूरए निसा – छटा रूकू

सूरए निसा – छटा रूकू 
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
मर्द अफ़सर हैं औरतों पर (1)
इसलिये कि अल्लाह ने उनमें एक को दूसरे पर बड़ाई दी  (2)
और इसलिये कि मर्दों ने उनपर अपने माल ख़र्च किये (3)
तो नेकबख़्त (ख़ुशनसीब) औरतें अदब वालियां हैं ख़ाविन्द (शौहर) के पीछे हिफ़ाज़त रखती हैं (4)
जिस तरह अल्लाह ने हिफ़ाज़त का हुक्म दिया और जिन औरतों की नाफ़रमानी का तुम्हें डर हो (5)
तो उन्हें समझाओ और उनसे अलग सोओ और उन्हें मारो(6)
फिर अगर वो तुम्हारे हुक्म में आजाएं तो उनपर ज़ियादती की कोई राह न चाहो बेशक अल्लाह बलन्द बड़ा है (7) (34)  
और अगर तुमको मियां बीबी के झगड़े का डर हो(8)
तो एक पंच मर्द वालों की तरफ़ से भेजो और एक पंच औरत वालों की तरफ़ से  (9)
ये दोनो अगर सुलह करना चाहे तो अल्लाह उनमें मेल कर देगा बेशक अल्लाह जानने वाला ख़बरदार है  (10) (35)
और अल्लाह की बन्दगी करो और उसका शरीक किसी को न ठहराओ (11)
और मां बाप से भलाई करो(12)
और रिश्तेदारों (13)
और यतीमों और मोहताजों (14)
और पास के पड़ोसी और दूर के पड़ोसी (15)
और करवट के साथी (16)
और राहगीर(17)
और अपनी बांदी (दासी) ग़ुलाम से(18)
बेशक अल्लाह को ख़ुश नहीं आता कोई इतराने वाला बड़ाई मारने वाला (19)(36)
जो आप कंजूसी करें और औरों से कंजूसी के लिये कहें (20)
और अल्लाह ने जो अपने फ़ज़्ल से दिया है उसे छुपाएं (21)
और काफ़िरों के लिये हमने ज़िल्लत का अज़ाब तैयार कर रखा है (37) और वो जो अपने माल लोगों के दिखावे को ख़र्च करते

हैं (22)
और ईमान नहीं लाते अल्लाह  और न क़यामत पर और जिसका साथी शैतान हुआ (23)
तो कितना बुरा साथी है (38) और उनका क्या नुक़सान था अगर ईमान लाते अल्लाह और क़यामत पर  और अल्लाह के दिये में से उसकी राह में ख़र्च करते (24)
और अल्लाह उनको जानता है (39) अल्लाह एक ज़र्रा भर ज़ुल्म नहीं फ़रमाता और अगर कोई नेकी हो तो उसे दूनी करता औरअपने पास से बड़ा सवाब देता है (40) तो कैसी होगी जब हम हर उम्मत से एक गवाह लाएं (25)
और ऐ मेहबूब, तुम्हें उनसब पर गवाह और निगहबान बनाकर लाएं (26)(41)
उस दिन तमन्ना करेंगे वो जिन्होने कुफ़्र किया और रसूल की नाफ़रमानी की काश उन्हें मिट्टी में दबाकर ज़मीन बराबर करदी जाए और कोई बात अल्लाह से न छुपा सकेंगे (27)(42)

तफसीर 
सूरए निसा – छटा रूकू

(1) तो औरतों को उनकी इताअत लाज़िम है और मर्दों को हक़ है कि वो औरतों पर रिआया की तरह हुक्मरानी करें. हज़रत सअद बिन रबीअ ने अपनी बीबी हबीबा को किसी ख़ता पर एक थप्पड़ मारा. उनके वालिद सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में ले गए और उनके शौहर की शिकायत की. इस बारे में यह आयत उतरी.

(2) यानी मर्दों को औरतों पर अक़्ल और सूझबूझ और जिहाद व नबुव्वत, ख़िलाफ़त, इमामत, अज़ान, ख़ुत्बा, जमाअत, जुमुआ, तकबीर, तशरीक़ और हद व क़िसास की शहादत के, और विरासत में दूने हिस्से और निकाह व तलाक़ के मालिक होने और नसबों के उनकी तरफ़ जोड़े जाने और नमाज़ रोज़े के पूरे तौर पर क़ाबिल होने के साथ, कि उनके लिये कोई  ज़माना ऐसा नहीं है कि नमाज़ रोजे़ के क़ाबिल न हों, और दाढ़ियों और अमामों के साथ फ़ज़ीलत दी.

(3) इस आयत से मालूम हुआ कि औरतों की आजीविका मर्दों पर वाजिब है.

(4) अपनी पवित्रता और शौहरों के घर, माल और उनके राज़ों की.

(5) उन्हें शौहर की नाफ़रमानी और उसकी फ़रमाँबरदारी न करने और उसके अधिकारों का लिहाज़ न रखने के नतीजे समझओ, जो दुनिया और आख़िरत में पेश आते हैं और अल्लाह के अज़ाब का ख़ौफ़ दिलाओ और बताओ कि हमारा तुम पर शरई हक़ है. और हमारी आज्ञा का पालन तुम पर फ़र्ज़ है. अगर इस पर भी न मानें…..

(6) हल्की मार.

(7) और तुम गुनाह करते हो फिर भी वह तुम्हारी तौबह कुबूल फ़रमा लेता है. तो तुम्हारे हाथ के नीचे की औरतें अगर ग़लती करने के बाद माफ़ी चाहें तो तुम्हें ज़्यादा मेहरबानी से माफ़ करना चाहिये और अल्लाह की क़ुदरत और बरतरी का लिहाज़ रखकर ज़ुल्म से दूर रहना चाहिये.

(8) और तुम देखो कि समझाना, अलग सोना, मारना कुछ भी कारामद न हो और दोनों के मतभेद दूर न हुए.

(9) क्योंकि क़रीब के लोग अपने रिश्तेदारों के घरेलू हालात से परिचित होते हैं और मियाँ बीबी के बीच मिलाप की इच्छा भी रखते हैं और दोनों पक्षों को उनपर भरोसा और इत्मीनान भी होता है और उनसे अपने दिल की बात कहने में हिचकिचाहट भी नहीं होती है.

(10) जानता है कि मियाँ बीवी में ज़ालिम कौन है. पंचों को मियाँ बीवी में जुदाई कर देने का इख़्तियार नहीं.

(11) न जानदार को न बेजान को, न उसके रब होने में, न उसकी इबादत में.

(12) अदब और आदर के साथ और उनकी ख़िदमत में सदा चौकस रहना और उन पर ख़र्च करने में कमी न करना. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने तीन बार फ़रमाया, उसकी नाक ख़ाक में लिपटे. हज़रत अबू हुरैरा ने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह किसकी ? फ़रमाया, जिसने बूढ़े माँ बाप पाए या उनमें से एक को पाया और जन्नती न हो गया.

(13) हदीस शरीफ़ में है, रिश्तेदारों के साथ अच्छा सुलूक करने वालों की उम्र लम्बी और रिज़्क़ वसीअ होता है. (बुख़ारी व मुस्लिम)

(14) हदीस में है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, मैं और यतीम की सरपरस्ती करने वाला ऐसे क़रीब होंगे जैसे कलिमे और बीच की उंगली (बुख़ारी शरीफ़). एक और हदीस में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, बेवा और मिस्कीन की इमदाद और ख़बरदारी करने वाला अल्लाह के रास्तें में जिहाद करने वाले की तरह है.

(15) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि जिब्रील मुझे हमेशा पड़ोसियों के साथ एहसान करने की ताकीद करते रहे, इस हद तक कि गुमान होता था कि उनको वारिस क़रार दे दें.

(16) यानी बीबी या जो सोहबत में रहे या सफ़र का साथी हो या साथ पढ़े या मजलिस और मस्जिद में बराबर बैठे.

(17) और मुसाफ़िर व मेहमान. हदीस में है, जो अल्लाह और क़यामत के दिन पर ईमान रखे उसे चाहिये कि मेहमान की इज़्ज़त करे. (बुख़ारी व मुस्लिम)

(18) कि उन्हें उनकी ताक़त से ज़्यादा तकलीफ़ न दो और बुरा भला न कहो और खाना कपड़ा उनकी ज़रूरत के अनुसार दो. हदीस में है, रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया जन्नत में बुरा व्यवहार करने वाला दाख़िल न होगा. (तिरमिज़ी)

(19) अपनी बड़ाई चाहने वाला घमण्डी, जो रिश्तेदारों और पड़ोसियों को ज़लील समझे.

(20) बुख़्ल यानी कंजूसी यह है कि ख़ुद खाए, दूसरे को न दे. “शेह” यह है कि न खाए न खिलाए. “सख़ा” यह है कि ख़ुद भी खाए दूसरों को भी खिलाए. “जूद” यह है कि आप न खाए दूसरे को खिलाए. यह आयत यहूदियों के बारे में उतरी जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तारीफ़ बयान करने में कंजूसी करते और आपके गुण छुपाते थे. इस से मालूम हुआ कि इल्म को छुपाना बुरी बात है.

(21) हदीस शरीफ़ में है कि अल्लाह को पसन्द है कि बन्दे पर उसकी नेअमत ज़ाहिर हो. अल्लाह की नेअमत का इज़हार ख़ूलूस के साथ हो तो यह भी शुक्र है और इसलिये आदमी को अपनी हैसियत के लायक़ जायज़ लिबासों में बेहतर लिबास पहनना मुस्तहब है.

(22) बुख़्ल यानी कंजूसी के बाद फ़ुज़ूल ख़र्ची की बुराई बयान फ़रमाई. कि जो लोग केवल दिखावे के लिये या नाम कमाने के लिये ख़र्च करते हैं और अल्लाह की ख़ुशी हासिल करना उनका लक्ष्य नहीं होता, जैसे कि मुश्रिक और मुनाफ़िक़, ये भी उन्हीं के हुक्म में हैं जिन का हुक्म ऊपर गुज़र गया.

(23) दुनिया और आख़िरत में, दुनिया में तो इस तरह कि वह शैतानी काम करके उसको ख़ुश करता रहा और आख़िरत में इस तरह कि हर काफ़िर एक शैतान के साथ आग की ज़ंजीर में जकड़ा होगा. (ख़ाज़िन)
(24) इसमें सरासर उनका नफ़ा ही था.

(25) उस नबी को, और वह अपनी उम्मत के ईमान और कुफ़्र पर गवाही दें क्योंकि नबी अपनी उम्मतों के कामों से बा-ख़बर होते हैं.

(26) कि तुम नबियों के सरदार हो और सारा जगत तुम्हारी उम्मत.

(27) क्योंकि जब वो अपनी ग़लती का इन्कार करेंगे और क़सम खाकर कहेंगे कि हम मुश्रिक न थे और हमने ख़ता न की थी तो उनके मुंहों पर मुहर लगा दी जाएगी और उनके शरीर के अंगों को ज़बान दी जाएगी, वो उनके ख़िलाफ़ गवाही देंगे.Filed under: 04. Al -Nisa | Leave a comment »

सूरए निसा – सातवाँ रूकू

सूरए निसा – सातवाँ रूकू 
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

ऐ ईमान वालो, नशे की हालत में नमाज़ के पास न जाओ (1)
जब तक इतना होश न हो कि जो कहो उसे समझो और न नापाकी की हालत में बे नहाए मगर मुसाफ़िरी में (2)
और अगर तुम बीमार हो (3)
या सफ़र में या तुम में से कोई क़ज़ाए हाजत (पेशाब पख़ाना) से आया  (4)
या तुमने औरतों को छुआ(5)
और पानी न पाया(6)
तो पाक मिट्टी से तयम्मुम करो (7)
तो अपने मुंह और हाथों का मसह (हाथ फेरना)  करो(8)
बेशक अल्लाह माफ़ करने वाला बख़्शने वाला है (43)
क्या तुमने उन्हें न देखा जिनको किताब से एक हिस्सा मिला (9)
गुमराही मोल लेते है(10)
और चाहते है (11)
तुम भी राह से बहक जाओ (44) और अल्लाह ख़ूब जानता है तुम्हारे दुश्मनों को  (12)
और अल्लाह काफ़ी है वाली (मालिक) (13)
और अल्लाह काफ़ी है मददगार (45) कुछ यहूदी कलामों की उनकी जगह से फेरते हैं (14)
और (15)
कहते है हमने सुना और न माना और (16)
सुनिये आप सुनाए न जाएं (17)
और राना कहते हैं (18)
ज़बाने फेर कर (19)
और दीन में तअने (लांछन) के लिये (20)
और अगर वो  (21)
कहते है कि हमने सुना और माना और हुज़ूर हमारी बात सुनें और हुज़ूर हमपर नज़र फ़रमाएं तो उनके लिये भलाई और रास्ती में
ज़्यादा होता लेकिन उनपर तो अल्लाह ने लानत की उनके कुफ्र की वजह से तो यक़ीन नहीं रखते मगर थोड़ा (22) (46)
ऐ किताब वालो ईमान लाओ उसपर जो हमने उतारा तुम्हारे साथ वाली किताब (23)
की पुष्टि फ़रमाता इससे पहले कि हम बिगाड़ें कुछ मुंहों को (24)
तो उन्हें फेर दे उनकी पीठ की तरफ़ या उन्हें लानत करें जैसी लानत की हफ़्ते वालों पर (25)
और ख़ुदा का हुक्म होकर रहे  (47) बेशक अल्लाह इसे नहीं बख़्शता कि उसके साथ कुफ्र किया जाए  और कुफ्र से नीचे जो कुछ है जिसे चाहे माफ़ फ़रमा देता है (26)
और जिसने ख़ुदा का शरीक ठहराया उसने बड़ा गुनाह का तूफ़ान बांधा (48) क्या तुमने उन्हें न देखा जो ख़ुद अपनी सुथराई बयान करते हैं (27)
कि अल्लाह जिसे चाहे सुथरा करे और उनपर ज़ुल्म न होगा ख़ुर्में के दाने के डोरे बराबर (28)(49)
देखो कैसा अल्लाह पर झूठ बांध रहे हैं (29) और यह काफ़ी है खुल्लम खुल्ला गुनाह (50)

तफसीर 
सूरए निसा – सातवाँ रूकू

(1) हज़रत अब्दुर रहमान बिन औफ़ ने सहाबा की एक जमाअत की दावत की. उसमें खाने के बाद शराब पेश की गई. कुछ ने पी, क्योंकि उस वक़्त तक शराब हराम न हुई थी. फिर मग़रिब की नमाज़ पढ़ी. इमाम नशे में “क़ुल या अय्युहल काफ़िरूना अअबुदो मा तअबुदूना व अन्तुम आबिदूना मा अअबुद” पढ़ गए और दोनों जगह “ला” (नहीं) छोड़ गए और नशे में ख़बर न हुई. और आयत का मतलब ग़लत हो गया. इस पर यह आयत उतरी और नशे की हालत में नमाज़ पढ़ने से मना फ़रमा दिया गया. तो मुसलमानों ने नमाज़ के वक़्तों में शराब छोड़ दी. इसके बाद शराब बिल्कुल हराम कर दी गई. इस से साबित हुआ कि आदमी नशे की हालत में कुफ़्र का कलिमा ज़बान पर लाने से काफ़िर नहीं होता. इसलिये कि “क़ुल या अय्युहल काफ़िरूना” में दोनों जगह “ला” का छोड़ देना कुफ़्र है, लेकिन उस हालत में हुज़ूर ने उस पर कुफ़्र का हुक्म न फ़रमाया बल्कि क़ुरआने पाक में उनको “या अय्युहल लज़ीना आमनू” (ऐ ईमान वालों) से ख़िताब फ़रमाया गया.

(2) जबकि पानी न पाओ, तयम्मुम कर लो.

(3) और पानी का इस्तेमाल ज़रूर करता हो.

(4) यह किनाया है बे वुज़ू होने से.

(5) यानी हमबिस्तरी की.

(6) इसके इस्तेमाल पर क़ादिर न होने, चाहे पानी मौजूद न होने के कारण या दूर होने की वजह से या उसके हासिल करने का साधन न होने के कारण या साँप, ख़तरनाक जंगली जानवर, दुश्मन वग़ैरह कोई रूकावट होने के कारण.

(7) यह हुक्म मरीज़ों, मुसाफ़िरों, जनाबत और हदस वालों को शामिल है, जो पानी न पाएं या उसके इस्तेमाल से मजबूर हों (मदारिक). माहवारी, हैज़ व निफ़ास से पाकी के लिये भी पानी से मजबूर होने की सूरत में तयम्मुम जायज़ है, जैसा कि हदीस शरीफ़ में आया है.

(8) तयम्मुम का तरीक़ा :

 तयम्मुम करने वाला दिल से पाकी हासिल करने की नियत करे. तयम्मुम में नियत शर्त है क्योंकि अल्लाह का हुक्म आया है. जो चीज़ मिट्टी की जिन्स से हो जैसे धूल, रेत, पत्थर, उन सब पर तयम्मुम जायज़ है. चाहे पत्थर पर धूल भी न हो लेकिन पाक होना इन चीज़ों में शर्त है. तयम्मुम में दो ज़र्बें हैं, एक बार हाथ मार कर चेहरे पर फेर लें, दूसरी बार हाथों पर. पानी के साथ पाक अस्ल है और तयम्मुम पानी से मजबूर होने की हालत में उसकी जगह लेता
है. जिस तरह हदस पानी से ज़ायल होता है, उसी तरह तयम्मुम से. यहाँ तक कि एक तयम्मुम से बहुत से फ़र्ज़ और नफ़्ल पढ़े जा सकते हैं. तयम्मुम करने वाले के पीछे ग़ुस्ल और वुज़ू वाले की नमाज़ सही है. ग़ज़वए बनी मुस्तलक़ में जब इस्लामी लश्कर रात को एक वीराने में उतरा जहाँ पानी न था और सुबह वहाँ से कूच करने का इरादा था, वहाँ उम्मुल मूमिनीन हज़रत आयशा रदियल्लाहो अन्हा का हार खो गया. उसकी तलाश के लिये सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने वहाँ क़याम फ़रमाया. सुबह हुई तो पानी न था. अल्लाह तआला ने तयम्मुम की आयत उतारी. उसैद बिन हदीर रदियल्लाहो अन्हो ने कहा कि ऐ आले अबूबक्र, यह तुम्हारी पहली ही बरकत नहीं है, यानी तुम्हारी बरकत से मुसलमानों को बहुत आसानियाँ हुई और बहुत से फ़ायदे पहुंचे. फिर ऊंट उठाया गया तो उसके नीचे हार मिला. हार खो जाने और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के
न बताने में बहुत हिकमत हैं. हज़रत सिद्दीक़ा के हार की वजह से क़याम उनकी बुज़ुर्गी और महानता ज़ाहिर करता है. सहाबा का तलाश में लग जाना, इसमें हिदायत है कि हुज़ूर की बीबियों की ख़िदमत ईमान वालों की ख़ुशनसीबी है, और फिर तयम्मुम का हुक्म होना, मालूम होता है कि हुज़ूर की पाक बीबियों की ख़िदमत का ऐसा इनआम है, जिससे क़यामत तक मुसलमान फ़ायदा उठाते रहेंगे. सुब्हानल्लाह !

(9) वह यह कि तौरात से उन्होंने सिर्फ़ हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की नबुव्वत को पहचाना और उसमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का जो बयान था उस हिस्से से मेहरूम रहे और आपके नबी होने का इन्कार कर बैठै. यह आयत रिफ़ाआ बिन ज़ैद और मालिक बिन दख़्श्म यहूदियों के बारे में उतरी. ये दोनों जब रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से बात करते तो ज़बान टेढ़ी करके बोलते.

Hazrat ibrahim bin adham in hindi

(10) हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत का इन्कार करके.

(11) ऐ मुसलमानों !

(12) और उसने तुम्हें भी उनकी दुश्मनी पर ख़बरदार कर दिया तो चाहिये कि उनसे बचते रहो.

(13) और जिसके काम बनाने वाला अल्लाह हो उसे क्या डर.

(14) जो तौरात शरीफ़ में अल्लाह तआला ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नात में फ़रमाए.

(15) जब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उन्हें कुछ हुक्म फ़रमाते हैं तो.

(16) कहते हैं.

(17) यह कलिमा दो पहलू रखता है. एक पहलू तो यह कि कोई नागवार बात आपको सुनने में न आए और दूसरा पहलू यह कि आपको सुनना नसीब न हो.
(18) इसके बावुजूद कि इस कलिमे के साथ सम्बोधन करने को मना किया गया है क्योंकि उनकी ज़बान में ख़राब मानी रखता है.

(19) हक़ यानी सच्चाई से बातिल यानी बुराई की तरफ़

(20) कि वो अपने दोस्तों से कहते थे कि हम हुज़ूर की बुराई करते हैं. अगर आप नबी होते तो आप इसको जान लेते. अल्लाह तआला ने उनके दिल में छुपी कटुता और ख़बासत को ज़ाहिर फ़रमा दिया.

(21) इन कलिमात की जगह अदब और आदर करने वालों के तरीक़े पर.

(22) इतना कि अल्लाह ने उन्हें पैदा किया और रोज़ी दी और इतना काफ़ी नहीं जब तक कि ईमान वाली बातों को न मानें और सब की तस्दीक़ न करें.

(23) तौरात.

(24) आँख नाक कान पलकें वग़ैरह नक़्शा मिटा कर.

(25) इन दोनों बातों में से एक ज़रूर लाज़िम है. और लानत तो उन पर ऐसी पड़ी कि दुनिया उन्हें बुरा कहती है. यहाँ मुफ़स्सिरों के कुछ अलग अलग क़ौल हैं. कुछ इस फटकार का पड़ना दुनिया में बताते हैं, कुछ आख़िरत में. कुछ कहते है कि लानत हो चुकी और फटकार पड़ गई. कुछ कहते हैं कि अभी इन्तिज़ार है. कुछ का क़ौल है कि यह फटकार उस सूरत में थी जबकि यहूदियों में से कोई ईमान न लाता और चूंकि बहुत से यहूदी ईमान ले आए, इसलिये शर्त नहीं पाई गई और फटकार उठ गई. हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम जो यहूदी आलिमों के बड़ों में से हैं, उन्होंने मुल्के शाम से वापस आते हुए रास्ते में यह आयत सुनी और अपने घर पहुंचने से पहले इसलाम लाकर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह मैं नहीं ख़याल करता था कि मैं अपना मुंह पीठ की तरफ़ फिर जाने से पहले और चेहरे का नक़्शा मिट जाने से पहले आपकी ख़िदमत में हाज़िर हो सकूंगा, यानी इस डर से उन्होंने ईमान लाने में जल्दी की क्योंकि तौरात शरीफ़ से उन्हें आपके सच्चे रसूल होने का यक़ीनी इल्म था, इसी डर से कअब अहबार जो यहूदियों में बड़ी बुज़ुर्गी रखते थे, हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो से यह आयत सुनकर मुसलमान हो गए.

(26) मानी यह हैं कि जो कुफ़्र पर मरे उसकी बख़्शिश नहीं. उसके लिये हमेशगी का अज़ाब है और जिसने कुफ़्र न किया हो, वह चाहे कितना ही बड़ा गुनाह करने वाला हो, और तौबह के बग़ैर मर जाए, तो उसका बदला अल्लाह की मर्ज़ी पर है, चाहे माफ़ फ़रमाए या उसके गुनाहों पर अज़ाब करे फिर अपनी रहमत से जन्नत में दाख़िल फ़रमाए. इस आयत में यहूदियों को ईमान की तरग़ीब है और इस पर भी प्रमाण है कि यहूदियों पर शरीअत के शब्दों में मुश्रिक शब्द लागू होना सही है.

(27) यह आयत यहूदियों और ईसाईयों के बारे में नाज़िल हुई जो अपने आपको अल्लाह का बेटा और उसका प्यारा बताते थे और कहते थे कि यहूदियों और ईसाईयों के सिवा कोई जन्नत में दाख़िल न होगा. इस आयत में बताया गया कि इन्सान का, दीनदारी, नेक काम, तक़वा और अल्लाह की बारगाह में क़ुर्ब और मक़बूलियत का दावेदार होना और मुंह से अपनी तारीफ़ करना काम नहीं आता.

(28) यानी बिल्कुल ज़ुल्म न होगा. वही सज़ा दी जाएगी जो उनका हक़ है.

(29) अपने आपको गुनाह और अल्लाह का प्यारा बताकर

सूरए निसा – बाईसवाँ रूकू

सूरए निसा – बाईसवाँ रूकू 
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला 

ऐ मेहबूब, किताब वाले  (1)
तुमसे सवाल करते हैं कि उनपर आसमान से एक किताब उतार दो (2)
तो वो तो मूसा से इससे भी बड़ा सवाल कर चुके  (3)
कि बोले हमें अल्लाह को खुल्लमखुल्ला दिखा दो तो उन्हें कड़क ने आ लिया उनके गुनाहों पर फिर बछड़ा ले बैठे  (4)
बाद इसके कि रौशन आयतें (5)
उनके पास आ चुकीं तो हमने यह माफ़ फ़रमा दिया (6)
और हमने मूसा को रौशन (खुला) ग़लबा दिया (7)(153)
फिर हमने उनपर तूर को ऊचां किया उनसे एहद लेने को और उनसे फ़रमाया कि हफ़्ते में हद से न बढ़ो (8)
और हमने उनसे गाढ़ा एहद लिया  (9) (154)
तो उनकी कैसी बद एहदियों के सबब हमने उनपर लअनत की और इसलिये कि वो अल्लाह की निशानियों के इन्कारी हुए (10)
और नबियों को नाहक़ शहीद करते  (11)
और उनके इस कहने पर कि हमारे दिलों पर ग़लाफ़ हैं  (12)
बल्कि अल्लाह ने उनके कुफ़्र के सबब उनके दिलों पर मुहर लगा दी है तो ईमान नहीं लाते मगर थोड़े (155) और इसलिये कि उन्होंने कुफ़्र किया (13)
और मरयम पर बड़ा बोहतान  (आरोप) उठाया (156) और उनके इस कहने पर कि हमने मसीह ईसा मरयम के बेटे अल्लाह के रसूल को शहीद किया (14)
और है यह कि उन्होंने न उसे क़त्ल किया और न उसे सूली दी बल्कि उनके लिये उनकी शबीह का  (उनसे मिलता जुलता) एक बना दिया गया (15)
और वो जो उसके बारे में विरोध कर रहे हैं ज़रूर उसकी तरफ़ से शुबह में पड़े हुए हैं  (16)
उन्हें उसकी कुछ भी ख़बर नहीं (17)
मगर यह गुमान की पैरवी  (18)
और बेशक उन्होंने उसको क़त्ल नहीं किया  (19)  (157)
बल्कि अल्लाह ने उसे अपनी तरफ़ उठा लिया (20)
और अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है  (158) कोई किताबी  ऐसा नहीं जो उसकी मौत से पहले उसपर ईमान न लाए (21)
और क़यामत के दिन वह उनपर गवाह होगा  (22)  (159)
तो यहूदियों के बड़े ज़ुल्म के (23)
सबब हमने वो कुछ सुथरी चीज़ें कि उनके लिये हलाल थीं (24)
उनपर हराम फ़रमा दीं और इसलिये कि उन्होंने बहुतों को अल्लाह की राह से रोका  (160) और इसलिये कि वो सूद लेते हालांकि वो इससे मना किये गए थे और लोगों का माल नाहक़ खा जाते  (25)
और उनमें जो काफ़िर हुए हमने उनके लिए दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है  (161) हाँ जो उनमें इल्म में पक्के (26)
और ईमान वाले हैं वो ईमान लते हैं उसपर जो ऐ मेहबूब, तुम्हारी तरफ़ उतरा और जो तुमसे पहले उतरा (27)
और नमाज़ क़ायम रखने वाले और ज़कात देने वाले और अल्लाह और क़यामत पर ईमान लाने वाले ऐसों को जल्द ही हम बड़ा सवाब देंगे (162)

तफसीर 
सूरए निसा _ बाईसवाँ रूकू

(1) बग़ावत के अन्दाज़ में.

(2) एक साथ ही. यहूदियों में कअब बिन अशरफ़ फ़ख़्ख़ास बिन आज़ूरा ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा कि अगर आप नबी हैं तो हमारे पास आसमान से एक साथ एक बार में ही किताब लाइये जैसा हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम तौरात लाए थे. यह सवाल उनका हिदायत और अनुकरण की तलब के लिये न था बल्कि सरकशी और बग़ावत से था. इसपर यह आयत उतरी.

Mot K Waqt Ki Kafiyat in Hindi

(3) यानी यह सवाल उनका भरपूर जिहालत से है और इस क़िस्म की जिहालतों मे उनके बाप दादा भी गिरफ़्तार थे. अगर सवाल हिदायत की तलब के लिये होता तो पूरा कर दिया जाता मगर वो तो किसी हाल में ईमान लाने वाले न थे.

(4) उसको पूजने लगे.

(5) तौरात और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के चमत्कार जो अल्लाह तआला के एक होने और हज़रत मूसा की सच्चाई पर खुली दलील थे, और  इसके बावुजूद कि तौरात हमने एक साथ ही उतारी थी. लेकिन “बुरी ख़सलत वाले को हज़ार बहाने”, अनुकरण के बजाय उन्होंने ख़ुदा के देखने का सवाल किया.

(6) जब उन्होंने तौबह की. इसमें हुज़ूर के जमाने के यहूदियों के लिये उम्मीद है कि वो भी तौबह करें तो अल्लाह तआला उन्हें भी अपने क़रम से माफ़ फ़रमाए.

(7) ऐसा क़ब्ज़ा अता फ़रमाया कि जब आपने बनी इस्राईल को तौबह के लिये ख़ुद उनके अपने क़त्ल का हुक्म दिया, वो इन्कार न कर सके और उन्होंने हुक्म माना.

(8) यानी मछली का शिकार वग़ैरह जो अमल उस दिन तुम्हारे लिये हलाल नहीं, न करो. सुरए बक़रह में इन तमाम आदेशों की तफ़सील गुज़र चुकी.

(9) कि जो उन्हें हुक्म दिया गया है, करें और  जिसे रोका गया है, उससे दूर रहे. फिर उन्होंने इस एहद को तोड़ा.

(10) जो नबियों की सच्चाई के प्रमाण थे, जैसे कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के चमत्कार.

(11) नबियों का क़त्ल करना तो नाहक़ है ही, किसी तरह हक़ हो ही नहीं सकता. लेकिन यहाँ मक़सूद यह है कि उनके घमण्ड में भी इसका कोई हक़ न था.

(12) लिहाज़ा कोई नसीहत और उपदेश कारगर नहीं हो सकता.

(13) हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के साथ भी.

(14) यहूदियों ने दावा किया कि उन्होंने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को क़त्ल कर दिया और ईसाइयों ने उसकी तस्दीक़ की थी.अल्लाह तआला ने इन दोनो के दावे ग़लत कर दिये.

(15) जिसको उन्होंने क़त्ल किया और ख़्याल करते रहे कि यह हज़रत ईसा हैं, जबकि उनका यह ख़्याल ग़लत था.

(16) और यक़ीनी नहीं कह सकते कि वह क़त्ल होने वाला शख़्स कौन है. कुछ कहते हैं कि यह मक़तूल ईसा हैं, कुछ कहते हैं कि यह चेहरा तो ईसा का है और  जिस्म उनका नहीं, लिहाज़ा यह वह नहीं, इसी संदेह में हैं.

(17) जो वास्तवकिता और  हक़ीक़त है.

(18) और अटकलें दौड़ाना.

(19) उनका क़त्ल का दावा झूटा है.

(20) सही व सालिम आसमान की तरफ़. हदीसों में इसकी तफ़सील आई है. सूरए आले इमरान में इस घटना का ज़िक्र गुज़र चुका.

(21) इस आयत की तफ़सीर में कुछ क़ौल हैं, एक क़ौल यह है कि यहूदियों और ईसाइयों को अपनी मौत के वक़्त जब अज़ाब के फ़रिश्ते नज़र आते हैं तो वो हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर ईमान ले आते हैं जिनके साथ उन्होंने कुफ़्र किया था और उस वक़्त का ईमान क़ुबूल और विश्वसनीय नहीं. दूसरा क़ौल यह है कि क़यामत के क़रीब जब हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम आसमान से उतरेंगे उस वक़्त के सारे किताब वाले उनपर ईमान ले आएंगे. उस वक़्त हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम शरीअतें मुहम्मदी के मुताबिक हुक्म देंगे और उसी दीन के इमामों में से एक इमाम की हैसियत में होंगे, और  ईसाइयों ने उनकी निस्बत जो गुमान बांधे रखे हैं उनको झुटलाएंगे, दीने मुहम्मदी का प्रचार करेंगे, उस वक़्त यहूदियों और ईसाइयों को या तो इस्लाम क़ूबूल करना होगा या क़त्ल करदिये जाएंगे. जिज़िया क़ुबूल करने का हुक्म हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के उतरने के वक्त तक है. तीसरे क़ौल के अनुसार आयत के मानी यह है कि हर किताबी अपनी मौत से पहले सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान ले आएगा, लेकिन मौत के वक्त का ईमान मक़बूल नहीं, फ़ायदा न पहुंचाएगा.

हज़रते अबू हुरैरह रदियल्लाहू अन्हु की अक्ल का राज़

सूरए निसा -तेईसवाँ रूकू

सूरए निसा _ तेईसवाँ रूकू 
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला 

बेशक ऐ मेहबूब, हमने तुम्हारी तरफ़ वही भेजी जैसी वही नूह और उसके बाद के पैग़म्बरों को भेजी (1)
और  हमने इब्राहीम और इस्माईल और इस्हाक़ और याक़ूब और उनके बेटों और ईसा और अय्यूब और यूनुस और  हारून और सुलैमान को वही की और हमने दाऊद को ज़ुबूर अता फ़रमाई (163) और रसूलों को जिनका ज़िक्र आगे हम तुमसे  (2)
फ़रमा चुके और उन रसूलों को जिनका ज़िक्र तुमसे न फ़रमाया (3)
और अल्लाह ने मूसा से हक़ीक़त में कलाम फ़रमाया (4) (164)
रसूल ख़ुशख़बरी देते (5)
और डर सुनाते (6)
कि रसूलों के बाद अल्लाह के यहाँ लोगों को कोई मजबूरी न रहे (7)
और अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला है (165) लेकिन ऐ मेहबूब अल्लाह उसका गवाह है जो उसने तुम्हारी तरफ़ उतारा वह उसने अपने इल्म से उतारा है और फ़रिश्तें गवाह हैं और अल्लाह की गवाही काफ़ी (166) वो जिन्होंने कुफ़्र किया (8)
और अल्लाह की राह से रोका (9)
बेशक वो दूर की गुमराही में पड़े (167) बेशक जिन्होंने कुफ़्र किया  (10)
और हद से बढ़े  (11)
अल्लाह कभी उन्हें न बख़्शेगा (12)
और न उन्हें कोई राह दिखाए  (168) मगर जहन्नम का रास्ता कि उसमें हमेशा हमेशा रहेंगे और यह अल्लाह को आसान है (169) ऐ लोगो तुम्हारे पास ये रसूल (13)
हक़ के साथ तुम्हारे रब की तरफ़ से तशरीफ़ लाए तो ईमान लाओ अपने भले को और अगर तुम कुफ़्र करो (14)
तो बेशक अल्लाह ही का है जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है (170) ऐ किताब वालो अपने दीन में ज़ियादती न करो (15)
और अल्लाह पर न कहो मगर सच (16)
मसीह ईसा मरयम का बेटा (17)
अल्लाह का रसूल ही है और उसका एक कलिमा (18)
कि मरयम की तरफ़ भेजा और उसके यहां की एक रूह, तो अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाओ (19)
और तीन न कहो (20)
बाज़ रहो अपने भले को, अल्लाह तो एक ही ख़ुदा है (21)
पाकी उसे इससे कि उसके कोई बच्चा हो. उसी का माल है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में हैं (22)
और अल्लाह काफ़ी कारसाज़ है (171)

तफसीर 
सूरए निसा _ तेईसवाँ रूकू

(1) यहूदियों और ईसाईयों ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से जो यह सवाल किया था कि उनके लिये आसमान से एक साथ ही किताब उतारी जाए तो वो नबुव्वत पर ईमान लाएं. इस पर यह आयत उतरी और उनपर तर्क क़ायम किया गया कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के सिवा बहुत से नबी हैं. जिनमें से ग्यारह के नाम यहां आयत में बयान किये गए हैं. किताब वाले इन सबकी नबुव्वत को मानते हैं. इन सब हज़रात में से किसी पर एक साथ किताब न उतरी तो इस वजह से उनकी नबुव्वत तस्लीम करने में किताब वालों को कुछ ऐतिराज़ न हुआ तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत तस्लीम करने में क्या मजबुरी है. और रसूलों के भेजने का मक़सद लोगों की हिदायत और उनको अल्लाह तआला की तौहीद और पहचान का पाठ देना और ईमान को पुख़्ता करना और ईबादत के तरीक़े की सीख देना है. किताब के कई चरणों में उतरने से यह उद्देश्य भरपूर तरीक़े से हासिल होता है कि थोड़ा थोड़ा आसानी से दिल मे बैठता चला जाता है. इस हिकमत को न समझना और ऐतिराज़ करना हद दर्जे की मूर्खता है.

(2) क़ुरआन शरीफ़ में नाम बनाम फ़रमा चुके हैं.

(3) और अब तक उनके नामों की तफ़सील क़ुरआने पाक में ज़िक्र नहीं फ़रमाई गई.

(4) तो जिस तरह हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से बेवास्ता कलाम फ़रमाना दूसरे नबियों की नबुव्वत के आड़े नहीं आता, जिनसे इस तरह कलाम नहीं फ़रमाया गया, ऐसे ही हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर किताब का एक साथ उतरना दूसरे नबियों की नबुव्वत में कुछ भी आड़े नहीं आता.

(5) सवाब की, ईमान लाने वालों को.

सूरतुल फ़ातिहा Al- Fatiha

(6) अज़ाब का, कुफ़्र करने वालों को.

(7) और यह कहने का मौक़ा न हो कि अगर हमारे पास रसूल आते तो हम ज़रूर उनका हुक्म मानते और अल्लाह के आज्ञाकारी और फ़रमाँबरदार होते. इस आयत से यह मसअला मालूम होता है कि अल्लाह तआला रसूलों की तशरीफ़ आवरी से पहले लोगों पर अज़ाब नहीं फ़रमाता जैसा दूसरी जगह इरशाद फ़रमाया “वमा कुन्ना मुअज्ज़िबीना हत्ता नबअसा रसूलन” (और हम अज़ाब करने वाले नहीं जब तक रसूल न भेज लें. सूरए बनी इस्राईल, आयत 15) और यह मसअला भी साबित होता है कि अल्लाह की पहचान शरीअत के बयान और नबियों की ज़बान से ही हासिल होती है, सिर्फ अक़्ल से इस मंज़िल तक पहुंचना मयस्सर नहीं होता.

(8) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत का इन्कार करके.

(9) हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नअत और विशेषताएं छुपाकर और लोगो के दिलों में शुबह डाल कर. (यह हाल यहूदियो का है)

(10) अल्लाह के साथ.

(11) अल्लाह की किताब में हुज़ूर के गुण बदलकर और आपकी नबुव्वत का इन्कार करके.

(12) जब तक वो कुफ़्र पर क़ायम रहें या कुफ़्र पर मरें.

(13) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

(14) और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की रिसालत का इन्कार करो तो इस मे उनका कुछ नुक़सान नहीं और अल्लाह तुम्हारे ईमान से बेनियाज़ है.

(15) यह आयत ईसाइयों के बारे में उतरी जिनके कई सम्प्रदाय हो गए थे और हर एक हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की निस्बत अलग अलग कुफ़्री अक़ीदा रखता था. नस्तूरी आपको ख़ुदा का बेटा कहते थे. मरक़ूसी कहते कि वो तीन में के तीसरे हैं और इस कलिमे की तौजीहात में भी मतभेद था. कुछ तीन ताक़तें मानते थे और कहते थे कि बाप, बेटा और रूहुलक़ुदुस, बाप से ज़ात, बेटे से ईसा, रूहुल क़ुदुस से उनमें डाली जानेवाली ज़िन्दगी मुराद लेते थे. तो उनके नज़दीक मअबूद तीन थे और इस तीन को एक बताते थे. “तीन में एक और एक तीन में” के चक्कर में गिरफ्तार थे, कुछ कहते थे कि ईसा नासूतियत और उलूहियत के संगम है, माँ की तरफ़ से उनमें नासूतियत आई और बाप की तरफ़ से उनमें उलूहियत आई.  यह फ़िरक़ाबन्दी ईसाइयों में एक यहूदी ने पैदा की जिसका नाम पोलूस था और उसी ने उन्हें गुमराह करने के लिये इस क़िस्म के अक़ीदों की तालीम दी. इस आयत में किताब वालों को हिदायत की गई कि वो हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में इफ़रात व तफ़रीत (बहुत ज़्यादा, बहुत कम) से बाज़ रहे. ख़ुदा और ख़ुदा का बेटा भी न कहें और उनकी तौहीन भी न करें.

(16) अल्लाह का शरीक और बेटा भी किसी को न बनाओ और हुलूल व इत्तिहाद के ऐब भी मत लगाओ और इस सच्चे अक़ीदे पर रहो कि….

(17) है और उस मोहतरम के लिये इसके सिवा कोई नसब नहीं.

(18) कि “हो जा” फ़रमाया और वह बग़ैर बाप और बिना नुत्फ़े के केवल अल्लाह के हुक्म से पैदा हो गए.

(19) और तस्दीक़ करो कि अल्लाह एक है, बेटे और औलाद से पाक है, उसके रसूलों की तस्दीक़ करो और इसकी कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम अल्लाह के रसूलों में से हैं.

(20) जैसा कि ईसाइयों का अक़ीदा है कि वह कुफ़्रे महज़ है.

(21) कोई उसका शरीक नहीं.

(22) और वह सब का मालिक है, और जो मालिक हो, वह बाप नहीं हो सकता.

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सूरए निसा – चौबीसवाँ रूकू

Posted on February 8, 2011 by Kanzul Iman in hindi (Kalamur Rahman)

सूरए निसा – चौबीसवाँ रूकू 

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

मसीह अल्लाह का बन्दा बनने से कुछ नफ़रत नहीं करता (1)
और न मुक़र्रब फ़रिश्ते और जो अल्लाह की बन्दगी से नफ़रत और तकब्बुर (घमण्ड) करे तो कोई दम जाता है कि वह सबको अपनी तरफ़ हांकेगा (2)(172)
तो लोग जो ईमान लाए और अच्छे काम किये उनकी मज़दूरी उन्हें भरपूर देकर अपने फ़ज़्ल से उन्हें और ज़्यादा देगा और वो जिन्होंने (3)
नफ़रत और तकब्बुर किया था उन्हें दर्दनाक सज़ा देगा और अल्लाह के सिवा न अपना कोई हिमायती पाएंगे न मददगार (173) ऐ लोगो बेशक तुम्हारे पास अल्लाह की तरफ़ से खुली दलील आई (4)
और हमने तुमहारी तरफ़ रौशन नूर उतारा (5) (174)
तो वो जो अल्लाह पर ईमान लाए और उसकी रस्सी मज़बूत थामी तो जल्द ही अल्लाह उन्हें अपनी रहमत और अपने फ़ज़्ल में दाख़िल करेगा (6)
और उन्हें अपनी तरफ़ सीधी राह दिखाएगा (175) ऐ मेहबूब तुमसे फ़तह पूछते हैं तुम फ़रमा दो कि अल्लाह तुम्हें कलाला (7)
में फ़तवा देता है अगर किसी मर्द का देहान्त हो जो बेऔलाद है (8)
और उसकी एक बहन हो तो तर्के में उसकी बहन का आधा है (9)
मर्द अपनी बहन का वारिस होगा अगर बहन की औलाद न हो (10)
फिर अगर दो बहनें हों तर्के में उनका दो तिहाई और अगर भाई बहन हों मर्द भी और औरतें भी तो मर्द का हिस्सा दो औरतों के बराबर, अल्लाह तुम्हारे लिये साफ़ बयान फ़रमाता है कि कहीं बहक न जाओ और अल्लाह हर चीज़ जानता है (176)

तफसीर 
सूरए निसा _ चौबीसवाँ रूकू

(1) नजरान के ईसाइयों का एक प्रतिनिधि मण्डल सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुआ. उसने हुज़ूर से कहा कि आप हज़रत ईसा को ऐब लगाते हैं कि वह अल्लाह के बन्दे हैं. हुज़ूर ने फ़रमाया कि हज़रत ईसा के लिये यह आर या शर्म की बात नहीं. इसपर यह आयत उतरी.

(2) यानी आख़िरत में इस घमण्ड की सज़ा देगा.

(3) अल्लाह की इबादत बजा लाने से.

(4) “वाज़ेह दलील” या खुले प्रमाण से सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की पाक ज़ात मुराद है, जिनकी सच्चाई पर उनके चमत्कार गवाह हैं, और इन्कार करने वालों को हैरत में डाल देते हैं.

(5) यानी क़ुरआने पाक.

(6) और जन्नत और ऊंचे दर्जे अता फ़रमाएगा.

(7) कलाला उसको कहते है जो अपने बाद न बाप छोड़े न औलाद.

(8) हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि वह बीमार थे तो रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हज़रत सिद्दीक़े अकबर रदियल्लाहो अन्हो के साथ तबियत पूछने तशरीफ़ लाए.हज़रत जाबिर बेहोश थे. हज़रत ने वुज़ू फ़रमाकर वुज़ू का पानी उनपर डाला. उन्हें फ़ायदा हुआ. आँख खोल कर देखा तो हुज़ूर तशरीफ़ फ़रमा हैं. अर्ज़ किया या रसूलल्लाह, मैं अपने माल का क्या इन्तज़ाम करूं. इस पर यह आयत उतरी. (बुख़ारी व मुस्लिम). अबू दाऊद की रिवायत में यह भी है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हज़रत जाबिर रदियल्लाहो अन्हो से फ़रमाया, ऐ जाबिर मेरे इल्म में तुम्हारी मौत इस बीमारी से नहीं है. इस हदीस से कुछ मसअले मालूम हुए. बुज़ुर्गों के वुज़ू का पानी तबर्रूक है और उसको शिफ़ा पाने के लिये इस्तेमाल करना सुन्नत है. मरीज़ों की मिज़ाज़पुर्सी और अयादत सुन्नत है. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को अल्लाह तआला ने ग़ैब के उलूम अता किये हैं, इसलिये हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को मालूम था कि हज़रत जाबिर की मौत इस बीमारी से नहीं है.

(9) अगर वह बहन सगी या बाप शरीक हो.

(10) यानी अगर बहन बेऔलाद मरी और भाई रहा तो वह भाई उसके कुछ माल का वारिस होगा.

11wi shareef ka amal 1 saal tak jadu se nijat

surah baqarah in hindi Tafseer k saath

आयतें: 286 रूकू 40.

सूरतुल बक़रह पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
अलिफ़ लाम मीम(2)
वह बुलन्द रूत्बा किताब कोई शक की जगह नहीं(3)
इसमें हिदायत है डर वालों को,(4)
वो जो बेदेखे ईमान लाएं,(5)
और नमाज़ क़ायम रखें,(6)
और हमारी दी हुई रोज़ी में से हमारी राह में उठाएं(7)
और वो कि ईमान लाएं उस पर जो ए मेहबूब तुम्हारी तरफ़ उतरा और जो तुम से पहले उतरा,(8)
और आख़िरत पर यक़ीन रख़े (9)
वही लोग अपने रब की तरफ़ से हिदायत पर हैं और वही मुराद को पहुंचने वाले
बेशक वो जिन की क़िसमत में कुफ्र है(10)
उन्हें बराबर है चाहे तुम उन्हें डराओ या न डराओ वो ईमान लाने के नहीं
अल्लाह ने उनके दिलों पर और कानों पर मुहर कर दी और आखों पर घटा टोप है(11)
और उनके लिये बड़ा अज़ाब

तफ़सीर : सूरए बक़रह _ पहला रूकू

1. सूरए बक़रह: यह सूरत मदीना में उतरी. हज़रत इब्ने अब्बास (अल्लाह तआला उनसे राज़ी रहे) ने फ़रमाया मदीनए तैय्यिबह में सबसे पहले यही सूरत उतरी, सिवाय आयत “वत्तक़ू यौमन तुर जऊन” के कि नबीये करीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के आख़िरी हज में मक्कए मुकर्रमा में उतरी. (ख़ाज़िन) इस सूरत में 286 आयतें, चालीस रूकू, छ: हज़ार एक सौ अक्कीस कलिमे (शब्द) 25500 अक्षर यानी हुरूफ़ हैं.(ख़ाज़िन)

पहले क़ुरआन शरीफ़ में सूरतों के नाम नहीं लिखे जाते थे. यही तरीक़ा हज्जाज बिन यूसुफे़ सक़फ़ी ने निकाला. इब्ने अरबी का कहना है कि सूरए बक़रह में एक हज़ार अम्र यानी आदेश, एक हज़ार नही यानी प्रतिबन्ध, एक हज़ार हुक्म और एक हज़ार ख़बरें हैं. इसे अपनाने में बरक़त और छोड़ देने में मेहरूमी है. बुराई वाले जादूगर इसकी तासीर बर्दाश्त करने की ताक़त नहीं रखते. जिस  घर में ये सूरत पढ़ी जाए, तीन दिन तक सरकश शैतान उस में दाख़िल नहीं हो सकता. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है कि शैतान उस घर से भागता है जिस में यह सूरत पढ़ी जाय. बेहक़ी और सईद बिन मन्सूर ने हज़रत मुग़ीरा से रिवायत की कि जो कोई सोते वक्त़ सूरए बक़रह की दस आयतें पढ़ेगा, वह क़ुरआन शरीफ़ को नहीं भूलेगा. वो आयतें ये है: चार आयतें शुरू की और आयतल कुर्सी और दो इसके बाद की और तीन सूरत के आख़िर की.

तिबरानी और बेहक़ी ने हज़रत इब्ने उमर (अल्लाह उन से राज़ी रहे) से रिवायत की कि हुज़ूर (अल्लाह के दूरूद और सलाम हों उनपर) ने फ़रमाया _मैयत को दफ्न करके क़ब्र के सिरहाने सूरए बक़रह की शुरू की आयतें और पांव की तरफ़ आख़िर की आयतें पढ़ो.

शाने नुज़ूल यानी किन हालात में उतरी:_ अल्लाह तआला ने अपने हबीब (अल्लाह के दूरूद और सलाम हों उनपर) से एक ऐसी किताब उतारने का वादा फ़रमाया था जो न पानी से धोकर मिटाई जा सके, न पुरानी हो. जब क़ुरआन शरीफ़ उतरा तो फ़रमाया “ज़ालिकल किताबु” कि वह किताब जिसका वादा था, यही है. एक कहना यह है कि अल्लाह तआला ने बनी इस्त्राईल से एक किताब उतारने का वादा फ़रमाया था, जब हुज़ूर ने मदीनए तैय्यिबह को हिज़रत फ़रमाई जहाँ यहूदी बड़ी तादाद में थे तो “अलिफ़, लाम मीम, ज़ालिकल किताबु” उतार कर उस वादे के पूरे होने की ख़बर दी. (ख़ाजिन)

2. अलिफ़ लाम मीम:_ सूरतों के शुरू में जो अलग से हुरूफ़ या अक्षर आते है उनके बारे में यही मानना है कि अल्लाह के राज़ों में से है और मुतशाबिहात यानी रहस्यमय भी. उनका मतलब अल्लाह और रसूल जानें. हम उसके सच्चे होने पर ईमान लाते

3. इसलिये कि शक उसमें होता है जिसका सूबूत या दलील या प्रमाण न हो. क़ुरआन शरीफ़ ऐसे खुले और  ताक़त वाले सुबूत या प्रमाण रखता है जो जानकार और इन्साफ वाले आदमी को इसके किताबे इलाही और सच होने के यक़ीन पर मज़बूत करते हैं. तो यह किताब किसी तरह शक के क़ाबिल नहीं, जिस तरह अन्धे के इन्कार से सूरज का वुजूद या अस्तित्व संदिग्ध या शुबह वाला नहीं होता, ऐसे ही दुश्मनी रखने वाले काले दिल के इन्कार से यह किताब शुबह वाली नहीं हो सकती.

4. “हुदल लिल मुत्तक़ीन” (यानि इसमें हिदायत है डर वालों को) हालांकि क़ुरआन शरीफ़ की हिदायत या मार्गदर्शन हर पढ़ने वाले के लिये आम है, चाहे वह मूमिन यानी ईमान वाला हो या काफ़िर, जैसा कि दूसरी आयत में फ़रमाया “हुदल लिन नासे” यानी “हिदायत सारे इन्सानों के लिये” लेकिन चूंकि इसका फ़ायदा अल्लाह से डरने वालों या एहले तक़वा को होता है इसीलिये फ़रमाया गया _ हिदायत डरवालों को. जैसे कहते हैं बारिश हरियाली के लिये है यानी फ़ायदा इससे हरियाली का ही होता है हालांकि यह बरसती  ऊसर और बंजर ज़मीन पर भी है.

“तक़वा” के कई मानी आते हैं, नफ्स या अन्त:करण को डर वाली चीज़ से बचाना तक़वा कहलाता है. शरीअत की भाषा में तक़वा कहते हैं अपने आपको गुनाहों और उन चीज़ों से बचाना जिन्हें अपनाने से अल्लाह तआला ने मना फ़रमाया हैं. हज़रत इब्ने अब्बास (अल्लाह उन से राज़ी रहे) ने फ़रमाया मुत्तक़ी या अल्लाह से डरने वाला वह है जो अल्लाह के अलावा किसी की इबादत और बड़े गुनाहों और बुरी बातों से बचा रहे. दूसरों ने कहा है मुत्तक़ी अपने आप को दूसरों से बेहतर न समझे. कुछ कहते हैं तक़वा हराम या वर्जित चीज़ों का छोड़ना और अल्लाह के आदेशों या एहकामात का अदा करना है. औरों के अनुसार आदेशों के पालन पर डटे रहना और ताअत पर ग़ुरूर से बचना तक़वा है. कुछ का कहना है कि तेरा रब तुझे वहाँ न पाए जहाँ उसने मना फ़रमाया है. एक कथन यह भी है कि तक़वा हुज़ूर (अल्लाह के दूरूद और सलाम हों उनपर) और उनके साथी सहाबा (अल्लाह उन से राज़ी रहे) के रास्ते पर चलने का नाम है.(ख़ाज़िन)
यह तमाम मानी एक दूसरे से जुड़े हैं.
तक़वा के दर्जें बहुत हैं_ आम आदमी का तक़वा ईमान लाकर कु्फ्र से बचना, उनसे ऊपर के दर्जें के आदिमयों का तक़वा उन बातों पर अमल करना जिनका अल्लाह ने हुक्म दिया है और उन बातों से दूर रहना जिनसे अल्लाह ने मना किया है. ख़वास यानी विशेष दर्जें के आदमियों का तक़वा एसी हर चीज़ का छोड़ना है जो अल्लाह तआला से दूर कर दे या उसे भुला दे.(जुमल) इमाम अहमद रज़ा खाँ, मुहद्सि _ए बरेलवी (अल्लाह की रहमत हो उनपर)ने फ़रमाया _ तक़वा सात तरह का है.

(1) कुफ्र से बचना, यह अल्लाह तआला की मेहरबानी से हर मुसलमान को हासिल है
(2) बद_मज़हबी या अधर्म से बचना _ यह हर सुन्नी को नसीब है,
(3) हर बड़े गुनाह से बचना
(4) छोटे गुनाह से भी दूर रहना
(5) जिन बातों की अच्छाई में शक या संदेह हो उनसे बचना
(6) शहवत यानी वासना से बचना
(7) गै़र की तरफ़ खिंचने से अपने आप को रोकना. यह बहुत ही विशेष आदमियों का दर्जा है. क़ुरआन शरीफ़ इन सातों मरतबों या श्रेणियों के लिये हिदायत है.

(5) “अल लज़ीना यूमिनूना बिल ग़ैब” (यानी वो जो बे देखे ईमान लाएं) से लेकर “मुफ़लिहून” (यानी वही मुराद को पहुंचने वाले ) तक की आयतें सच्चे दिल से ईमान लाने और उस ईमान को संभाल कर रखने वालों के बारे में हैं. यानी उन लोगों के हक़ में जो अन्दर बाहर दोनों से ईमानदार हैं. इसके बाद जो आयतें खुले काफ़िरों के बारे में हैं जो अन्दर बाहर दोनों तरह से काफ़िर हैं. इसके बाद “व मिनन नासे” (यानी और कुछ कहते हैं) से तेरह आयतें मुनाफ़िकों के बारे में हैं जो अन्दर से काफ़िर हैं और बाहर से अपने आपको मुसलमान ज़ाहिर करते हैं. (जुमल) “ग़ैब” वह है जो हवास यानी इन्दि्यों और अक्ल़ से मालूम न हो सके. इसकी दो क़िसमें हैं _ एक वो जिसपर कोई दलील या प्रमाण न हो, यह इल्मे ग़ैब यानी अज्ञात की जानकारी जा़ती या व्यक्तिगत है और यही मतलब निकलता है आयत “इन्दहू मफ़ातिहुल ग़ैबे ला यालमुहा इल्ला हू” (और अल्लाह के पास ही अज्ञात की कुंजी है), और अज्ञात की जानकारी उसके अलावा किसी को नहीं) में और उन सारी आयतों में जिनमें अल्लाह के सिवा किसी को भी अज्ञात की जानकारी न होने की बात कही गई है. इस क़िस्म का इल्में ग़ैब यानी ज़ाती जिस पर कोई दलील या प्रमाण न हो, अल्लाह तआला के साथ विशेष या ख़ास है.
गै़ब की दूसरी क़िस्म वह है जिस पर दलील या प्रमाण हो जैसे दुनिया और इसके अन्दर जो चीज़ें हैं उनको देखते हुए अल्लाह पर ईमान लाना, जिसने ये सब चीज़ें बनाई हैं, इसी क़िस्म के तहत आता है क़यामत या प्रलय के दिन का हाल, हिसाब वाले दिन अच्छे और बुरे कामों का बदला इत्यादि की जानकारी, जिस पर दलीलें या प्रमाण मौजूद हैं और जो जानकारी अल्लाह तआला के बताए से मिलती है. इस दूसरे क़िस्म के गै़ब, जिसका तअल्लुक़ ईमान से है, की जानकारी और यक़ीन हर ईमान वाले को हासिल है, अगर न हो तो वह आदमी मूमिन ही न हो.

अल्लाह तआला अपने क़रीबी चहीते बन्दों, नबियों और वलियों पर जो गै़ब के दरवाज़े खोलता है वह इसी क़िस्म का ग़ैब है. गै़ब की तफ़सीर या व्याख्या में एक कथन यह भी है कि ग़ैब से क़ल्ब यानी दिल मुराद है. उस सूरत में मानी ये होंगे कि वो दिल से ईमान लाएं.(जुमल)

ईमान : जिन चीज़ों के बारे में हिदायत और यक़ीन से मालूम है कि ये दीने मुहम्मदी से हैं, उन सबको मानने और दिल से तस्दीक़ या पुष्टि करने और ज़बान से इक़रार करने का नाम सही ईमान है. कर्म या अमल ईमान में दाख़िल नहीं इसीलिये “यूमिनूना बिल गै़बे” के बाद “युक़ीमूनस सलाता” (और नमाज़ क़ायम रखें) फ़रमाया गया.

(6) नमाज़ के क़ायम रखने से ये मुराद है कि इसपर सदा अमल करते हैं और ठीक वक्तों पर पूरी पाबन्दी के साथ सभी अरकान यानी संस्कारों के साथ नमाज़ की अदायगी करते हैं और फ़र्ज़, सुन्नत और मुस्तहब अरकान की हिफ़ाज़त करते है, किसी में कोई रूकावट नहीं आने देते. जो बातें नमाज़ को ख़राब करती हैं उन का पूरा पूरा ध्यान रखते हैं और जैसी नमाज़ पढ़ने का हुक्म हुआ है वैसी नमाज़ अदा करते हैं.

नमाज़ के संस्कार : नमाज़ के हुक़ूक़ या संस्कार दो तरह के हैं एक ज़ाहिरी, ये वो हैं जो अभी अभी उपर बताए गए. दूसरे बातिनी, यानी आंतरिक, पूरी यकसूई या एकाग्रता, दिल को हर तरफ़ से फेरकर सिर्फ अपने पैदा करने वाले की तरफ़ लगा देना और दिल की गहराईयों से अपने रब की तारीफ़ या स्तुति और उससे प्रार्थना करना.

(7) अल्लाह की राह में ख़र्च करने का मतलब या ज़कात है, जैसा दूसरी जगह फ़रमाया “युक़ीमूनस सलाता व यूतूनज़ ज़काता” (यानी नमाज़ क़ायम करते हैं और ज़कात अदा करते है), या हर तरह का दान पुण्य मुराद है चाहे फ़र्ज़ हो या वाजिब, जैसे ज़कात, भेंट, अपनी और अपने घर वालों की गुज़र बसर का प्रबन्ध. जो क़रीबी लोग इस दुनिया से जा चुके हैं उनकी आत्मा की शान्ति के लिये दान करना भी इसमें आ सकता है. बग़दाद वाले पीर हुज़ूर ग़ौसे आज़म की ग्यारहवीं की नियाज़, फ़ातिहा, तीजा चालीसवां वग़ैरह भी इसमें दाख़िल हैं कि ये सब अतिरिक्त दान हैं. क़ुरआन शरीफ़ का पढ़ना और कलिमा पढ़ना नेकी के साथ अतिरिक्त नेकी मिलाकर अज्र और सवाब बढ़ाता है.

क़ुरआन शरीफ़ में इस तरफ़ ज़रूर इशारा किया गया है कि अल्लाह की राह में ख़र्च करते वक्त़, चाहे अपने लिये हो या अपने क़रीबी लोगों के लिये, उसमें बीच का रास्ता अपनाया जाए, यानी न बहुत कम, न बहुत ज्यादा.

“रज़क़नाहुम” (और हमारी दी हुई रोज़ी में से) में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि माल तुम्हारा पैदा किया हुआ नहीं, बल्कि हमारा दिया हुआ है. इसको अगर हमारे हुक्म से हमारी राह में ख़र्च न करो तो तुम बहुत ही कंजूस हो और ये कंजूसी बहुत ही बुरी है.

(8) इस आयत में किताब वालों से वो ईमान वाले मुराद हैं जो अपनी किताब और सारी पिछली किताबों और नबियों (अल्लाह के दुरूद और सलाम हों उनपर) पर भेजे गए अल्लाह के आदेशों पर भी ईमान लाए और क़ुरआन शरीफ़ पर भी. और “मा उन्जिला इलैका” (जो तुम्हारी तरफ़ उतरा) से तमाम क़ुरआन शरीफ़ और सारी शरीअत मुराद है. (जुमल)
जिस तरह क़ुरआन शरीफ़ पर ईमान लाना हर मुसलमान के लिये ज़रूरी है उसी तरह पिछली आसमानी किताबों पर ईमान लाना भी अनिवार्य है जो अल्लाह तआला ने हुज़ूर (अल्लाह के दुरूद और सलाम हो उनपर) से पहले नबियों पर उतारीं. अलबत्ता उन किताबों के जो अहकाम या आदेश हमारी शरीअत में मन्सूख़ या स्थगित कर दिये गए उन पर अमल करना दुरूस्त नहीं, मगर ईमान रखना ज़रूरी है. जैसे पिछली शरीअतों में बैतुल मक़दिस क़िबला था, इसपर ईमान लाना तो हमारे लिये ज़रूरी है मगर अमल यानी नमाज़ में बैतुल मक़दिस की तरफ़ मुंह करना जायज़ नहीं, यह हुक्म उठा लिया गया.

क़ुरआन शरीफ़ से पहले जो कुछ अल्लाह तआला की तरफ़ से उसके नबियों पर उतरा उन सब पर सामूहिक रूप से ईमान लाना फ़र्ज़े एेन और क़ुरआन शरीफ़ में जो कुछ है उस पर ईमान लाना फ़र्ज़े किफ़ाया है, इसीलिये आम आदमी पर क़ुरआन शरीफ़ की तफसीलात की जानकारी फ़र्ज़ नहीं जबकि क़ुरआन शरीफ़ के जानकार मौजूद हों जिन्होंने क़ुरआन के ज्ञान को हासिल करने में पूरी मेहनत
की हो.

(9) यानी दूसरी दुनिया और जो कुछ उसमें है, अच्छाइयों और बुराइयों का हिसाब वग़ैरह सब पर एेसा यक़ीन और इत्मीनान रखते हैं कि ज़रा शक और शुबह नहीं, इसमें एहले किताब (ईसाई और यहूदी)और काफ़िरों वग़ैरह से बेज़ारी है जो आख़िरत यानी दूसरी दुनिया के बारे में ग़लत विचार रखते हैं.
(10) अल्लाह वालों के बाद, अल्लाह के दुश्मनों का बयान फ़रमाना हिदायत के लिये है कि इस मुक़ाबले से हर एक को अपने किरदार की हक़ीक़त और उसके नतीजों या परिणाम पर नज़र हो जाए.
यह आयत अबू जहल, अबू लहब वग़ैरह काफ़िरों के बारे में उतरी जो अल्लाह के इल्म के तहत ईमान से मेहरूम हैं, इसी लिये उनके बारे में अल्लाह तआला की मुख़ालिफ़त या दुश्मनी से डराना या न डराना दोनों बराबर हैं, उन्हें फ़ायदा न होगा. मगर हुज़ूर की कोशिश बेकार नहीं क्योंकि रसूल का काम सिर्फ़ सच्चाई का रास्ता दिखाना और अच्छाई की तरफ़ बुलाना है. कितने लोग सच्चाई को अपनाते है और कितने नहीं, यह रसूल की जवाबदारी नहीं है, अगर क़ौम हिदायत क़ुबूल न करे तब भी हिदायत देने वाले को हिदायत का पुण्य या सवाब मिलेगा ही.

इस आयत में हुज़ूर (अल्लाह के दुरूद व सलाम हो उनपर) की तसल्ली की बात है कि काफ़िरों के ईमान न लाने से आप दुखी न हों, आप की तबलीग़ या प्रचार की कोशिश पूरी है, इसका अच्छा बदला मिलेगा. मेहरूम तो ये बदनसीब है जिन्होंने आपकी बात न मानी.
कुफ़्र के मानी : अल्लाह तआला की ज़ात या उसके एक होने या किसी के नबी होने या दीन की ज़रूरतों में से किसी एक का इन्कार करना या कोई एेसा काम जो शरीअत से मुंह फेरने का सुबूत हो, कुफ्र है.

(11) इस सारे मज़मून का सार यह है कि काफ़िर गुमराही में एेसे डूबे हुए हैं कि सच्चाई के देखने, सुनने, समझने से इस तरह मेहरूम हो गए जैसे किसी के दिल और कानों पर मुहर लगी हो और आंखों पर पर्दा पड़ा हुआ हो.
इस आयत से मालूम हुआ कि बन्दों के कर्म भी अल्लाह की क़ुदरत के तहत हैं.

सूरए बक़रह _ दूसरा रूकू

सूरए बक़रह _ दूसरा रूकू

और कुछ लोग कहते हैं(1)
कि हम अल्लाह और पिछले दीन पर ईमान लाए और वो ईमान वाले नहीं धोखा देना चाहते हैं अल्लाह और ईमान वालों को(2)
और हक़ीक़त में धोखा नहीं देते मगर अपनी जानों को और उन्हें शउर (या आभास)
नहीं उनके दिलों में बीमारी है (3)
तो अल्लाह ने उनकी बीमारी और बढ़ाई और उनके लिये दर्दनाक अज़ाब है बदला उनके झूठ का(4)
और जो उनसे कहा जाए ज़मीन में फ़साद न करो (5)
तो कहते हैं हम तो संवारने वाले हैं, सुनता है। वही फ़सादी हैं मगर उन्हें शउर नहीं,
और जब उनसे कहा जाए ईमान लाऔ जैसे और लोग ईमान लाए हैं(6)
तो कहें क्या हम मूर्खों की तरह ईमान लाएं(7)
सुनता है । वही मूर्ख हैं मगर जानते नहीं (8)
और जब ईमान वालों से मिलें तो कहें हम ईमान लाए और जब अपने शैतानों के पास अकेले हों(9)
तो कहें हम तुम्हारे साथ हैं, हम तो यूं ही हंसी करते हैं (10)
अल्लाह उनसे इस्तहज़ा फ़रमाता है (अपनी शान के मुताबिक़)(11)
और उन्हें ढील देता है कि अपनी सरकशी में भटकते रहें. ये वो लोग हैं जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही ख़रीदी(12)
तो उनका सौदा कुछ नफ़ा न लाया और वो सौदे की राह जानते ही न थे(13)
उनकी कहावत उसकी तरह है जिसने आग रौशन की तो जब उससे आसपास सब जगमगा उठा, अल्लाह उनका नूर ले गया और उन्हें अंधेरियों में छोड़ दिया कि कुछ नहीं सूझता (14)
बहरे, गूंगे, अन्धे, तो वो फिर आने वाले नहीं या जैसे आसमान से उतरता पानी कि उसमें अंधेरियां हैं और गरज और चमक(15)
अपने कानों में उंगलियां ठूंस रहे हैं,कड़क के कारण मौत के डर से(16)
और अल्लाह काफ़िरों को घेरे हुए है(17)
बिजली यूं ही मालूम होती है कि उनकी निगाहें उचक ले जाएगी(18)
जब कुछ चमक हुई उस में चलने लगे(19)
और जब अंधेरा हुआ, खड़े रह गए और अल्लाह चाहता तो उनके कान और
आंखें ले जाता(20)
बेशक अल्लाह सबकुछ कर सकता हैं(21)

तफ़सीर : सूरए बक़रह _ दूसरा रूकू

1. इससे मालूम हुआ कि हिदायत की राहें उनके लिए पहले ही बन्द न थीं कि बहाने की गुंजायश होती. बल्कि उनके कुफ़्र, दुश्मनी और सरकशी व बेदीनी, सत्य के विरोध और नबियों से दुश्मनी का यह अंजाम है जैसे कोई आदमी डाक्टर का विरोध करें और उसके लिये दवा से फ़ायदे की सूरत न रहे तो
वह ख़ुद ही अपनी दुर्दशा का ज़िम्मेदार ठहरेगा.

2. यहां से तैरह आयतें मुनाफ़िक़ों (दोग़ली प्रवृत्ति वालों) के लिये उतरीं जो अन्दर से काफिर थे और अपने आप को मुसलमान ज़ाहिर करते थे. अल्लाह तआला ने फ़रमाया “माहुम बिमूमिनीन” वो ईमान वाले नहीं यानी कलिमा पढ़ना, इस्लाम का दावा करना, नमाज़ रोज़े अदा करना मूमिन होने के लिये काफ़ी नहीं, जब तक दिलों में तस्दीक़ न हो. इससे मालूम हुआ कि जितने फ़िरक़े (समुदाय) ईमान का दावा करते हैं और कुफ़्र का अक़ीदा रखते हैं सब का यही हुक्म है कि काफ़िर इस्लाम से बाहर हैं.शरीअत में एसों को मुनाफ़िक़ कहते हैं. उनका नुक़सान खुले काफ़िरों से ज्य़ादा है. मिनन नास (कुछ लोग) फ़रमाने में यह इशारा है कि यह गिरोह बेहतर गुणों और इन्सानी कमाल से एसा ख़ाली है कि इसका ज़िक्र किसी वस्फ़ (प्रशंसा) और ख़ूबी के साथ नहीं किया जाता, यूं कहा जाता है कि वो भी आदमी हैं. इस से मालूम हुआ कि किसी को बशर कहने में उसके फ़जा़इल और कमालात (विशेष गुणों) के इन्कार का पहलू निकलता है. इसलिये कुरआन में जगह जगह नबियों को बशर कहने वालों को काफ़िर कहा गया और वास्तव में नबियों की शान में एसा शब्द अदब से दूर और काफ़िरों का तरीक़ा है. कुछ तफसीर करने वालों ने फरमाया कि मिनन नास (कुछ लोगों) में सुनने वालों को आश्चर्य दिलाने के लिये फ़रमाया धोख़ेबाज़, मक्कार और एसे महामूर्ख भी आदमियों में हैं.

3. अल्लाह तआला इससे पाक है कि उसको कोई धोख़ा दे सके. वह छुपे रहस्यों का जानने वाला है. मतलब यह कि मुनाफ़िक़ अपने गुमान में ख़ुदा को धोख़ा देना चाहते हैं या यह कि ख़ुदा को धोख़ा देना यही है कि रसूल अलैहिस्सलाम को धोख़ा देना चाहें क्योंकि वह उसके ख़लीफ़ा हैं, और अल्लाह तआला ने अपने हबीब को रहस्यों (छुपी बातों) का इल्म दिया है, वह उन दोग़लों यानि मुनाफ़िक़ों के छुपे कुफ़्र के जानकार हैं और मुसलमान उनके बताए से बाख़बर, तो उन अधर्मियों का धोख़ा न ख़ुदा पर चले न रसूल पर, न ईमान वालों पर, बल्कि हक़ीक़त में वो अपनी जानों को धोख़ा दे रह हैं. इस
आयत से मालूम हुआ कि तक़ैय्या (दिलों में कुछ और ज़ाहिर कुछ) बड़ा एब है. जिस धर्म की बुनियाद तक़ैय्या पर हो, वो झूठा है. तक़ैय्या वाले का हाल भरोसे के क़ाबिल नहीं होता, तौबह इत्मीनान के क़ाबिल नहीं होती, इसलिये पढ़े लिखों ने फ़रमाया है “ला तुक़बलो तौबतुज़ ज़िन्दीक़ यानी अधर्मी की
तौबह क़बुल किये जाने के क़ाबिल नहीं.

4. बुरे अक़ीदे को दिल की बीमारी बताया गया है. मालूम हुआ कि बुरा अक़ीदा रूहानी ज़िन्दग़ी के लिये हानिकारक है. इस आयत से साबित हुआ कि झूठ हराम है, उसपर भारी अजाब दिया जाता है.

5. काफ़िरों से मेल जोल, उनकी ख़ातिर दीन में कतर ब्यौंत और असत्य पर चलने वालों की ख़ुशामद और चापलूसी और उनकी ख़ुशी के लिये सुलह कुल्ली (यानी सब चलता है) बन जाना और सच्चाई से दूर रहना, मुनाफ़िक़ की पहचान और हराम है. इसी को मुनाफ़िकों का फ़साद फ़रमाया है कि जिस जल्से में गए, वैसे ही हो गए, इस्लाम में इससे मना फ़रमाया गया है. ज़ाहिर और बातिन (बाहर और अन्दर) का एकसा न होना बहुत बड़ी बुराई है.

6. यहां “अन्नासो”से या सहाबए किराम मुराद है या ईमान वाले, क्योंकि ख़ुदा के पहचानने, उसकी फ़रमाबरदारी और आगे की चिन्ता रखने की बदौलत वही इन्सान कहलाने के हक़दार हैं. “आमिनु कमा आमना” (ईमान लाओ जैसे और लोग ईमान लाए) से साबित हुआ कि अच्छे लोगों का इत्तिबाअ
(अनुकरण) अच्छा और पसन्दीदा है. यह भी साबित हुआ कि एहले सुन्नत का मज़हब सच्चा है क्योंकि इसमें अच्छे नेक लोगों का अनुकरण है. बाक़ी सारे समुदाय अच्छे लोगों से मुंह फेरे हैं इसलिये गुमराह हैं. कुछ विद्वानों ने इस आयत को जि़न्दीक़ (अधर्मी) की तौबह क़ुबूल होने की दलील क़रार दिया है. (बैज़ावी) ज़िन्दीक़ वह है जो नबुवत को माने, इस्लामी उसूलों को ज़ाहिर करे मगर दिल ही दिल में ऐसे अक़ीदे रखे जो आम राय में कुफ़्र हों, यह भी मुनाफ़िकों में दाखि़ल हैं.

7. इससे मालूम हुआ कि अच्छे नेक आदमियों को बुरा कहना अधर्मियों और असत्य को मानने वालों का पुराना तरीक़ा है. आजकल के बातिल फ़िर्के भी पिछले बुज़ुर्गों को बुरा कहते हैं. राफ़ज़ी समुदाय वाले ख़ुलफ़ाए राशिदीन और बहुत से सहाबा को, ख़ारिजी समुदाय वाले हज़रत अली और उनके साथियों को, ग़ैर मुक़ल्लिद अइम्मए मुज्तहिदीन (चार इमामों) विशेषकर इमामे अअज़म अबू हनीफ़ा को, वहाबी समुदाय के लोग अक्सर औलिया और अल्लाह के प्यारों को, मिर्जाई समुदाय के लोग पहले नबियों तक को, चकड़ालवी समुदाय के लोग सहाबा और मुहद्दिसीन को, नेचरी तमाम बुज़ुर्गाने दीन को बुरा कहते है और उनकी शान में गुस्ताख़ी करते हैं. इस आयत से मालूम हुआ कि ये सब सच्ची सीधी राह से हटे हुए हैं. इसमें दीनदार आलिमों के लिये तसल्ली है कि वो गुमराहों की बदज़बानियों से बहुत दुखी न हों, समझ लें कि ये अधर्मियों का पुराना तरीक़ा है. (मदारिक)

8. मुनाफ़िक़ो की ये बद _ ज़बानी मुसलमानों के सामने न थी. उनसे तो वो यही कहते थे कि हम सच्चे दिल से ईमान लाए है जैसा कि अगली आयत में है “इज़ा लक़ुल्लज़ीना आमनू क़ालू आमन्ना”(और जब इमान वालों से मिलें तो कहें हम ईमान लाए).ये तबर्राबाज़ियां (बुरा भला कहना) अपनी ख़ास मज्लिसों में करते थे. अल्लाह तआला ने उनका पर्दा खोल दिया. (ख़ाजिन)  उसी तरह आजकल के गुमराह फ़िर्कें (समुदाय) मुसलमानों से अपने झूटे ख्यालों को छुपाते हैं मगर अल्लाह तआला उनकी किताबों और उनकी लिखाईयों से उनके राज़ खोल देता है. इस आयत से मुसलमानों को ख़बरदार किया जाता है कि अधर्मियों की धोख़े बाज़ियों से होशियार रहें, उनके जाल में न आएं.

9. यहां शैतानों से काफ़िरों के वो सरदार मुराद है जो अग़वा (बहकावे) में मसरूफ़ रहते हैं. (ख़ाज़िन और बैज़ावी) ये मुनाफ़िक़ जब उनसे मिलते है तो कहते है हम तुम्हारे साथ हैं और मुसलमानों से मिलना सिर्फ़ धोख़ा और मज़ाक उड़ाने की ग़रज़ से इसलिये है कि उनके राज़ मालूम हों और उनमें फ़साद फैलाने के अवसर मिलें. (ख़ाजिन)

10.यानी ईमान का ज़ाहिर करना यानी मज़ाक उड़ाने के लिये किया, यह इस्लाम का इन्कार हुआ.नबियों और दीन के साथ मज़ाक करना और उनकी खिल्ली उड़ाना कुफ़्र है. यह आयत अब्दुल्लाह बिन उबई इत्यादि मुनाफ़िक़ के बारे़ में उतरी. एक रोज़ उन्होंने सहाबए किराम की एक जमाअत को आते देखा तो इब्ने उबई ने अपने यारों से कहा _ देखों तो मैं इन्हें कैसा बनाता हूं. जब वो हज़रात क़रीब पहुंचे तो इब्ने उबई ने पहले हज़रत सिद्दीके अकबर का हाथ अपने हाथ में लेकर आपकी तअरीफ़ की फिर इसी तरह हज़रत उमर और हज़रत अली की तअरीफ़ की. हज़रत अली मुर्तज़ा ने फ़रमाया _ ए इब्ने उबई, ख़ुदा से डर, दोग़लेपन से दूर रह, क्योंकि मुनाफ़िक़ लोग बदतरीन लोग हैं. इसपर वह कहने लगा कि ये बातें दोग़लेपन से नहीं की गई. खु़दा की क़सम, हम आपकी तरह सच्चे ईमान वाले हैं. जब ये हज़रात तशरीफ़ ले गए तो आप अपने यारों में अपनी चालबाज़ी पर फ़ख्र करने लगा. इसपर यह आयत उतरी कि मुनाफ़िक़ लोग ईमान वालों से मिलते वक्त ईमान और महब्बत जा़हिर करते हैं और उनसे अलग होकर अपनी ख़ास बैठकों में उनकी हंसी उड़ाते और खिल्ली करते हैं. इससे मालूम हुआ कि सहाबए किराम और दीन के पेशवाओ की खिल्ली उड़ाना कुफ़्र हैं.

11. अल्लाह तआला इस्तहज़ा (हंसी करने और खिल्ली उड़ाने) और तमाम ऐबों और बुराइयों से पाक है. यहां हंसी करने के जवाब को इस्तहज़ा फ़रमाया गया ताकि ख़ूब दिल में बैठ जाए कि यह सज़ा उस न करने वाले काम की है. ऐसे मौके़ पर हंसी करने के जवाब को अस्ल क्रिया की तरह बयान करना
फ़साहत का क़ानून है. जैसे बुराई का बदला बुराई. यानी जो बुराई करेगा उसे उसका बदला बुराई की सूरत में मिलेगा.

12. हिदायत के बदले गुमराही ख़रीदना यानी ईमान की जगह कुफ़्र अपनाना बहुत नुक़सान औरघाटे की बात है. यह आयत या उन लोगों के बारे में उतरी जो ईमान लाने के बाद काफ़िर हो गए, या यहूदियों के बारे में जो पहले से तो हुज़ूर सल्लल्लाहो तआला अलैहे वसल्लम पर ईमान रखते थे मगर जब हुज़ूर तशरीफ़ ले आए तो इन्कार कर बैठे, या तमाम काफ़िरों के बारे में कि अल्लाह तआला ने उन्हें समझने वाली अक़्ल दी, सच्चाई के प्रमाण ज़ाहिर फ़रमाए, हिदायत की राहें खोलीं, मगर उन्होंने अक़्ल और इन्साफ़ से काम न लिया और गुमराही इख्तियार की. इस आयत से साबित हुआ कि ख़रीदों फ़रोख्त (क्रय विक्रय) के शब्द कहे बिना सिर्फ़ रज़ामन्दी से एक चीज़ के बदले दूसरी चीज़ लेना जायज़ है.

13. क्योंकि अगर तिजारत का तरीक़ा जानते तो मूल पूंजी (हिदायत) न खो बैठते.

14. यह उनकी मिसाल है जिन्हें अल्लाह तआला ने कुछ हिदायत दी या उसपर क़ुदरत बख्शी,फिर उन्होंने उसको ज़ाया कर दिया और हमेशा बाक़ी रहने वाली दौलत को हासिल न किया. उनका अंजाम हसरत, अफसोस, हैरत और ख़ौफ़ है. इसमें वो मुनाफ़िक़ भी दाखि़ल हैं जिन्होंने ईमान की नुमाइश की और दिल में कुफ़्र रखकर इक़रार की रौशनी को ज़ाया कर दिया, और वो भी जो ईमान  लाने के बाद दीन से निकल गए, और वो भी जिन्हें समझ दी गई और दलीलों की रौशनी ने सच्चाई को साफ़ कर दिया मगर उन्होंने उससे फ़ायदा न उठाया और गुमराही अपनाई और जब हक़ सुनने, मानने, कहने और सच्चाई की राह देखने से मेहरूम हुए तो कान, ज़बान, आंख, सब बेकार हैं.

15. हिदायत के बदले गुमराही ख़रीदने वालों की यह दूसरी मिसाल है कि जैसे बारिश ज़मीन की ज़िन्दग़ी का कारण होती है और उसके साथ खौफ़नाक अंधेरियां और ज़ोरदार गरज और चमक होती है, उसी तरह क़ुरआन और इस्लाम दिलों की ज़िन्दग़ी का सबब हैं और कुफ़्र, शिर्क, निफ़ाक़ दोगलेपन का
बयान तारीकी (अंधेरे) से मिलता जुलता है. जैसे अंधेरा राहगीर को मंज़िल तक पहुंचने से रोकता  है, एैसे ही कुफ़्र और निफ़ाक़ राह पाने से रोकते हैं.
और सज़ाओ का ज़िक्र गरज से और हुज्जतों का वर्णन चमक से मिलते जुलते हैं.
मुनाफ़िक़ों में से दो आदमी हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के पास से मुश्रिकों की तरफ भागे, राह में यही बारिश आई जिसका आयत में ज़िक्र है. इसमें ज़ोरदार गरज, कड़क और चमक थी. जब गरज होती तो कानों में उंगलियां ठूंस लेते कि यह कानों को फाड़ कर मार न डाले, जब चमक होती चलने
लगते, जब अंधेरी होती, अंधे रह जाते, आपस में कहने लगे _ ख़ुदा ख़ैर से सुबह करे तो हुज़ूर की ख़िदमत में हाज़िर होकर अपने हाथ हुज़ूर के मुबारक हाथों में दे दें. फिर उन्होंने एेसा ही किया और इस्लाम पर साबित क़दम रहे. उनके हाल को अल्लाह तआला ने मुनाफ़िक़ों के लिये कहावत बनाया जो हुज़ूर की पाक मज्लिस में हाज़िर होते तो कानों में उंगलियां ठूंस लेते कि कहीं हुज़ूर का कलाम उनपर असर न कर जाए जिससे मर ही जाएं और जब उनके माल व औलाद ज्यादा होते और फ़तह और ग़नीमत का माल मिलता तो बिजली की चमक वालों की तरह चलते और कहते कि अब तो मुहम्मद का दीन ही सच्चा है. और जब माल और औलाद का नुक़सान होता और बला आती तो बारिश की अंधेरियों में ठिठक रहने वालों की तरह कहते कि यह मुसीबतें इसी दीन की वजह से हैं और इस्लाम से हट जाते.

16. जैसे अंधेरी रात में काली घटा और बिजली की गरज _ चमक जंगल में मुसाफिरों को हैरान करती हो और वह कड़क की भयानक आवाज़ से मौत के डर से माने कानों में उंगलियां ठूंसते हों. ऐसे ही काफ़िर क़ुरआन पाक के सुनने से कान बन्द करते हैं और उन्हें ये अन्देशा या डर होता है कि कहीं इसकी दिल में घर कर जाने वाली बातें इस्लाम और ईमान की तरफ़ खींच कर बाप दादा का कुफ़्र वाला दीन न छुड़वा दें जो उनके नज्दीक मौत के बराबर है.

17. इसलियें ये बचना उन्हें कुछ फ़ायदा नहीं दे सकता क्योंकि वो कानों में उंगलियां ठूंस कर अल्लाह के प्रकोप से छुटकारा नहीं पा सकते.

18. जैसे बिजली की चमक, मालूम होता है कि दृष्टि को नष्ट कर देगी, ऐसे ही खुली साफ़ दलीलों की रोशनी उनकी आंखों और देखने की क़ुव्वत को चौंधिया देती है.

19. जिस तरह अंधेरी रात और बादल और बािरश की तारीकियों में मुसाफिर आश्चर्यचकित होता है, जब बिजली चमकती है तो कुछ चल लेता है, जब अंधेरा होता है तो खड़ा रह जाता है, उसी तरह इस्लाम के ग़लबे और मोजिज़ात की रोशनी और आराम के वक्त़ मुनाफ़िक़ इस्लाम की तरफ़ राग़िब होते (खिंचते) हैं और जब कोई मशक्कत पेश आती है तो कुफ़्र की तारीक़ी में खड़े रह जाते हैं और इस्लाम से हटने लगते हैं. इसी मज़मून (विषय) को दूसरी आयत में इस तरह इरशाद फ़रमाया “इज़ा दुउ इलल्लाहे व रसूलिही लियहकुमा बैनहुम इज़ा फ़रीक़ुम मिन्हुम मुअरिदुन.”(सूरए नूर, आयत 48) यानी जब बुलाए जाएं अल्लाह व रसूल की तरफ़ कि रसूल उनमें फ़रमाए तो जभी उनका एक पक्ष मुंह फेर जाता है. (ख़ाज़िन वग़ैरह)

20. यानी यद्दपि मुनाफ़िक़ों की हरकतें इसी की हक़दार थीं, मगर अल्लाह तआला ने उनके सुनने और देखने की ताक़त को नष्ट न किया. इससे मालूम हुआ कि असबाब की तासीर अल्लाह की मर्ज़ी के साथ जुड़ी हुई है कि अल्लाह की मर्ज़ी के बिना किसी चीज़ का कुछ असर नहीं हो सकता. यह भी मालूम हुआ कि अल्लाह की मर्ज़ी असबाब की मोहताज़ नहीं, अल्लाह को कुछ करने के लिये किसी वजह की ज़रूरत नहीं.

21. “शै” उसी को कहते है जिसे अल्लाह चाहे और जो उसकी मर्ज़ी के तहत आ सके. जो कुछ भी है सब “शै” में दाख़िल हैं इसलिये वह अल्लाह की क़ुदरत के तहत है. और जो मुमकिन नहीं यानी उस जैसा दूसरा होना सम्भव नहीं अर्थात वाजिब, उससे क़ुदरत और इरादा सम्बन्धित नहीं होता जैसे
अल्लाह तआला की ज़ात और सिफ़ात वाजिब है, इस लिये मक़दूर (किस्मत) नहीं. अल्लाह तआला के लिये झूट बोलना और सारे ऐब मुहाल (असंभव) है इसीलिये क़ुदरत को उनसे कोई वास्ता नहीं.

सूरए बक़रह _ तीसरा रूकू

सूरए बक़रह _ तीसरा रूकू

ऐ लोगों(1)
अपने रब को पूजो जिसने तुम्हें और तुम से अगलों को पैदा किया ये उम्मीद करते हुए कि तुम्हें परहेज़गारी मिले (2)
और जिसने तुम्हारे लिये ज़मीन को बिछौना और आसमान को इमारत बनाया और आसमान से पानी उतारा (3)
तो उससे कुछ फल निकाले तुम्हारे खाने को तो अल्लाह के लिये जानबूझकर बराबर वाले न ठहराओ (4)
और अगर तुम्हें कुछ शक हो उसमें जो हमने अपने  (उन ख़ास) बन्दे(5)
पर उतारा तो उस जैसी सूरत तो ले आओ (6)
और अल्लाह के सिवा अपने सब हिमायतियों को बुला लो अगर तुम सच्चे हो, फिर अगर न ला सको और हम फ़रमाए देते है कि हरगिज़ न ला सकोगे तो डरो उस आग से जिसका ईंधन आदमी और पत्थर हैं (7)
तैयार रखी है काफ़िरों के लिये (8)
और ख़ुशख़बरी दे उन्हें जो ईमान लाए और अच्छे काम किये कि उनके लिये बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें बहें(9)
जब उन्हें उन बागों से कोई फल खाने को दिया जाएगा (सूरत देखकर) कहेंगे यह तो वही रिज्क़ (जीविका) है जो हमें पहले मिला था (10)
और वह (सूरत में) मिलता जुलता उन्हें दिया गया और उनके लिये उन बाग़ों में सुथरी बीबियां हैं (11)
और वो उनमें हमेशा रहेंगे (12)
बेशक अल्लाह इस से हया नहीं फ़रमाता कि मिसाल समझाने को कैसी ही चीज़ का जि़क्र या वर्णन फ़रमाए मच्छर हो या उससे बढ़कर(13)
तो वो जो ईमान लाए वो तो जानते हैं कि यह उनके रब की तरफ़ से हक़ (सत्य) है (14)
रहे काफ़िर वो कहते हैं एसी कहावत में अल्लाह का क्या मक़सूद है, अल्लाह बहुतेरों को इससे गुमराह करता है (15)
और बहुतेरों को हिदायत फ़रमाता है और उससे उन्हें गुमराह करता है जो बेहुक्म हैं (16)
वह जो अल्लाह के अहद (इक़रार) को तोड़ देते हैं (17)
पक्का होने के बाद और काटते हैं उस चीज़ को जिसके जोड़ने का ख़ुदा ने हुक्म दिया है और जमीन में फ़साद फैलाते हैं (18)
वही नुक़सान में हैं भला तुम कैसे ख़ुदा का इन्कार करोगे हालांकि तुम मुर्दा थे उसने तुम्हें जिलाया (जीवंत किया) फिर तुम्हें मारेगा फिर तुम्हें ज़िन्दा करेगा फिर उसी की तरफ़ पलटकर जाओगे (19)
वही है जिसने तुम्हारे लिये बनाया जो कुछ ज़मीन में है (20) फिर आसमान की तरफ़ इस्तिवा (क़सद, इरादा) फ़रमाया तो ठीक सात आसमान बनाए और वह सब कुछ जानता हैं (21)

तफ़सीर : सूरए बक़रह  तीसरा रूकू

(1) सूरत के शुरू में बताया गया कि यह किताब अल्लाह से डरने वालों की हिदायत के लिये उतारी गई है, फिर डरने वालों की विशेषताओ का ज़िक्र फरमाया, इसके बाद इससे मुंह फेरने वाले समुदायो का और उनके हालात का ज़िक्र फरमाया कि फ़रमांबरदार  और क़िस्मत वाले इन्सान हिदायत और तक़वा की तरफ़ राग़िब हों और नाफ़रमानी व बग़ावत से बचें. अब तक़वा हासिल करने का तरीक़ा बताया जा रहा है. “ऐ लोगो” का ख़िताब (सम्बोधन) अकसर मक्के वालों को और “ऐ ईमान वालों” का सम्बोधन मदीने वालों को होता है. मगर यहां यह सम्बोधन ईमान वालों और काफ़िर सब को आम है, इसमें इशारा है कि इन्सानी शराफ़त इसी में है कि आदमी अल्लाह से डरे यानी तक़वा हासिल करे और इबादत में लगा रहे. इबादत वह संस्कार (बंदगी) है जो बन्दा अपनी अब्दीयत और माबूद की उलूहियत (ख़ुदा होना) के एतिक़ाद और एतिराफ़ के साथ पूरे करे. यहां इबादत आम है अर्थात पूजा पाठ की सारी विधियों, तमाम उसूल और तरीको को समोए हुए है. काफ़िर इबादत के मामूर (हुक्म किये गए) हैं जिस तरह बेवुज़ू नमाज़ के  फर्ज़  होने को नहीं रोकता उसी तरह काफ़िर होना इबादत के वाजिब होने को मना नहीं करता और जैसे बेवुज़ू व्यक्ति पर नमाज़ की अनिवार्यता बदन की पाकी को ज़रूरी बनाती है ऐसे ही काफ़िर पर इबादत के वाजिब होने से कुफ़्र का छोड़ना अनिवार्य ठहरता है.

(2) इससे मालूम हुआ कि इ़बादत का फ़ायदा इबादत करने वाले ही को मिलता है, अल्लाह तआला इससे पाक है कि उसको इबादत या और किसी चीज़ से नफ़ा हासिल हो.

(3) पहली आयत में बयान फ़रमाया कि तुम्हें और तुम्हारे पूर्वजों को शून्य से अस्तित्व किया और दूसरी आयत में गुज़र बसर, जीने की सहूलतों, अन्न और पानी का बयान फ़रमाकर स्पष्ट कर दिया कि अल्लाह ही सारी नेअमतों का मालिक है. फिर अल्लाह को छोडकर दूसरे की पूजा सिर्फ बातिल है.

(4) अल्लाह तआला के एक होने के बयान के बाद हुज़ूर सैयदुल अंबिया सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत और क़ुरआने करीम के देववाणी और नबी का मोजिज़ा होने की वह ज़बरदस्त दलील बयान फरमाई जाती है जो सच्चे दिल वाले को इत्मीनान बख्शे  और इंकार करने वालों को लाजवाब कर दे.

(5) ख़ास बन्दे से हुज़ूर पुरनूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मुराद हैं.

(6) यानी ऐसी सूरत बनाकर लाओ   जो फ़साहत (अच्छा कलाम) व बलाग़त और शब्दों के सौंदर्य और प्रबंध और ग़ैब की ख़बरें देने में क़ुरआने पाक की तरह हो.

(7) पत्थर से वो बुत मुराद हैं जिन्हे काफ़िर पूजते हैं और उनकी महब्बत में क़ुरआने पाक और रसूले करीम का इन्कार दुश्मनी के तौर पर करते हैं.

(8) इस से मालूम हुआ कि दोज़ख पैदा हो चुकी है. यह भी इशारा है कि ईमान वालों के लिये अल्लाह के करम से हमेशा जहन्नम में रहना नहीं.

(9) अल्लाह तआला की सुन्नत है कि किताब में तरहीब (डराना) के साथ तरग़ीब ज़िक्र फ़रमाता है. इसीलिये काफ़िर और उनके कर्मों और अज़ाब के ज़िक्र के बाद ईमान वालों का बयान किया और उन्हे जन्नत की बशारत दी. “सालिहातुन” यानी नेकियां वो कर्म हैं जो शरीअत की रौशनी में अच्छे हों. इनमें फ़र्ज़ और नफ़्ल सब दाख़िल हैं. (जलालैन) नेक अमल का ईमान पर अत्फ़ इसकी दलील है कि अमल ईमान का अंग नहीं. यह बशारत ईमान वाले नेक काम करने वालों के लिये बिना क़ैद है और गुनाहगारों को जो बशारत दी गई है वह अल्लाह की मर्ज़ी की शर्त के साथ है कि अल्लाह चाहे तो अपनी कृपा से माफ़ फ़रमाए, चाहे गुनाहों की सज़ा देकर जन्नत प्रदान करें. (मदारकि)

(10) जन्नत के फल एक दूसरे से मिलते जुलते होंगे और उनके मज़े अलग अलग. इतलिये जन्नत वाले कहेंगे कि यही फल तो हमें पहले मिल चुका है, मगर खाने से नई लज़्ज़त पाएंगे तो उनका लुत्फ़ बहुत ज़्यादा हो जाएगा.

(11) जन्नती बीबियां चाहें हूरें हों या और, स्त्रियों की सारी जिस्मानी इल्लतों (दोषों)और तमाम नापाकियों और गंदगियों से पाक होंगी, न जिस्म पर मैल होगा, न पेशाब पख़ाना, इसके साथ ही वो बदमिज़ाजी और बदख़ल्क़ी (बुरे मिजाज़) से भी पाक होंगी.(मदारिक व ख़ाज़िन)

(12) यानी जन्नत में रहने वाले न कभी फ़ना होंगे, न जन्नत से निकाले जाएंगे, इससे मालूम हुआ कि जन्नत और इसमें रहने वालों के लिये फ़ना नही.

(13) जब अल्लाह तआला ने आयत मसलुहुम कमसलिल लज़िस्तौक़दा नारा (उनकी कहावत उसकी तरह है जिसने आग रौशन की) और आयत “कसैय्यिबिम मिनस समाए” (जैसे आसमान से उतरता पानी) में मुनाफ़िक़ो की दो मिसालें बयान फ़रमाई तो मुनाफ़िको ने एतिराज किया कि अल्लाह तआला इससे बालातर है कि ऐसी मिसालें बयान फ़रमाए. उसके रद में यह आयत उतरी.

(14) चूंकि मिसालों का बयान हिकमत (जानकारी, बोध ) देने और मज़मून को दिल में घर करने वाला बनाने के लिये होता है और अरब के अच्छी ज़बान वालों का तरीक़ा है, इसलिये मुनाफ़िक़ो का यह एतिराज ग़लत और बेजा है और मिसालों का बयान सच्चाई से भरपूर है.

(15) “युदिल्लो बिही” (इससे गुमराह करता है) काफ़िरों के उस कथन का जवाब है कि अल्लाह का इस कहावत से क्या मतलब है. “अम्मल लज़ीना आमनू” (वो जो ईमान लाए) और “अम्मल लज़ीना कफ़रू”(वो जो काफ़िर रहे), ये दो जुम्ले जो ऊपर इरशाद हुए, उनकी तफ़सीर है कि इस कहावत या मिसाल से बहुतो को गुमराह करता है जिनकी अक़्लो पर अज्ञानता या जिहालत ने ग़लबा किया है और जिनकी आदत बड़ाई छांटना और दुश्मनी पालना है और जो हक़ बात और खुली हिकमत के इन्कार और विरोध के आदी हैं और इसके बावजूद कि यह मिसाल बहुत मुनासिब है, फिर भी इन्कार करते हैं और इससे अल्लाह तआला बहुतों को हिदायत फ़रमाता है जो ग़ौर और तहक़ीक़ (अनुसंधान) के आदी हैं और इन्साफ के ख़िलाफ बात नही कहते कि हिकमत (बोध) यही है कि बड़े रूत्बे वाली चीज़ की मिसाल किसी क़द्र वाली चीज़ से और हक़ीर (तुच्छ) चीज़ की अदना चीज़ से दी जाए जैसा कि ऊपर की आयत में हक़ (सच्चाई) की नूर (प्रकाश) से और बातिल (असत्य) की ज़ुलमत (अंधेरे) से मिसाल दी गई.

(16) शरीअत में फ़ासिक़ उस नाफ़रमान को कहते हैं जो बड़े गुनाह करे. “फिस्क़” के तीन दर्जे हैं – एक तग़ाबी, वह यह कि आदमी इत्तिफ़ाक़िया किसी गुनाह का मुर्तकिब (करने वाला) हुआ और उसको बुरा ही जानता रहा, दूसरा इन्हिमाक कि बड़े गुनाहों का आदी हो गया और उनसे बचने की परवाह न रही, तीसरा जुहूद कि हराम को अच्छा जान कर इर्तिकाब करे. इस दर्जे वाला ईमान से मेहरूम हो जाता है, पहले दो दर्जो में जब तक बड़ो में बड़े गुनाह (शिर्क व कुफ़्र) का इर्तिकाब न करे, उस पर मूमिन का इतलाक़ (लागू होना) होता है, यहां “फ़ासिकीन” (बेहुक्म) से वही नाफ़रमान मुराद हैं जो ईमान से बाहर हो गए. क़ुरआने करीम में काफ़िरों पर भी फ़ासिक़ का इत्लाक़ हुआ है: इन्नल मुनाफ़िक़ीना हुमुल फ़ासिक़ून” (सूरए तौबह, आयत 67) यानी बेशक मुनाफिक़ वही पक्के बेहुक्म है. कुछ तफ़सीर करने वालों ने यहां फ़ासिक़ से काफ़िर मुराद लिये कुछ ने मुनाफिक़, कुछ ने यहूद.

(17) इससे वह एहद मुराद है जो अल्लाह तआला ने पिछली किताबो में हूजुर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाने की निस्बत फ़रमाया. एक क़ौल यह है कि एहद तीन हैं- पहला एहद वह जो अल्लाह तआला ने तमाम औलादे आदम से लिया कि उसके रब होने का इक़्रार करें. इसका बयान इस आयत में है “व इज़ अख़ज़ा रब्बुका मिम बनी आदमा….” (सूरए अअराफ, आयत 172) यानी और ऐ मेहबूब, याद करो जब तुम्हारे रब ने औलादे आदम की पुश्त से उनकी नस्ल निकाली और उन्हे ख़ुद उन पर गवाह किया, क्या मैं तुम्हारा रब नहीं, सब बोले- क्यों नहीं, हम गवाह हुए. दूसरा एहद नबियों के साथ विशेष है कि रिसालत की तबलीग़ फ़रमाएं और दीन क़ायम करें. इसका बयान आयत “व इज़ अख़ज़ना मिनन नबिय्यीना मीसाक़हुम” (सूरए अलअहज़ाब, आयत सात) में है, यानी और ऐ मेहबूब याद करो जब हमने नबियो से एहद लिया और तुम से और नूह और इब्राहीम और मूसा और ईसा मरयम के बेटे से और हम ने उनसे गाढ़ा एहद लिया. तीसरा एहद उलमा के साथ ख़ास है कि सच्चाई को न छुपाएं. इसका बयान“वइज़ अख़ज़ल्लाहो मीसाक़ल्लजीना उतुल किताब” में है, यानी और याद करो जब अल्लाह ने एहद लिया उनसे जिन्हे किताब अता हुई कि तुम ज़रूर उसे उन लोगो से बयान कर देना और न छुपाना. (सूरए आले इमरान, आयत 187)

(18) रिश्ते और क़राबत के तअल्लुक़ात (क़रीबी संबंध) मुसलबानों की दोस्ती और महब्बत, सारे नबियों को मानना, आसमानी किताबो की तस्दीक, हक़ पर जमा होना, ये वो चीज़े है जिनके मिलाने का हुकम फरमाया गया. उनमें फूट डालना, कुछ को कुछ से नाहक़ अलग करना, तफ़र्क़ो (अलगाव) की बिना डालना हराम करार दिया गया.

(19) तौहीद और नबुव्वत की दलीलों और कुफ़्र और ईमान के बदले के बाद अल्लाह तआला ने अपनी आम और ख़ास नेअमतो का, और क़ुदरत की निशानियों, अजीब बातों और हिकमतो का ज़िक्र फ़रमाया और कुफ़्र की ख़राबी दिल में बिठाने के लिये काफ़िरों को सम्बोधित किया कि तुम किस तरह ख़ुदा का इन्कार करते हो जबकि तुम्हारा अपना हाल उस पर ईमान लाने का तक़ाज़ा करता है कि तुम मुर्दा थे. मुर्दा से बेजान जिस्म मुराद है. हमारे मुहावरे में भी बोलते हैं- ज़मीन मुर्दा हो गई. मुहावरे में भी मौत इस अर्थ में आई. ख़ुद क़ुरआने पाक में इरशाद हुआ “युहयिल अरदा बअदा मौतिहा” (सूरए रूम, आयत 50) यानी हमने ज़मीन को ज़िन्दा किया उसके मरे पीछे. तो मतलब यह है कि तुम बेजान जिस्म थे, अन्सर (तत्व) की सुरत में, फिर ग़िजा की शक्ल में, फिर इख़लात (मिल जाना) की शान में, फिर नुत्फ़े (माद्दे) की हालत में. उसने तुमको जान दी, ज़िन्दा फ़रमाया. फिर उम्र् की मीआद पूरी होने पर तुम्हें मौत देगा. फिर तुम्हें ज़िन्दा करेगा. इससे या क़ब्र की ज़िन्दगी मुराद है जो सवाल के लिये होगी या हश्र की. फिर तुम हिसाब और जज़ा के लिये उसकी तरफ़ लौटाए जाओगे. अपने इस हाल को जानकर तुम्हारा कुफ़्र करना निहायत अजीब है. एक क़ौल मुफ़स्सिरीन का यह भी है कि “कैफ़ा तकफ़ुरूना” (भला तुम कैसे अल्लाह के इन्कारी हो गए) का ख़िताब मूमिनीन से है और मतलब यह है कि तुम किस तरह काफ़िर हो सकते हो इस हाल में कि तुम जिहालत की मौत से मुर्दा थे, अल्लाह तआला ने तुम्हें इल्म और ईमान की ज़िन्दगी अता फ़रमाई, इसके बाद तुम्हारे लिये वही मौत है जो उम्र गुज़रने के बाद सबको आया करती है. उसके बाद तुम्हें वह हक़ीक़ी हमेशगी की ज़िन्दगी अता फ़रमाएगा, फिर तुम उसकी तरफ़ लौटाए जाओगे और वह तुम्हें ऐसा सवाब देगा जो न किसी आंख ने देखा, न किसी कान ने सुना, न किसी दिल ने उसे मेहसूस किया.

(20) यानी खानें, सब्ज़े, जानवर, दरिया, पहाड जो कुछ ज़मीन में है सब अल्लाह तआला ने तुम्हारे दीनी और दुनियावी नफ़े के लिये बनाए. दीनी नफ़ा इस तरह कि ज़मीन के अजायबात देखकर तुम्हें अल्लाह तआला की हिकमत और कुदरत की पहचान हो और दुनियावी मुनाफ़ा यह कि खाओ पियो, आराम करो, अपने कामों में लाओ तो इन नेअमतो के बावुजूद तुम किस तरह कुफ़्र करोगे. कर्ख़ी और अबूबक्र राज़ी वग़ैरह ने “ख़लक़ा लकुम” (तुम्हारे लिये बनाया) को फ़ायदा पहुंचाने वाली चीज़ों की मूल वैघता (मुबाहुल अस्ल) की दलील ठहराया है.

(21) यानी यह सारी चीज़ें पैदा करना और बनाना अल्लाह तआला के उस असीम इल्म की दलील है जो सारी चीज़ों को घेरे हुए है, क्योंकि ऐसी सृष्टि का पैदा करना, उसकी एक-एक चीज़ की जानकारी के बिना मुमकिन नहीं. मरने के बाद ज़िन्दा होना काफ़िर लोग असम्भव मानते थे. इन आयतों में उनकी झूठी मान्यता पर मज़बूत दलील क़ायम फ़रमादी कि जब अल्लाह तआला क़ुदरत वाला (सक्षम) और जानकार है और शरीर के तत्व जमा होने और जीवन की योग्यता भी रखते हैं तो मौत के बाद ज़िन्दगी कैसे असंभव हो सकती है, आसमान और ज़मीन की पैदाइश के बाद अल्लाह तआला ने आसमान में फरिश्तों को और ज़मीन में जिन्नों को सुकूनत दी. जिन्नों ने फ़साद फैलाया तो फ़रिश्तो की एक जमाअत भेजी जिसने उन्हें पहाडों और जज़ीरों में निकाल भगाया.

सूरए बक़रह _ चौथा रूकू

सूरए बक़रह _ चौथा रूकू

और याद करो जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों से फ़रमाया मैं ज़मीन में अपना नायब बनाने वाला हूं(1)
बोले क्या ऐसे को (नायब) करेगा जो उसमें फ़साद फैलाएगा और ख़ून बहाएगा (2)
और तुझे सराहते हुए तेरी तस्बीह (जाप) करते हैं और तेरी पाकी बोलते हैं फ़रमाया मुझे मालूम है जो तुम नहीं जानते (3)
और अल्लाह तआला ने आदम को सारी (चीज़ों के) नाम सिखाए(4)
फिर सब (चीज़ों) को फ़रिश्तों पर पेश करके फ़रमाया सच्चे हो तो उनके नाम तो बताओ (5)
बोले पाकी है तुझे हमें कुछ इल्म नहीं मगर जितना तूने हमें सिखाया बेशक तू ही इल्म और हिकमत वाला है(6)
फ़रमाया ऐ आदम बतादे उन्हें सब (चीज़ों) के नाम जब उसने (यानि आदम ने)उन्हें सब के नाम बता दिये(7)
फ़रमाया मैं न कहता था कि मैं जानता हूं जो कुछ तुम ज़ाहिर करते और जो कुछ तुम छुपाते हो (8)
और (याद करो) जब हमने फ़रिश्तों को हुक्म दिया कि आदम को सिजदा करो तो सबने सिजदा किया सिवाए इबलीस (शैतान) के कि इन्कारी हुआ और घमन्ड किया ओर काफ़िर हो गया(9)
और हमने फ़रमाया ऐ आदम तू और तेरी बीवी इस जन्नत में रहो और खाओ इसमें से बे रोक टोक जहां तुम्हारा जी चाहे मगर उस पेड़ के पास न जाना(10)
कि हद से बढ़ने वालों में हो जाओगे(11)
तो शैतान ने उससे (यानी जन्नत से) उन्हें लग़ज़िश (डगमगाहट) दी और जहां रहते थे वहां से उन्हें अलग कर दिया (12)
और हमने फ़रमाया नीचे उतरो(13)
आपस में एक तुम्हारा दूसरे का दुश्मन और तुम्हें एक वक्त़ तक ज़मीन में ठहरना और बरतना है(14)
फिर सीख लिये आदम ने अपने रब से कुछ कलिमे (शब्द) तो अल्लाह ने उसकी तौबा क़ुबूल की(15)
बेशक वही है बहुत तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान हमने फ़रमाया तुम सब जन्नत से उतर जाओ फिर अगर तुम्हारे पास मेरी तरफ़ से कोई हिदायत आए तो जो मेरी हिदायत का पालन करने वाला हुआ उसे न कोई अन्देशा न कुछ ग़म (16)
और वो जो कुफ्र और मेरी आयतें झुटलांएगे वो दोज़ख़ वाले है उनको हमेशा उस में रहना(39) –

तफ़सीर : सूरए बक़रह चौथा रूकू

(1) ख़लीफ़ा निर्देशो और आदेशों के जारी करने और दूसरे अधिकारों में अस्ल का नायब होता है. यहाँ ख़लीफ़ा से हज़रत आदम (अल्लाह की सलामती उनपर) मुराद है. अगरचे और सारे नबी भी अल्लाह तआला के ख़लीफ़ा हैं. हज़रत दाउद  अलैहिस्सलाम के बारे में फ़रमाया : “या दाउदो इन्ना जअलनाका ख़लीफ़तन फ़िलअर्दे” (सूरए सॉद, आयत 26) यानी ऐ दाऊद,  बेशक हमने तुझे ज़मीन में नायब किया, तो लोगो में सच्चा हुक्म कर.फ़रिश्तों को हज़रत आदम की ख़िलाफ़त की ख़बर इसलिये दी गई कि वो उनके ख़लीफ़ा बनाए जाने की हिकमत (रहस्य) पूछ कर मालूम करलें और उनपर ख़लीफ़ा की बुज़र्गी और शान ज़ाहिर हो कि उनको पैदाइश से पहले ही ख़लीफ़ा का लक़ब अता हुआ और आसमान वालों को उनकी पैदाइश की ख़ुशख़बरी दी गई. इसमें बन्दों को तालीम है कि वो काम से पहले मशवरा किया करें और अल्लाह तआला इससे पाक है कि उसको मशवरे की ज़रूरत हो.

(2) फ़रिश्तों को मक़सद एतिराज या हज़रत आदम पर लांछन नहीं, बल्कि ख़िलाफ़त का रहस्य मालूम करना है, और इंसानों की तरफ़ फ़साद फैलाने की बात जोड़ना इसकी जानकारी या तो उन्हें अल्लाह तआला की तरफ़ से दी गई हो या लौहे मेहफ़ूज से प्राप्त हुई हो या ख़ुद उन्होंने जिन्नात की तुलना में अन्दाज़ा लगाया हो.

(3) यानी मेरी हिकमतें (रहस्य) तुम पर ज़ाहिर नहीं. बात यह है कि इन्सानों में नबी भी होंगे, औलिया भी, उलमा भी, और वो इल्म और अमल दोनों एतिबार से फज़ीलतों (महानताओ) के पूरक होंगे.

(4) अल्लाह तआला ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम पर तमाम चीज़ें और सारे नाम पेश फ़रमाकर उनके नाम, विशेषताएं, उपयोग, गुण इत्यादि सारी बातों की जानकारी उनके दिल में उतार दी.

(5) यानी अगर तुम अपने इस ख़याल में सच्चे हो कि मैं कोई मख़लूक़ (प्राणी जीव) तुमसे ज़्यादा जगत में पैदा न करूंगा और ख़िलाफ़त के तुम्हीं हक़दार हो तो इन चीज़ों के नाम बताओ क्योंकि ख़लीफ़ा का काम तसर्रूफ़ (इख़्तियार) और तदबीर, इन्साफ और अदल है और यह बग़ैर इसके सम्भव नहीं कि ख़लीफ़ा को उन तमाम चीज़ों की जानकारी हो जिनपर उसको पूरा अधिकार दिया गया और जिनका उसको फ़ैसला करना है. अल्लाह तआला ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के फ़रिश्तों पर अफ़ज़ल (उच्चतर) होने का कारण ज़ाहिरी इल्म फ़रमाया. इससे साबित हुआ कि नामों का इल्म अकेलेपन और तनहाइयों की इबादत से बेहतर है. इस आयत से यह भी साबित हुआ कि नबी फ़रिश्तों से ऊंचे हैं.

(6) इसमें फ़रिश्तों की तरफ़ से अपने इज्ज़ (लाचारी) और ग़लती का ऐतिराफ और इस बात का इज़हार है कि उनका सवाल केवल जानकारी हासिल करने के लिये था, न कि ऐतिराज़ की नियत से. और अब उन्हें इन्सान की फ़ज़ीलत (बड़ाई) और उसकी पैदाइश का रहस्य मालूम हो गया जिसको वो पहले न जानते थे.

(7) यानी हज़रत आदम अहैहिस्सलाम ने हर चीज़ का नाम और उसकी पैदाइश का राज़ बता दिया.

(8) फ़रिश्तों ने जो बात ज़ाहिर की थी वह थी कि इन्सान फ़साद फैलाएगा, ख़ून ख़राबा करेगा और जो बात छुपाई थी वह यह थी कि ख़िलाफ़त के हक़दार वो ख़ुद हैं और अल्लाह तआला उनसें ऊंची और जानकार कोई मख़लूक़ पैदा न फ़रमाएगा. इस आयत से इन्सान की शराफ़त और इल्म की बड़ाई साबित होती है और यह भी कि अल्लाह तआला की तरफ तालीम की निस्बत करना सही हैं. अगरचे उसको मुअल्लिम (उस्ताद) न कहा जाएगा, क्योंकि उस्ताद पेशावर तालीम देने वाले को कहते हैं. इससे यह भी मालूम हुआ कि सारे शब्दकोष, सारी ज़बानें अल्लाह तआला की तरफ़ से हैं. यह भी साबित हुआ कि फ़रिश्तों के इल्म और कमालात में बढ़ौत्री होती है.

(9) अल्लाह तआला ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को सारी सृष्टि का नमूना और रूहानी व जिस्मानी दुनिया का मजमूआ बनाया और फ़रिश्तों के लिये कमाल हासिल करने का साधन किया तो उन्हें हुक्म फ़रमाया कि हज़रत आदम को सज्दा करें क्योंकि इसमें शुक्रगुज़ारी (कृतज्ञता) और हज़रत आदम के बड़प्पन के एतिराफ़ और अपने कथन की माफ़ी की शान पाई जाती है. कुछ विद्वानो ने कहा है कि अल्लाह तआला ने हज़रत आदम को पैदा करने से पहले ही सज्दे का हुक्म दिया था, उसकी सनद (प्रमाण) यह आयत है : “फ़ इज़ा सव्वैतुहू व नफ़ख़्तो फ़ीहे मिर रूही फ़क़ऊ लहू साजिदीन” (सूरए अल-हिजर, आयत 29) यानी फिर जब मैं उसे ठीक बनालूं और उसमें अपनी तरफ़ की ख़ास इज़्ज़त वाली रूह फूंकूं तो तुम उसके लिये सज्दे में गिरना.(बैज़ावी). सज्दे का हुक्म सारे फ़रिश्तों को दिया गया था, यही सब से ज़्यादा सही है. (ख़ाज़िन) सज्दा दो तरह का होता है एक इबादत का सज्दा जो पूजा के इरादे से किया जाता है, दूसरा आदर का सज्दा जिससे किसी की ताज़ीम मंजूर होती है न कि इबादत. इबादत का सज्दा अल्लाह तआला के लिए ख़ास है, किसी और के लिये नहीं हो सकता न किसी शरीअत में कभी जायज़ हुआ. यहाँ जो मुफ़स्सिरीन इबादत का सज्दा मुराद लेते हैं वो फ़रमाते हैं कि सज्दा ख़ास अल्लाह तआला के लिए था और हज़रत आदम क़िबला बनाए गए थे. मगर यह तर्क कमज़ोर है क्योंकि इस सज्दे से हज़रत आदम का बड़प्पन, उनकी बुज़ुर्गी और महानता ज़ाहिर करना मक़सूद थी. जिसे सज्दा किया जाए उस का सज्दा करने वाले से उत्तम होना कोई ज़रूरी नहीं, जैसा कि काबा हूज़ुर सैयदुल अंबिया का क़िबला और मस्जूद इलैह (अर्थात जिसकी तरफ़ सज्दा हो) है, जब कि हुज़ूर उससे अफ़ज़ल (उत्तम) है. दूसरा कथन यह है कि यहां इबादत का सज्दा न था बल्कि आदर का सज्दा था और ख़ास हज़रत आदम के लिये था, ज़मीन पर पेशानी रखकर था न कि सिर्फ़ झुकना. यही कथन सही है, और इसी पर सर्वानुमति है. (मदारिक). आदर का सज्दा पहली शरीअत में जायज़ था, हमारी शरीअत में मना किया गया. अब किसी के लिये जायज़ नहीं क्योंकि जब हज़रत सलमान (अल्लाह उनसे राज़ी हो) ने हूज़ुर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को सज्दा करने का इरादा किया तो हूजु़र ने फ़रमाया मख़लूक़ को न चाहिये कि अल्लाह के सिवा किसी को सज्दा करें. (मदारिक). फ़रिश्तों में सबसे पहले सज्दा करने वाले हज़रत जिब्रील हैं, फिर मीकाईल, फिर इसराफ़ील, फिर इज़्राईल, फिर और क़रीबी फ़रिश्तें. यह सज्दा शुक्रवार के रोज़ ज़वाल के वक़्त से अस्त्र तक किया गया. एक कथन यह भी है कि क़रीबी फ़रिश्तें सौ बरस और एक कथन में पाँच सौ बरस सज्दे में रहे. शैतान ने सज्दा न किया और घमण्ड के तौर पर यह सोचता रहा कि वह हज़रत आदम से उच्चतर है, और उसके लिये सज्दे का हुक्म (मआज़ल्लाह) हिक़मत (समझदारी) के ख़िलाफ़ है. इस झूटे अक़ीदे से वह काफिर हो गया. आयत में साबित है कि हज़रत आदम फ़रिश्तों से ऊपर हैं कि उनसे उन्हें सज्दा कराया गया. घमण्ड बहुत बुरी चीज़ है. इससे कभी घमण्डी की नौबत कुफ़्र तक पहुंचती है. (बैज़ावी और जुमल)

(10) इससे गेहूँ या अंगूर वग़ैरह मुराद हैं. (जलालैन)

(11) ज़ुल्म के मानी हैं किसी चीज़ को बे-महल वज़अ यह मना है. और अंबियाए किराम मासूम हैं, उनसे गुनाह सरज़द नहीं होता. और अंबियाए किराम को ज़ालिम कहना उनकी तौहीन और कुफ़्र है, जो कहे वह काफ़िर हो जाएगा. अल्लाह तआला मालिक व मौला है जो चाहे फ़रमाए, इसमें उनकी इज़्ज़त है, दूसरे की क्या मजाल कि अदब के ख़िलाफ कोई बात ज़बान पर लाए और अल्लाह तआला के कहे को अपने लिये भी मुनासिब जाने. हमें अदब, इज़्ज़त, फ़रमाँबरदारी का हुक्म फ़रमाया, हम पर यही लाज़िम है.

(12) शैतान ने किसी तरह हज़रत आदम और हव्वा के पास पहुंचकर कहा, क्या मैं तुम्हें जन्नत का दरख़्त बता दूँ ? हज़रत आदम ने इन्कार किया. उसने क़सम खाई कि में तुम्हारा भला चाहने वाला हूँ. उन्हें ख़याल हुआ कि अल्लाह पाक की झूठी क़सम कौन खा सकता है. इस ख़याल से हज़रत हव्वा ने उसमें से कुछ खाया फिर हज़रत आदम को दिया, उन्होंने भी खाया. हज़रत आदम को ख़याल हुआ कि “ला तक़रबा” (इस पेड़ के पास न जाना) की मनाही तन्ज़ीही (हल्की ग़ल्ती) है, तहरीमी नहीं क्योंकि अगर वह हराम के अर्थ में समझते तो हरगिज ऐसा न करते कि अंबिया मासूम होते हैं, यहाँ हज़रत आदम से इज्तिहाद (फैसला) में ग़लती हुई और इज्तिहाद की ग़लती गुनाह नहीं होती.

(13) हज़रत आदम और हव्वा और उनकी औलाद को जो उनके सुल्ब (पुश्त) में थी जन्नत से ज़मीन पर जाने का हुक्म हुआ. हज़रत आदम हिन्द की धरती पर सरअन्दीप (मौजूदा श्रीलंका) के पहाड़ों पर और हज़रत हव्वा जिद्दा में उतारे गए (ख़ाज़िन). हज़रत आदम की बरकत से ज़मीन के पेड़ों में पाकीज़ा ख़ुश्बू पैदा हुई. (रूहुल बयान)

(14) इससे उम्र का अन्त यानी मौत मुराद है. और हज़रत आदम के लिए बशारत है कि वह दुनिया में सिर्फ़ उतनी मुद्दत के लिये हैं उसके बाद उन्हे जन्नत की तरफ़ लौटना है और आपकी औलाद के लिये मआद (आख़िरत) पर दलालत है कि दुनिया की ज़िन्दगी निश्चित समय तक है. उम्र पूरी होने के बाद उन्हें आख़िरत की तरफ़ पलटना है.

(15) आदम अलैहिस्सलाम ने ज़मीन पर आने के बाद तीन सौ बरस तक हया (लज्जा) से आसमान की तरफ़ सर न उठाया, अगरचे हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम बहुत रोने वाले थे, आपके आंसू तमाम ज़मीन वालों के आँसूओं से ज़्यादा हैं, मगर हज़रत आदम अलैहिस्सलाम इतना रोए कि आप के आँसू हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम और तमाम ज़मीन वालों के आंसुओं के जोड़ से बढ़ गए (ख़ाज़िन). तिब्रानी, हाकिम, अबूनईम और बैहक़ी ने हज़रत अली मुर्तज़ा (अल्लाह उनसे राज़ी रहे) से मरफ़ूअन रिवायत की है कि जब हज़रत आदम पर इताब हुआ तो आप तौबह की फ़िक़्र में हैरान थे. इस परेशानी के आलम में याद आया कि पैदाइश के वक़्त मैं ने सर उठाकर देखा था कि अर्श पर लिखा है “ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” मैं समझा था कि अल्लाह की बारगाह में वह रूत्बा किसी को हासिल नहीं जो हज़रत मुहम्मद (अल्लाह के दुरूद हों उन पर और सलाम) को हासिल है कि अल्लाह तआला ने उनका नाम अपने पाक नाम के साथ अर्श पर लिखवाया. इसलिये आपने अपनी दुआ में “रब्बना ज़लमना अन्फुसना व इल्लम तग़फ़िर लना व तरहमना लनकूनन्ना मिनल ख़ासिरीन.” यानी ऐ रब हमारे हमने अपना आप बुरा किया तो अगर तू हमें न बख्शे और हम पर रहम न करे तो हम ज़रूर नुक़सान वालों में हुए. (सूरए अअराफ़, आयत 23) के साथ यह अर्ज़ किया “अस अलुका बिहक्क़े मुहम्मदिन अन तग़फ़िर ली” यानी ऐ अल्लाह मैं मुहम्मद के नाम पर तुझसे माफ़ी चाहता हूँ. इब्ने मुन्ज़र की रिवायत में ये कलिमे हैं “अल्लाहुम्मा इन्नी असअलुका बिजाहे मुहम्मदिन अब्दुका व करामतुहू अलैका व अन तग़फ़िर ली ख़तीअती” यानी यारब मैं तुझ से तेरे ख़ास बन्दे मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की इज़्ज़त और मर्तबे के तुफ़ैल में, और उस बुज़ुर्गी के सदक़े में, जो उन्हें तेरे दरबार में हासिल है, मग़फ़िरत चाहता हूँ”. यह दुआ करनी थी कि हक़ तआला ने उनकी मग़फ़िरत फ़रमाई. इस रिवायत से साबित है कि अल्लाह के प्यारों के वसीले से दुआ उनके नाम पर, उनके वसीले से कहकर मांगना जायज़ है और हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की सुन्नत है. अल्लाह तआला पर किसी का हक़ (अधिकार) अनिवार्य नहीं होता लेकिन वह अपने प्यारों को अपने फ़ज़्ल और करम से हक़ देता है. इसी हक़ के वसीले से दुआ की जाती है. सही हदीसों से यह हक़ साबित है जैसे आया “मन आमना बिल्लाहे व रसूलिही व अक़ामस सलाता व सौमा रमदाना काना हक्क़न अलल्लाहे  अैयं यदख़ुलल जन्नता”. हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की तौबह दसवीं मुहर्रम को क़ुबुल हुई. जन्नत से निकाले जाने के वक़्त और नेअमतों के साथ अरबी ज़बान भी आप से सल्ब कर ली गई थी उसकी जगह ज़बाने मुबारक पर सुरियानी जारी कर दी गई थी, तौबह क़ुबुल होने के बाद फिर अरबी ज़बान अता हुई.  (फ़तहुल अज़ीज़) तौबह की अस्ल अल्लाह की तरफ़ पलटना है. इसके तीन भाग हैं- एक ऐतिराफ़ यानी अपना गुनाह तस्लीम करना, दूसरे निदामत यानी गुनाह की शर्म, तीसरे कभी गुनाह न करने का एहद. अगर गुनाह तलाफ़ी (प्रायश्चित) के क़ाबिल हो तो उसकी तलाफ़ी भी लाज़िम है. जैसे नमाज़ छोड़ने वाले की तौबह के लिये पिछली नमाज़ों का अदा करना अनिवार्य है. तौबह के बाद हज़रत जिब्रील ने ज़मीन के तमाम जानवरों में हज़रत अलैहिस्सलाम की ख़िलाफ़त का ऐलान किया और सब पर उनकी फ़रमाँबरदारी अनिवार्य होने का हुक्म सुनाया. सबने हुकम मानने का इज़हार किया. ( फ़त्हुल अज़ीज़)

(16) यह ईमान वाले नेक आदमियों के लिये ख़ुशख़बरी है कि न उन्हें बड़े हिसाब के वक़्त ख़ौफ़ हो और न आख़िरत में ग़म. वो बेग़म जन्नत में दाख़िल होंगे.

सूरए बक़रह _ पांचवा रूकू

सूरए बक़रह _ पांचवा रूकू

ऐ याक़ूब की सन्तान (1)
याद करो मेरा वह एहसान जो मैं ने तुम पर किया(2)
और मेरा अहद पूरा करो मैं तुम्हारा अहद पूरा करूंगा(3)
और ख़ास मेरा ही डर रखो(4)
और ईमान लाओ उस पर जो मैं ने उतारा उसकी तस्दीक़ (पुष्टि) करता हुआ जो तुम्हारे साथ है और सबसे पहले उसके मुनकिर यानी इन्कार करने वाले न बनो(5)
और मेरी आयतों के बदले थोड़े दाम न लो(6)
और मुझी से डरो और हक़ (सत्य) से बातिल (झूठ) को न मिलाओ और जान बूझकर हक़ न छुपाओ और नमाज़ क़ायम रखो और ज़कात दो और रूकू करने वालों (झुकने वालों) के साथ रूकू करो (7)
क्या लोगों को भलाई का हुक्म देते हो और अपनी जानों को भूलते हो हालांकि तुम किताब पढ़ते हो तो क्या तुम्हें अक्ल़ नहीं(8)
और सब्र और नमाज़ से मदद चाहो और बेशक नमाज़ ज़रूर भारी है मगर उनपर (नही) जो दिल से मेरी तरफ़ झुकते हैं (9)
जिन्हें यक़ीन है कि उन्हें अपने रब से मिलना है और उसी की तरफ़ फिरना(10) (46)

तफ़सीर : सूरए बक़रह – पाँचवा रूकू

(1) इस्त्राईल यानी अब्दुल्लाह, यह इब्रानी ज़बान का शब्द है. यह हज़रत यअक़ूब अलैहिस्सलाम का लक़ब है. (मदारिक). कल्बी मुफ़स्सिर ने कहा अल्लाह तआला ने “या अय्युहन्नासोअ बुदू” (ऐ लोगो इबादत करो) फ़रमाकर पहले सारे इन्सानों को आम दावत दी, फिर “इज़क़ाला रब्बुका” फ़रमाकर उनके मुब्दअ का ज़िक्र किया. इसके बाद ख़ुसूसियत के साथ बनी इस्त्राईल को दावत दी. ये लोग यहूदी हैं और यहाँ से “सयक़ूल” तक उनसे कलाम जारी है. कभी ईमान की याद दिलाकर दावत की जाती है, कभी डर दिलाया जाता है, कभी हुज्जत (तर्क) क़ायम की जाती है, कभी उनकी बदअमली पर फटकारा जाता है. कभी पिछली मुसीबतों का ज़िक्र किया जाता है.

(2) यह एहसान कि तुम्हारे पूर्वजों को फ़िरऔन से छुटकारा दिलाया, दरिया को फाड़ा, अब्र को सायबान किया. इनके अलावा और एहसानात, जो आगे आते हैं, उन सब को याद करो. और याद करना यह है कि अल्लाह तआला की बन्दगी और फ़रमाँबरदारी करके शुक्र बजा लाओ क्योंकि किसी नेअमत का शुक्र न करना ही उसका  भुलाना है.

(3) यानी तुम ईमान लाकर और फ़रमाँबरदारी करके मेरा एहद पूरा करो, मैं नेक बदला और सवाब देकर तुम्हारा एहद पूरा करूंगा. इस एहद का बयान आयत : “व लक़द अख़ज़ल्लाहो मीसाक़ा बनी इस्त्राईला”यानी और बेशक अल्लाह ने बनी इस्त्राईल से एहद लिया. (सूरए मायदा, आयत 12) में है.

(4) इस आयत में नेअमत का शुक्र करने और एहद पूरा करने के वाजिब होने का बयान है और यह भी कि मूमिन को चाहिये कि अल्लाह के सिवा किसी से न डरे.

(5) यानी क़ुरआने पाक और तौरात और इंजील पर, जो तुम्हारे साथ हैं, ईमान लाओ और किताब वालों में पहले काफ़िर न बनो कि जो तुम्हारे इत्तिबाअ (अनुकरण) में कुफ़्र करे उसका वबाल भी तुम पर हो.

(6) इन आयतों से तौरात व इंजील की वो आयतें मुराद है जिन में हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तारीफ़ और बड़ाई है. मक़सद यह है कि हुज़ूर की नअत या तारीफ़ दुनिया की दौलत के लिये मत छुपाओ कि दुनिया का माल छोटी पूंजी और आख़िरत की नेअमत के मुक़ाबले में बे हक़ीक़त है.
यह आयत कअब बिन अशरफ़ और यहूद के दूसरे रईसों और उलमा के बारे में नाज़िल हुई जो अपनी क़ौम के जाहिलों और कमीनों से टके वुसूल कर लेते और उन पर सालाने मुक़र्रर करते थे और उन्होने फलों और नक़्द माल में अपने हक़ ठहरा लिये थे. उन्हें डर हुआ कि तौरात में जो हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नअत और सिफ़त (प्रशंसा) है, अगर उसको ज़ाहिर करें तो क़ौम हुज़ूर पर ईमान ले जाएगी और उन्हें कोई पूछने वाला न होगा. ये तमाम फ़ायदे और मुनाफ़े जाते रहेंगे. इसलिये उन्होंने अपनी किताबों में बदलाव किया और हुजू़र की पहचान और तारीफ़ को बदल डाला. जब उनसे लोग पूछते कि तौरात में हुज़ूर की क्या विशेषताएं दर्ज हैं तो वो छुपा लेते और हरगिज़ न बताते. इस पर यह आयत उतरी. (ख़ाज़िन वग़ैरह)

(7) इस आयत में नमाज़ और ज़कात के फ़र्ज़ होने का बयान है और इस तरफ़ भी इशारा है कि नमाज़ों को उनके हुक़ूक़ (संस्कारों) के हिसाब से अदा करो. जमाअत (सामूहिक नमाज़) की तर्ग़ीब भी है. हदीस शरीफ़ में है जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ना अकेले पढ़ने से सत्ताईस दर्जे ज़्यादा फ़ज़ीलत (पुण्य) रखता है.

(8) यहूदी उलमा से उनके मुसलमान रिश्तेदारों ने इस्लाम के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा तुम इस दीन पर क़ायम रहो. हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का दीन भी सच्चा और कलाम भी सच्चा. इस पर यह आयत उतरी. एक कथन यह है कि आयत उन यहूदियों के बारे में उतरी जिन्होंने अरब मुश्रिको को हुज़ूर के नबी होने की ख़बर दी थी और हुज़ूर का इत्तिबा (अनुकरण) करने की हिदायत की थी. फिर जब हुज़ूर की नबुव्वत ज़ाहिर हो गई तो ये हिदायत करने वाले हसद (ईर्ष्या) से ख़ुद काफ़िर हो गए. इस पर उन्हें फटकारा गया.(ख़ाज़िन व मदारिक)

(9) यानी अपनी ज़रूरतों में सब्र और नमाज़ से मदद चाहों. सुबहान अल्लाह, क्या पाकीज़ा तालीम है. सब्र मुसीबतों का अख़लाक़ी मुक़ाबला है. इन्सान इन्साफ़ और सत्यमार्ग के संकल्प पर इसके बिना क़ायम नहीं रह सकता. सब्र की तीन क़िस्में हैं- (1) तकलीफ़ और मुसीबत पर नफ़्स को रोकना, (2) ताअत (फरमाँबरदारी) और इबादत की मशक़्क़तों में मुस्तक़िल (अडिग) रहना, (3) गुनाहों की तरफ़ खिंचने से तबीअत को रोकना. कुछ मुफ़स्सिरों ने यहां सब्र से रोज़ा मुराद लिया है. वह भी सब्र का एक अन्दाज़ है. इस आयत में मुसीबत के वक़्त नमाज़ के साथ मदद की तालीम भी फ़रमाई क्योंकि वह बदन और नफ़्स की इबादत का संगम है और उसमें अल्लाह की नज़्दीकी हासिल होती है. हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अहम कामों के पेश आने पर नमाज़ में मश़्गूल हो जाते थे. इस आयत में यह भी बताया गया कि सच्चे ईमान वालों के सिवा औरों पर नमाज़ भारी पड़ती है.

(10) इसमें ख़ुशख़बरी है कि आख़िरत में मूमिनों को अल्लाह के दीदार की नेअमत मिलेगी.

सूरए बक़रह _ छटा रूकू
ऐ याक़ूब की सन्तान, याद करो मेरा वह अहसान जो मैं ने तुमपर किया और यह कि इस सारे ज़माने पर तुम्हें बड़ाई दी (1)
और डरो उस दिन से जिस दिन कोई जान दूसरे का बदला न हो सकेगी(2)
और न क़ाफिर के लिये कोई सिफ़ारिश मानी जाए और न कुछ लेकर उसकी जान छोड़ी जाए और न उनकी मदद हो(3)
और (याद करो)जब हमने तुमको फ़िरऔन वालों से नजात बख्श़ी (छुटकारा दिलाया)(4)
कि तुमपर बुरा अजा़ब करते थे(5)
तुम्हारे बेटों को ज़िब्ह करते और तुम्हारी बेटियों को ज़िन्दा रखते(6)
और उसमें तुम्हारे रब की तरफ़ से बड़ी बला थी या बड़ा इनाम(7)
और जब हमने तुम्हारे लिये दरिया फ़ाड़ दिया तो तुम्हें बचा लिया. और फ़िरऔन वालों को तुम्हारी आंखों के सामने डुबो दिया(8) 
और जब हमने मूसा से चालीस रात का वादा फ़रमाया फिर उसके पीछे तुमने बछड़े की पूजा शुरू कर दी और तुम ज़ालिम थे (9)
फिर उसके बाद हमने तुम्हें माफ़ी दी(10)
कि कहीं तुम अहसान मानो (11)
और जब हमने मूसा को किताब दी और सत्य और असत्य में पहचान कर देना कि कहीं तुम राह पर आओ और जब मूसा ने अपनी कौ़म से कहा ऐ मेरी कौ़म तुमने बछड़ा बनाकर अपनी जानों पर ज़ुल्म किया तो अपने पैदा करने वाले की तरफ़ लौट आओ तो आपस में एक दूसरे को क़त्ल करो(12)
यह तुम्हारे पैदा करने वाले के नज्द़ीक तुम्हारे लिये बेहतर है तो उसने तुम्हारी तौबह क़ुबूल की, बेशक वही है बहुत तौबह क़ुबूल करने वाला मेहरबान(13)
और जब तुमने कहा ऐ मूसा हम हरगिज़ (कदाचित) तुम्हारा यक़ीन न लाएंगे जब तक खुले बन्दों ख़ुदा को न देख लें तो तुम्हें कड़क ने आ लिया और तुम देख रहे थे फिर मेरे पीछे हमने तुम्हें ज़िन्दा किया कि कहीं तुम एहसान मानो और हमने बादल को तुम्हारा सायबान किया(14)
और तुमपर मत्र और सलवा उतारा, खाओ हमारी दी हुई सुथरी चीज़ें(15)
ओर उन्होंने कुछ हमारा न बिगाड़ा, हां अपनी ही जानों का बिगाड़ करते थे और जब हमने फ़रमाया उस बस्ती में जाओ (16)
फिर उसमें जहां चाहो, बे रोक टोक खाओ और दरवाज़ें में सजदा करते दाख़िल हो(17)
और कहो हमारे गुनाह माफ़ हों हम तुम्हारी ख़ताएं बख्श़ देंगे और क़रीब है कि नेकी वालों को और ज्य़ादा दें(18)
तो ज़ालिमों ने और बात बदल दी जो फ़रमाई गई थी उसके सिवा(19)
तो हमने आसमान से उनपर अज़ाब उतारा(20)
बदला उनकी बे हुकमी का (59)

तफ़सीर : सूरए बक़रह – छटा रूकू

(1) अलआलमीन (सारे ज़माने पर) उसके वास्तविक या हक़ीक़ी मानी में नहीं. इससे मुराद यह है कि मैं ने तुम्हारे पूर्वजों को उनके ज़माने वालों पर बुज़ुर्गी दी. यह बुज़ुर्गी किसी विशेष क्षेत्र में हो सकती है, जो और किसी उम्मत की बुज़ुर्गी को कम नहीं कर सकती. इसलिये उम्मते मुहम्मदिया के बारे में इरशाद हुआ “कुन्तुम खै़रा उम्मतिन” यानी तुम बेहतर हो उन सब उम्मतों में जो लोगों में ज़ाहिर हुई (सूरए आले इमरान, आयत 110). (रूहुल बयान, जुमल वग़ैरह)

(2) वह क़यामत का दिन है. आयत में नफ़्स दो बार आया है, पहले से मूमिन का नफ़्स, दूसरे से काफ़िर मुराद है. (मदारिक)

(3) यहाँ से रूकू के आख़िर तक दस नेअमतों का बयान है जो इन बनी इस्त्राईल के बाप दादा को मिलीं.

(4) क़िब्त और अमालीक़ की क़ौम से जो मिस्त्र का बादशाह हुआ. उस को फ़िरऔन कहते है. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के ज़माने के फ़िरऔन का नाम वलीद बिन मुसअब बिन रैयान है. यहां उसी का ज़िक्र है. उसकी उम्र चार सौ बरस से ज़्यादा हुई. आले फ़िरऔन से उसके मानने वाले मुराद है. (जुमल वग़ैरह)

(5) अज़ाब सब बुरे होते हैं “सूअल अज़ाब” वह कहलाएगा जो और अज़ाबों से ज़्यादा सख़्त हो. इसलिये आला हज़रत ने “बुरा अज़ाब” अनुवाद किया. फ़िरऔन ने बनी इस्त्राईल पर बड़ी बेदर्दी से मेहनत व मशक़्क़त के दुश्वार काम लाज़िम किये थे. पत्थरों की चट्टानें काटकर ढोते ढोते उनकी कमरें गर्दनें ज़ख़्मी हो गई थीं. ग़रीबों पर टैक्स मुक़र्रर किये थे जो सूरज डूबने से पहले ज़बरदस्ती वुसूल किये जाते थे. जो नादार किसी दिन टैकस अदा न कर सका, उसके हाथ गर्दन के साथ मिलाकर बांध दिये जाते थे, और महीना भर तक इसी मुसीबत में रखा जाता था, और तरह तरह की सख़्तियां निर्दयता के साथ की जाती थीं. ( ख़ाज़िन वग़ैरह)

(6) फ़िरऔन ने ख़्वाब देखा कि बैतुल मक़दिस की तरफ़ से आग आई उसने मिस्त्र को घेर कर तमाम क़िब्तियों को जला डाला, बनी इस्त्राईल को कुछ हानि न पहुंचाई. इससे उसको बहुत घबराहट हुई. काहिनों (तांत्रिकों) ने ख़्वाब की तअबीर (व्याख्या) में बताया कि बनी इस्त्राईल में एक लड़का पैदा होगा जो तेरी मौत और तेरी सल्तनत के पतन का कारण होगा. यह सुनकर फ़िरऔन ने हुक्म दिया कि बनी इस्त्राईल में जो लड़का पैदा हो. क़त्ल कर दिया जाए. दाइयां छान बीन के लिये मुक़र्रर हुई. बारह हजा़र और दूसरे कथन के अनुसार सत्तर हज़ार लड़के क़त्ल कर डाले गए और नव्वे हज़ार हमल (गर्भ) गिरा दिये गये. अल्लाह की मर्ज़ी से इस क़ौम के बूढ़े जल्द मरने लगे. क़िब्ती क़ौम के सरदारों ने घबराकर फ़िरऔन से शिकायत की कि बनी इस्त्राईल में मौत की गर्मबाज़ारी है इस पर उनके बच्चे भी क़त्ल किये जाते हैं, तो हमें सेवा करने वाले कहां से मिलेंगे. फ़िरऔन ने हुक्म दिया कि एक साल बच्चे क़त्ल किये जाएं और एक साल छोड़े जाएं. तो जो साल छोडने का था उसमें हज़रत हारून पैदा हुए, और क़त्ल के साल हज़रत मूसा की पैदाइशा हुई.

(7) बला इम्तिहान और आज़माइशा को कहते हैं. आज़माइश नेअमत से भी होती है और शिद्दत व मेहनत से भी. नेअमत से बन्दे की शुक्रगुज़ारी, और मेहनत से उसके सब्र (संयम और धैर्य) का हाल ज़ाहिर होता है. अगर “ज़ालिकुम.”(और इसमें) का इशारा फ़िरऔन के मज़ालिम (अत्याचारों) की तरफ़ हो तो बला से मेहनत और मुसीबत मुराद होगी, और अगर इन अत्याचारों से नजात देने की तरफ़ हो, तो नेअमत.

(8) यह दूसरी नेअमत का बयान है जो बनी इस्त्राईल पर फ़रमाई कि उन्हें फ़िरऔन वालों के ज़ुल्म और सितम से नजात दी और फ़िरऔन को उसकी क़ौम समेत उनके सामने डुबो दिया. यहां आले फ़िरऔन (फ़िरऔन वालों) से फ़िरऔन और उसकी क़ौम दोनों मुराद हैं. जैसे कि “कर्रमना बनी आदमा” यानी और बेशक हमने औलादे आदम को इज़्ज़त दी (सूरए इसरा, आयत 70) में हज़रत आदम और उनकी औलाद दोनों शामिल हैं. (जुमल). संक्षिप्त वाक़िआ यह है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम अल्लाह के हुक्म से रात में बनी इस्त्राईल को मिस्त्र से लेकर रवाना हुए, सुब्ह को फ़िरऔन उनकी खोज में भारी लश्कर लेकर चला और उन्हें दरिया के किनारे जा लिया. बनी इस्त्राईल ने फ़िरऔन का लश्कर देख़कर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से फ़रियाद की. आपने अल्लाह के हुक्म से दरिया में अपनी लाठी मारी, उसकी बरकत से दरिया में बारह ख़ुश्क रास्ते पैदा हो गए. पानी दीवारों की तरह खड़ा हो गया. उन दीवारों में जाली की तरह रौशनदान बन गए. बनी इस्त्राईल की हर जमाअत इन रास्तों में एक दूसरे को देखती और आपस में बात करती गुज़र गई. फ़िरऔन दरियाई रास्ते देखकर उनमें चल पड़ा. जब उसका सारा लश्कर दरिया के अन्दर आ गया तो दरिया जैसा था वैसा हो गया और तमाम फ़िरऔनी उसमें डूब गए. दरिया की चौड़ाई चार फरसंग थी. ये घटना बेहरे कुलज़म की है जो बेहरे फ़ारस के किनारे पर है, या बेहरे मा-वराए मिस्त्र की, जिसको असाफ़ कहते है. बनी इस्त्राईल दरिया के उस पार फ़िरऔनी लश्कर के डूबने का दृश्य देख रहे थे. यह वाक़िआ दसवीं मुहर्रम को हुआ. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उस दिन शुक्र का रोज़ा रखा. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ज़माने तक भी यहूदी इस दिन का रोज़ा रखते थे. हुज़ूर ने भी इस दिन का रोज़ा रखा और फ़रमाया कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की विजय की ख़ुशी मनाने और उसकी शुक्र गुज़ारी करने के हम यहूदियों से ज़्यादा हक़दार हैं. इस से मालूम हुआ कि दसवीं मुहर्रम यानी आशुरा का रोज़ा सुन्नत है. यह भी मालूम हुआ कि नबियों पर जो इनाम अल्लाह का हुआ उसकी यादगार क़ायम करना और शुक्र अदा करना अच्छी बात है. यह भी मालूम हुआ कि ऐसे कामों में दिन का निशिचत किया जाना रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की सुन्नत है. यह भी मालूम हुआ कि नबियों की यादगार अगर काफ़िर लोग भी क़ायम करते हों जब भी उसको छोड़ा न जाएगा.

(9) फ़िरऔन और उसकी क़ौम के हलाक हो जाने के बाद जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम बनी इस्त्राईल को लेकर मिस्त्र की तरफ़ लौटे और उनकी प्रार्थना पर अल्लाह तआला ने तौरात अता करने का वादा फ़रमाया और इसके लिये मीक़ात निशिचत किया जिसकी मुद्दत बढ़ौतरी समेत एक माह दस दिन थी यानी एक माह ज़िलक़ाद और दस दिन ज़िलहज के. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम क़ौम में अपने भाई हज़रत हारून अलैहिस्सलाम को अपना ख़लीफ़ा व जानशीन (उत्तराधिकारी) बनाकर, तौरात हासिल करने तूर पहाड़ पर तशरीफ़ ले गए, चालीस रात वहां ठहरे. इस अर्से में किसी से बात न की. अल्लाह तआला ने ज़बरजद की तख़्तियों में, आप पर तौरात उतारी. यहां सामरी ने सोने का जवाहरात जड़ा बछड़ा बनाकर क़ौम से कहा कि यह तुम्हारा माबूद है. वो लोग एक माह हज़रत का इन्तिज़ार करके सामरी के बहकाने पर बछड़ा पूजने लगे, सिवाए हज़रत हारून अलैहिस्सलाम और आपके बारह हज़ार साथियों के तमाम बनी इस्त्राईल ने बछड़े को पूजा. (ख़ाज़िन)

(10) माफ़ी की कैफ़ियत (विवरण) यह है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि तौबह की सूरत यह है कि जिन्होंने बछड़े की पूजा नहीं की है, वो पूजा करने वालों को क़त्ल करें और मुजरिम राज़ी ख़ुशी क़त्ल हो जाएं. वो इस पर राज़ी हो गए. सुबह से शाम तक सत्तर हज़ार क़त्ल हो गए तब हज़रत मूसा और हज़रत हारून ने गिड़गिड़ा कर अल्लाह से अर्ज़ की. वही (देववाणी) आई कि जो क़त्ल हो चुके वो शहीद हुए, बाक़ी माफ़ फ़रमाए गए. उनमें के क़ातिल और क़त्ल होने वाले सब जन्नत के हक़दार हैं. शिर्क से मुसलमान मुर्तद (अधर्मी) हो जाता है, मुर्तद की सज़ा क़त्ल है क्योंकि अल्लाह तआला से बग़ावत क़त्ल और रक्तपात से भी सख़्ततर जुर्म है. बछड़ा बनाकर पूजने में बनी इस्त्राईल के कई जुर्म थे. एक मूर्ति बनाना जो हराम है, दूसरे हज़रत हारून यानी एक नबी की नाफ़रमानी, तीसरे बछड़ा पूजकर मुश्रिक (मूर्ति पूजक) हो जाना. यह ज़ुल्म फ़िरऔन वालों के ज़ुल्मों से भी ज़्यादा बुरा है. क्योंकि ये काम उनसे ईमान के बाद सरज़द हुए, इसलिये हक़दार तो इसके थे कि अल्लाह का अज़ाब उन्हें मुहलत न दे, और फ़ौरन हलाकत से कुफ़्र पर उनका अन्त हो जाए लेकिन हज़रत मूसा और हज़रत हारून की बदौलत उन्हें तौबह का मौक़ा दिया गया. यह अल्लाह तआला की बड़ी कृपा है.

(11) इसमें इशारा है कि बनी इस्त्राईल की सलाहियत फ़िरऔन वालों की तरह बातिल नहीं हुई थी और उनकी नस्ल से अच्छे नेक लोग पैदा होने वाले थे. यही हुआ भी, बनी इस्त्राईल में हज़ारों नबी और नेक गुणवान लोग पैदा हुए.

(12) यह क़त्ल उनके कफ़्फ़ारे (प्रायश्चित) के लिये था.

(13) जब बनी इस्त्राईल ने तौबह की और प्रायश्चित में अपनी जानें दे दीं तो अल्लाह तआला ने हुक्म फ़रमाया कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम उन्हें बछड़े की पूजा की माफ़ी मांगने के लिये हाज़िर लाएं. हज़रत उनमें से सत्तर आदमी चुनकर तूर पहाड पर ले गए. वो कहने लगे- ऐ मूसा, हम आपका यक़ीन न करेंगे जब तक ख़ुदा को रूबरू न देख लें. इस पर आसमान से एक भयानक आवाज़ आई जिसकी हैबत से वो मर गए. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने गिड़गिड़ाकर अर्ज की कि ऐ मेरे रब, मै बनी इस्त्राईल को क्या जवाब दूंगा. इस पर अल्लाह तआला ने उन्हें एक के बाद एक ज़िन्दा फ़रमाया. इससे नबियों की शान मालूम होती है कि हज़रत मूसा से “लन नूमिना लका” (ऐ मूसा हम हरग़िज तुम्हारा यक़ीन न लाएंगे) कहने की सज़ा में बनी इस्त्राईल हलाक किये गए. हुज़ूर सैयदे आलाम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के एहद वालों को आगाह किया जाता है कि नबियों का निरादर करना अल्लाह के प्रकोप का कारण बनता है, इससे डरते रहें. यह भी मालूम हुआ कि अल्लाह तआला अपने प्यारों की दुआ से मुर्दे ज़िन्दा फ़रमा देता है.

(14) जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम फ़ारिग़ होकर बनी इस्त्राईल के लश्कर में पहुंचे और आपने उन्हें अल्लाह का हुक्म सुनाया कि मुल्के शाम हज़रत इब्राहीम और उनकी औलाद का मदफ़न (अन्तिम आश्रय स्थल) है, उसी में बैतुल मक़दिस है. उसको अमालिक़ा से आज़ाद कराने के लिए जिहाद करो और मिस्त्र छोड़कर वहीं अपना वतन बनाओं मिस्त्र का छोड़ना बनी इस्त्राईल पर बड़ा भारी था. पहले तो वो काफ़ी आगे पीछे हुए और जब अपनी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ सिर्फ़ अल्लाह के हुक्म से मजबूर होकर हज़रत हारून और हज़रत मूसा के साथ रवाना हुए तो रास्ते में जो कठिनाई पेश आती, हज़रत मूसा से शिकायत करते. जब उस सहरा (मरूस्थल) में पहुंचे जहां हरियाली थी न छाया, न ग़ल्ला साथ था. वहां धूप की तेज़ी और भूख की शिकायत की. अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा की दुआ से सफ़ेद बादल को उनके सरों पर छा दिया जो दिन भर उनके साथ चलता. रात को उनके लिए प्रकाश का एक सुतून (स्तम्भ) उतरता जिसकी रौशनी में काम करते. उनके कपड़े मैले और पुराने न होते, नाख़ुन और बाल न बढ़ते, उस सफ़र में जो बच्चा पैदा होता उसका लिबास उसके साथ पैदा होता, जितना वह बढ़ता, लिबास भी बढ़ता.

(15) मन्न, तरंजबीन (दलिया) की तरह एक मीठी चीज़ थी, रोज़ाना सुब्ह पौ फटे सूरज निकलने तक हर आदमी के लिये एक साअ के बराबर आसमान से उतरती. लोग उसको चादरों में लेकर दिन भर खाते रहते. सलवा एक छोटी चिड़िया होती है. उसको हवा लाती. ये शिकार करके खाते. दोनों चीज़ें शनिवार को बिल्कुल न आतीं, बाक़ी हर रोज़ पहुंचतीं. शुक्रवार को और दिनों से दुगुनी आतीं. हुक्म यह था कि शुक्रवार को शनिवार के लिये भी ज़रूरत के अनुसार जमा कर लो मगर एक दिन से ज़्यादा का न जमा करो. बनी इस्त्राईल ने इन नेअमतों की नाशुक्री की. भंडार जमा किये, वो सड़ गए और आसमान से उनका उतरना बंद हो गया. यह उन्होंने अपना ही नुक़सान किया कि दुनिया में नेअमत से मेहरूम और आख़िरत में अज़ाब के हक़दार हुए.

(16) “उस बस्ती” से बैतुल मक़दिस मुराद है या अरीहा जो बैतुल मक़दिस से क़रीब है, जिसमें अमालिक़ा आबाद थे और उसको ख़ाली कर गए. वहां ग़ल्ले मेवे की बहुतात थी.

(17) यह दर्वाज़ा उनके लिये काबे के दर्जे का था कि इसमें दाख़िल होना और इसकी तरफ़ सज्दा करना गुनाहों के प्रायश्चित का कारण क़रार दिया गया.

(18) इस आयत से मालूम हुआ कि ज़बान से माफ़ी मांगना और बदन की इबादत सज्दा वग़ैरह तौबह का पूरक है. यह भी मालूम हुआ कि मशहूर गुनाह की तौबह ऐलान के साथ होनी चाहिये. यह भी मालूम हुआ कि पवित्र स्थल जो अल्लाह की रहमत वाले हों, वहाँ तौबह करना और हुक्म बजा लाना नेक फलों और तौबह जल्द क़ुबूल होने का कारण बनता है. (फ़त्हुल अज़ीज़). इसी लिये बुज़ुर्गों का तरीका़ रहा है कि नबियों और वलियों की पैदाइश की जगहों और मज़ारात पर हाज़िर होकर तौबह और अल्लाह की बारगाह में सर झुकाते हैं. उर्स और दर्गाहों पर हाज़िरी में भी यही फ़ायदा समझा जाता है.

(19) बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है कि बनी इस्त्राईल को हुक्म हुआ था कि दर्वाज़े में सज्दा करते हुए दाख़िल हों और ज़बान से “हित्ततुन” यानी तौबह और माफ़ी का शब्द कहते जाएं. उन्होंने इन दोनों आदेशों के विरूद्ध  किया. दाख़िल तो हुए पर चूतड़ों के बल घिसरते और तौबह के शब्द की जगह मज़ाक के अंदाज़ में “हब्बतुन फ़ी शअरतिन” कहा जिसके मानी हैं बाल में दाना.

(20) यह अज़ाब ताऊन (प्लेग) था जिससे एक घण्टे में चौबीस हज़ार हलाक हो गए. यही हदीस की किताबों में है कि ताऊन पिछली उम्मतों के अज़ाब का शेष हिस्सा हैं. जब तुम्हारे शहर में फैले, वहां से न भागो. दूसरे शहर में हो तो ताऊन वाले शहर में न जाओ. सही हदीस में है कि जो लोग वबा के फैलने के वक़्त अल्लाह की मर्ज़ी पर सर झुकाए सब्र करें तो अगर वो वबा (महामारी) से बच जाएं तो भी उन्हें शहादत का सवाब मिलेगा.

सूरए बक़रह _ सातवां रूकू

सूरए बक़रह _ सातवां रूकू

और जब मूसा ने अपनी क़ौम के लिये पानी मांगा तो हमने फ़रमाया इस पत्थर पर अपनी लाठी मारो फ़ौरन उस में से बारह चश्में बह निकले(1)
हर समूह ने अपना घाट पहचान लिया, खाओ और पियो ख़ुदा का दिया(2)
और ज़मीन में फ़साद उठाते न फिरो(3)
और जब तुमने कहा ऐ मूसा (4)
हम से तो एक खाने पर(5)
कभी सब्र न होगा तो आप अपने रब से दुआ कीजिये कि ज़मीन की उगाई हुई चीज़ें हमारे लिये निकाले कुछ साग और ककड़ी और गेंहूं और मसूर और प्याज़.

फ़रमाया क्या मामूली चीज़ को बेहतर के बदले मांगते हो(6)
अच्छा मिस्त्र(7)
या किसी शहर में उतरो वहां तुम्हें मिलेगा जो तुमने मांगा(8)
और उनपर मुक़र्रर कर दी गई ख्व़ारी (ज़िल्लत) और नादारी (9)
(या दरिद्रता)  और ख़ुदा के ग़ज़ब में लौटे(10)
ये बदला था उसका कि वो अल्लाह की आयतों का इन्कार करते और नबियों को नाहक़ शहीद करते (11)
ये बदला उनकी नाफ़रमानियों और हद से बढ़ने का (61)

तफ़सीर : सूरए बक़रह – सातवां रूकू

(1) जब बनी इस्त्राईल ने सफ़र में पानी न पाया तो प्यास की तेज़ी की शिकायत की. हज़रत मूसा को हुक्म हुआ कि अपनी लाठी पत्थर पर मारें.  आपके पास एक चौकोर पत्थर था. जब पानी की ज़रूरत होती, आप उस पर अपनी लाठी मारते, उससे बारह चश्मे जारी हो जाते, और सब प्यास बुझाते, यह बड़ा मोजिज़ा (चमत्कार) है. लेकिन नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मुबारक उंगलियों से चश्मे जारी फ़रमाकर एक बड़ी  जमाअत की प्यास और दूसरी ज़रूरतों को पूरा फ़रमाना इससे बहुत बड़ा और उत्तम चमत्कार है. क्योंकि मनुष्य के शरीर के किसी अंग से पानी की धार फूट निकलना पत्थर के मुक़ाबले में ज़्यादा आश्चर्य की बात है. (ख़ाज़िन व मदारिक)

(2) यानी आसमानी खाना मन्न व सलवा खाओ और पत्थर के चश्मों का पानी पियो जो तुम्हें अल्लाह की कृपा से बिना परिश्रम उपलब्ध है.

(3) नेअमतों के ज़िक्र के बाद बनी इस्त्राईल की अयोग्यता, कम हिम्मती और नाफ़रमानी की कुछ घटनाएं बयान की जाती हैं.

(4) बनी इस्त्राईल की यह अदा भी बहुत बेअदबी की थी कि बड़े दर्जे वाले एक नबी को नाम लेकर पुकारा. या नबी, या रसूलल्लाह या और आदर का शब्द न कहा. (फ़त्हुल अज़ीज़). जब नबियों का ख़ाली नाम लेना बेअदबी है तो उनको मामूली आदमी और एलची कहना किस तरह गुस्ताख़ी न होगा.
नबियों के ज़िक्र में ज़रा सी भी बेअदबी नाजायज़ है.

(5) “एक खाने” से एक क़िस्म का खाना मुराद है.

(6) जब वो इस पर भी न माने तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की बारगाह में दुआ की, हुक्म हुआ “इहबितू” (उतरो).

(7) मिस्त्र अरबी में शहर को भी कहते हैं, कोई शहर हो और ख़ास शहर यानी मिस्त्र मूसा अलैहिस्सलाम का नाम भी है. यहां दोनों में से एक मुराद हो सकता है. कुछ का ख़याल है कि यहां ख़ास शहर मुराद नहीं हो सकता. मगर यह ख़याल सही नही है.

(8) यानी साग, ककड़ी वग़ैरह, हालांकि इन चीज़ों की तलब गुनाह न थी लेकिन मन्न व सलवा जैसी बेमेहनत की नेअमत छोड़कर उनकी तरफ़ खिंचना तुच्छ विचार है. हमेशा उन लोगों की तबीयत तुच्छ चीज़ों और बातों की तरफ़ खिंची रही और हज़रत हारून और हज़रत मूसा वग़ैरह बुजुर्गी वाले बलन्द हिम्मत नबियों के बाद बनी इस्त्राईल की बदनसीबी और कमहिम्मती पूरी तरह ज़ाहिर हुई और जालूत के तसल्लुत (अधिपत्य) और बख़्ते नस्सर की घटना के बाद तो वो बहुत ही ज़लील व ख़्वार हो गए. इसका बयान “दुरेबत अलैहिमुज़ ज़िल्लतु” (और उन पर मुकर्रर कर दी गई ख़्वारी और नादारी) (सूरए आले ईमरान, आयत : 112) में है.

(9) यहूद की ज़िल्लत तो यह कि दुनिया में कहीं नाम को उनकी सल्तनत नहीं और नादारी यह कि माल मौजूद होते हुए भी लालच की वजह से मोहताज ही रहते हैं.

(10) नबियों और नेक लोगों की बदौलत जो रूत्बे उन्हें हासिल हुए थे उनसे मेहरूम हो गए. इस प्रकोप का कारण सिर्फ़ यही नहीं कि उन्होंने आसमानी ग़िज़ाओं के बदले ज़मीनी पैदावार की इच्छा की या उसी तरह और ख़ताएं हो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के ज़माने में उनसे हुई, बल्कि नबुव्वत के एहद से दूर होने और लम्बा समय गुज़रने से उनकी क्षमताएं बातिल हुई और निहायत बुरे कर्म और बड़े पाप उनसे हुए. ये उनकी ज़िल्लत और ख़्वारी के कारण बने.

(11) जैसा कि उन्होने हज़रत ज़करिया और हज़रत यहया को शहीद किया और ये क़त्ल ऐसे नाहक़ थे जिनकी वजह ख़ुद ये क़ातिल भी नहीं बता सकते.