Bidat kya he in hindi

हज़रते जरीर बिन अब्दुल्लाह से रिवायत है के रसूलुल्लाह ने इरशाद फरमाया के जिसने इस्लाम में कोइ अच्छा तरीका निकाला तो उसका अजरो सवाब मिलेगा।और जितने लोग उस पर अमल करेंगे उन सब का सवाब भी उसको मिलेगा।और
उसके सवाब में कोइ कमी नहीं की जाएगी
और जिसने इस्लाम में कोई बुरा तरीका निकाला तो उस पर उसका गुनाह होगा।और जितने उसपर चलेंगे उन सब का गुनाह भी उसपर होगा उनके गुनाहों में भी कोइ कमी नहीं की जाएगी..मुस्लिम शरीफ
मिश्कात शरीफ।किताबुल इल्म।सफा 33
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मुसलमानों में कुछ उमूर राइज होगए हैं जो बिलकुल उसी शकल में रसूलुल्लाह और सहाबह के ज़माने में न थे अगर चह बाद में उनका रिवाज हुआ लेकिन उनमें कोई दिनी इस्लामी मसलेहत है
और खेलाफे शरअ कोई बात उनमें नहीं पाई जाती और वह न कुरानो हदीस के हुक्म के खेलाफ हैं तो उनको करने में कोई हर्ज़ नहीं है
उनको गुमराही वाली बिदअत कहना सरासर नादानी है जैसे नियाज़ फातेहा कुरआन खानी महफिले मीलाद और उर्स वगैरह ये सब अच्छे काम हैं और उनको करने में कोई हर्ज नहीं है जब के उसमें कोई ऐसी ज़ियादती न हो जो खेलाफे शरीअत हो और शरीअते इस्लामियह के दाएरे में ही किए जाएँ
कुछ लोग कहते हैं के ये सब बातें इसलिए गुनाह है के ये हुज़ूर के ज़माने में न थीं तो ऐसा भी नहीं है उस ज़माने में उसका कोई वुजूद न था बलके इन सब चीजों की असल और हकीक़त उस ज़माने में भी थी यानी किसी न किसी शकल में ये हुज़ूर के ज़माने में भी पाए जाते थे
और हर नया काम गुमराही जब ही होता है जब के सरकार के ज़माने में वह किसी भी शकल में नहो और उसके करने में किसी शरई हुक्म के खेलाफ वरज़ी होती हो
अगर इस्लाम में हर वह काम बिदअत व गुमराही है
जो हुज़ूर के ज़माने में न था तो मदारिस क़ाईम करना रसीदी चन्दे करना इल्मे नहवो सर्फ़ बलागतो फ़साहत पढ़ना सालानह खत्मे बुखारी का जलसए दस्तार बन्दी करना मसाजिद पर मीनार बनाना इल्मे उसूले हदीसो फ़िक़ह पढ़ना ज़बर ज़ेर पेश वाला कुरआन पढ़ना पढ़ाना छापना ये सब काम भी
हुज़ूर के ज़माने में न थे लिहाज़ा ये भी गुमराही हो जाएंगे  खुलासह ये के हदीस से ये बात साबित है के हर नया काम गुमराही नहीं अगर उसकी असल हुज़ूर के ज़माने में हो और
उसको करने में कोई दीनी भलाई या इस्लाम या मुसलमानों का नफ़ा हो,रब हमें दीन की ये ख़ास बातें मुस्लिम भाइयों को समझने की तौफीक़ अता फरमाए,,,